हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 506, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४१४ ) हारीतसंहिता । [ तृतीयस्थाने- बहुलोपद्रवा व्रणे ॥ सन्धौ छिन्नं नरं दृष्ट्वा सेचयेत्तप्तवारिणा ॥७॥ सञ्चितस्य व्रणस्यापि प्रशस्तं पिचुतैलकम्॥पूये वापि विनिर्याति निम्बारग्वधपत्रकम् ॥८॥ गुडेन पथ्यां पिष्ट्वा च लेपनं पूयशोधनम् ॥ दिनत्रये विशुद्धेऽपि तत्रैव लेपनं हितम् ॥९॥ धवार्ज्जुनकदम्बस्य वृक्षोदुम्बरयोस्त्वचम् ॥ जलेन पिष्ट्वा लेपश्च तेन संरोहते व्रणः ॥ १० ॥ आत्रेयजी कहते हैं-छिन्न कटाहुआ, भिन्न टूटाहुआ, भग्न फूटाहुआ, घृष्ट घिसाहुआ, पिष्ट पिसाहुआ, आस्फालित फटा हुआ, संप्रहार, संघात, लाठी आदिकी चोट ऐसे ये हाड आदिके टूटनेके रोग होते हैं ॥ १ ॥ शस्त्रसे कटे हुए- मनुष्यको देखि उसकी क्रिया करे ॥ ॥ २ ॥ अस्थिमें स्थित हुआ मांसभेदन होजावे अथवा शाखा प्रशाखाओंकी अस्थि छेदन होजावे वह छिन्न कहाता है ॥ ३ ॥ जो संधिके विना अन्य जगहकी हड्डी टूट जावे वह असाध्य कहाती है, खड्ग अर्धचंद्रमाके समान शस्त्र फरशा इनसे छिन्न अस्थि कही है ॥४॥ उसकी आदिमें चारण, लेप, धोवना, ये कर्म करे फिर नींव और तिलोंके तेलसे रूईके फोहे करके चोपरिके पसीना दिवावे॥५॥ जबतक रुधिर गिरे तबतक तेलसे चोपरता रहै और जब रक्त विकारको प्राप्त होजाता है तब तेलसे मालिस करना हित कहा है ॥ ६ ॥ और व्रणपै सोजा आदिक बहुतसे उपद्रव होजाते हैं, संधिमें छिन्न हुए मनुष्यको देखिके गरम जलसे सेक करे ॥ ७ ॥ फिर गरम जलसे सेक करलेवे तब फोहेसे तेल लगाना श्रेष्ठ है और जो पीव निकलती हो तो नींव, अमलतास इनके पत्ते बांधने श्रेष्ठ है ॥ ८ ॥ और हरडोंको पीस गुडके संग लेप करनेसे पीवकी शुद्धि होती है। तीन दिनतक शुद्ध होजावे तब इन आगे कही औषधोंका लेप करना हित है ॥ ९ ॥ धव, अर्जुनवृक्ष, कदंब, पिलखनवृक्ष, गूलर इनकी छालको जलमें पीस लेप करनेसे घाव भरता है ॥ १० ॥ अथ भिन्नअस्थिकी चिकित्सा । शक्तिशूलैश्च बाणैश्च भल्लैर्वा खड्गतोमरैः॥ क्षुरिकामुखधाराभि- र्भिन्नं तत्कथ्यते भिषक् ॥ ११॥ साध्यममर्मजं प्रोक्तं मर्मस्थं तन्न सिध्यति॥अपामार्गरसेनापि तथा कूष्माण्डकस्य च॥१२॥ धावनं काञ्जिकेनापि प्रशस्तं कथ्यते बुधैः ॥ तिलतैलेन चाभ्यङ्गो हितः स्यात्स्वस्थभिन्नके ॥ लेपनञ्च प्रयोक्तव्यं पूर्वोक्तञ्च हितावहम् ॥ १३ ॥