भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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( ४९० ) हारीतसंहिता । [ पञ्चमस्थाने- उत्पत्तिनामानि वक्ष्यामि शृणु कोविद् ॥ १० ॥ विजया रोहिणी चव पूतना चामृता तथा ॥ चेतकी चाभया चैव जीवन्ती चैव सप्तमी ॥ ११ ॥ विन्ध्ये च विजया जाता अभया च हिमालये ॥ रोहिणी वैदिशे जाता पूतना मगधे स्मृता ॥१२॥ जीवन्तिका सुराष्ट्रायां चम्पायां चेतकी मता ॥ अमृता सरयूतीर इत्येताः सप्त जातयः ॥१३॥ अभया नेत्र- रोगेषु शिरोरोगेषु कालिका ॥सर्वप्रयोगेविजया रोहिणी क्षतरो- हिणी ॥ १४ ॥ पूतना लेपनार्थे च अमृता च तथा मता ॥ चेतकी सर्वतो योज्या जीवन्ती चूर्णयोगतः ॥१५॥ बालानामु- पकारार्थं विजयां परिलक्षयेत् ॥ त्र्यस्रा च रोहिणी प्रोक्ता अमृता स्थूलमांसला ॥ १६ ॥ पञ्चास्रा चाभया प्रोक्ता पूतना चतुरस्रका ॥ त्र्यस्रा तु चेतकी प्रोक्ता जीवन्ती दीर्घमांसला ॥ ॥ १७ ॥ विजया नीलवर्णा च पीता स्याद्रोहिणी भिषक् ॥ अमृता कृष्णवर्णा च किञ्चिच्छुभ्राभया तथा ॥१८॥ सार्द्ध- द्वयङ्गुलमानेन अमृतां लक्षयेद्बुधः ॥१९॥ पथ्या भवेत्पथ्य- तमा नराणां रोगांश्च सर्वान्विनिहन्ति सद्यः ॥ आयुःप्रदा तुष्टि- मतीवमेधावर्णौजतेजःस्मृतिमातनोति ॥ २० ॥ उन्मूलिनी पि- त्तकफानिलानां सन्मीलिनी बुद्धिबलेन्द्रियाणाम् ॥ विस्रंसिनी मूत्रशकृन्मलानां हरीतकी रोगहरा नराणाम् ॥२१॥ इत्यात्रे- यभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पो नाम प्रथमो- ऽध्यायः ॥ १ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-कल्पोंमें हरड़ै श्रेष्ठ हैं उसके गुण अवगुणोंको सुनो ॥ ४ ॥ स्वर्गमें स्थित हुए इंद्रके अमृत पीवते हुए पृथ्वीमें अमृतकी बिंदु गिरती भयीं उनसे हरड़ैं उत्पन्न होती भयीं ॥ ५ ॥ वह पाँच रसोंसे संयुक्त है और एक रससे रहित है, कसैली, खट्टी, चर्चरी, कडुई और मधुर रसवाली कही है, नमकके रससे वर्जित है उसके जुदे २ लक्षणोंको सुनो ॥ ६ ॥ इसकी त्वचा चर्चरी है और इसका मेद कसेला है मेदके भीतर खट्टापन है, अस्थि