भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० ५६] भाषाटीकासमेता। (४७१) औषधोंको कहते हैं विषसे लिये हुए मनुष्यको जानके पीछे उसकी चिकित्सा करे ॥ १५ ॥ दोनों हलदियोंको विजौराके रसमें और कांजीमें पीस लेप करनेसे शरीरके लिपा हुआ विषका नाश होता है ॥ १६ ॥ विजौराके रससे अथवा कांजीसे तथा शीतल जलसे धोनेसे शरीरके लिपा हुआ विषका नाश होता है ॥ १७ ॥ अथ जंगमविषकी चिकित्सा। विषं जङ्गममित्युक्तमष्टधा भिषगुत्तम । दव्वीकरा मण्डलिनो राजिमन्तश्च गुण्डसाः ॥ १८ ॥ वृश्चिको गोरकश्चापि तथा च खण्डबिन्दुकः ॥ अलर्कमूषमार्जारविषं प्रोक्तमनेकधा ॥ १९ ॥ दव्वीकराणां सर्वेषामुत्तं वातात्मकं विषम् ॥ मण्डलीनाञ्च सर्वेषां पैत्तिकं विषमुच्यते ॥ २० ॥ राजिमन्तश्च ये प्रोक्तास्तेऽपि कफात्मका विषाः ॥ विचित्रगमनं मूर्द्धः पीडनं चातिदुर्भर्म् ॥ ॥ २१ ॥ हृदये व्यथनं यस्य तमसाध्यं वदन्ति च ॥ नासारक्त- स्रुतिर्यस्य नेत्रे प्लावश्च दृश्यते ॥ २२ ॥ जडा च जायते जिह्वा तमसाध्यं विदुर्बुधाः ॥ यस्य लोमानि शीर्य्यन्ते पीताभं शरीरं भवेत् ॥ २३ ॥ न स्थिरं मस्तकं यस्य तमसाध्यं भिषग्वर ॥ एभिर्विरहितं दृष्ट्वा कुर्य्यात्तस्य प्रतिक्रियाम् ॥ २४ ॥ हे उत्तम वैद्य ! जंगम विष आठ प्रकारका होता है। दर्वीकर सर्प, मंडलि, राजिमंत सर्प, गुंडस ॥ १८ ॥ वृश्चिक, गोरक, खंडविंदुक, ऐसे इन सर्पोंके विष कहे हैं और कुत्ता, मूसा, बिलाव इत्यादिकोंके अनेक विष कहे हैं ॥ १९ ॥ दर्वीकर अर्थात् करछी सरीखे फणवाले सब सर्पोंका वातवाला विष होता है, मंडलवाले सर्पोंका पित्तवाला विष होता है ॥ २० ॥ और जो राजिमंत अर्थात् रेखावाले सर्प कहे हैं उनका कफवाला विष होता है और जिस पुरुषका विचित्र गमन हो और मस्तकमें अत्यंत दुर्भर पीडा हो ॥ २१ ॥ जिसके हृदामें पीड़ाहो विषवाले उस मनुष्यको असाध्य जाने और जिसकी नासिकासे रक्त झिरे नेत्रोंमें पानी भरा रहे ॥ २२ ॥ जिह्वा जड होजावे उसको वैद्यजन असाध्य कहते हैं और जिसके रोम विखर जावें और शरीर पीला होजावे ॥ २३ ॥ मस्तक स्थिर नहीं हो हे उत्तम- वैद्य ! उसको असाध्य जाने और जो पुरुष इन लक्षणोंसे रहित हो उसका इलाज करे ॥२४॥ अथ विषबंधनमंत्रः । ॐ नमो भगवते सुग्रीवाय सकलविषोपद्रवशमनाय उग्रकाल-