भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 548 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 520

( ४८८ ) हारीतसंहिता । [ चतुर्थस्थाने-अ० ६ ] नीलेवर्णवाली और पशलियोंकी ओर पीलेवर्णवाली शंखसरीखे मुखवाली ऐसी रोहिणी जोख होती है यह कमलकी नालीमें रहती है इसके लगानेसे विष, विद्रधि, शोजा ये उपद्रव होते हैं ॥ ३ ॥ अथ कालिका जोखके लक्षण । कृष्णा कालिका मत्स्याशये दूरे त्याज्या ॥ ४ ॥ कालेवर्णवाली जोख मत्स्याशय अर्थात् मच्छोंके वासमें रहती है। यह दूरसे त्याग देनी चाहिये ॥ ४ ॥ अथ धुम्राजोखके लक्षण । धूम्रा कपोतमहिषवर्णा पीतोदरी अर्द्धचन्द्रमुखी कर्दमे कलुषो- दके प्रविशति ॥ सा रक्तावसेचनयोग्या निरुपद्रवा च ॥ ५॥ धूम्रा जोख, कपोत और भैंससरीखे वर्णवाली होती है, पीले उदरवाली होती है, आध चंद्रमाके समान मुखवाली होती है। यह कीचमें और गिधलेहुए जलमें रहती है यह रुधिर निकालनेके योग्य कही है और उपद्रवोंसे रहित है ॥ ५ ॥ अथ जोख लगवानेका क्रम अवस्थानं काञ्जिकेन प्रक्षाल्य नवनीतेन म्रक्षयित्वा उष्णोदकेन प्रक्षालयेत् ॥ पश्चात् तत्र जलौकावचारणीया ॥ ६ ॥जलौका रक्तपूर्णा पश्चात् पातिता॥ तस्या मुखं लवणेन मूत्रेण वा प्रक्षा- लयेत् ॥ अथवा शनैर्गोस्तनवदुह्यते॥पुनर्नवनीतेन मुखमालि- प्यावचारणीया ॥ दुष्टरक्ते विनिर्गते दंशं काञ्जिकेन प्रक्षाल्य घृतमधुनाभ्यज्य वस्त्रेण बध्नीयात् ॥ ७ ॥ इत्यात्रेयभा०हा० चतुर्थसूत्रस्थाने जलौकावचारविधिर्नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥ इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ॥ जोख लगवानेके योग्य जगहको कांजीसे धोके नौनीघृत लगा पीछे गरम जलसे धोके पीछे जोख लगवानी चाहिये ॥ ६ ॥ जब जोख रक्तसे पूरण होजाये तब उसको गिरा देवे और उसके मुखको नमकसे अथवा गोमूत्रसे धो देवे अथवा शनैः शनैः गौके थनकी तरह सूत देवे पीछे मुखके नौनीघृत लगाके फिर लगवा देवे और जब दुष्ट रुधिर निकल जावे तब जोखके डंकस्थानको कांजीसे धोके घृत और शहदसे चोपरी वस्त्रसे बांध देवे ॥७ ॥ इति बेरीनिवासि०हारीतसं०भा० सूत्रस्थाने जलौकाचारविधिर्नाम षष्ठोऽध्यायः॥६॥ इति सूत्रस्थानं समाप्तम् ॥ ४ ॥