हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[अ० ३ ] भाषाटीकासमेता। (४९५)
स्थितं सप्तदिनं महिष्याः॥१३॥पञ्चाभया मूत्रपलानि पञ्चक्षीरेण सप्ताहमतिप्रशस्तम्॥क्षीरोदशोषी परतस्तथान्ये एष त्रिसप्ताह- परः प्रयोगः ॥१४॥वातोदरं शीघ्रमियं निहन्यात्प्लीहानमाना- हमुरोग्रहञ्च॥स पाण्डुरोगं च कृमींश्च हन्ति हरीतकी धान्यतुषा- म्बुसिद्धा ॥ १५ ॥ सपिप्पलीसैन्धवयुक्तचूर्ण सोद्गारधूपं भृशम- प्यजीर्णम्॥निहन्ति सद्यो जनयेत्क्षुधाञ्च कल्कञ्च तस्याः सह नागरेण॥ १६ ॥ ससैन्धवेन ज्वरमाशु हन्ति दध्ना च तक्रेण हितातिसारे॥ सराजयक्ष्मे मधुनावलिह्यान्मूत्रेण शोफोदरना- शहेतोः ॥१७॥ सपाण्डुरोगे समशर्करायाः शोषे सदाहे सह मातुलुङ्ग्या॥रसेन युक्ता विहितातिपथ्या कल्कं समाप्तं कथितं मुनीन्द्रैः ॥ १८ ॥ इत्यात्रेयभाषिते हारीतोत्तरे कल्पस्थाने हरीतकीकल्पवर्णनभेदो नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-अभया दो अंगुल प्रमाणकी होती है पूतना चार अंगुल प्रमाण की होती है जीवंती डेढ अंगुल प्रमाणकी होती है, चेतकी छह अंगुल प्रमाणकी होती है ॥१॥ वहां आकारसे और वर्णसे चेतकी हरडै दो प्रकारकी कही है वहां छह अंगुल प्रमाणवाली काली कही है और एक अंगुल प्रमाणवाली सफेद कही है ॥ २ ॥ जुलाबके वास्ते काली चेतकी हरडै श्रेष्ठ कही हैं ॥ ३॥ और जबतक चेतकी हरड़ों वृक्षके नीचे स्थित रहे तबतक पशु पक्षी- आदिकको भी दस्त लग जाते हैं मनुष्योंकी तो कौन बात है ॥ ४ ॥ और मनुष्य जबतक चेतकी हरड़ेको हाथमें रखे तबतक उसके दस्त लगे रहते हैं और रोगोंका नाश हो जाता है ॥ ५ ॥ और राजे तथा सुंदर कोमल शरीरवाले जन अथवा जिनसे औषध नहीं लीजावे तथा कृश, ऐसे मनुष्योंके सुखके उपायके वास्ते यही जुलाब दिवानी कही है ॥ ६ ॥ दरिद्री पुरुषोंको द्रव्य खरच करे विनाही यह हरड रसायनरूप औषध कही है पथ्य भोजनके अंतमें अथवा आदिमें भक्षणकीहुई यह हरडैं रोगोंको नाशनेवाली कही हैं ॥ ७ ॥ और तृषासे पीडित पुरुष, हृदय, कंठ इनमें शोषवाले, हनुग्रह तथा गलप्रहरोगवाले, नवीनज्वर क्षीणबल इंद्रियवाले पुरुष गर्भिणी स्त्री इनको यह हरड़ देनी पथ्य नहीं कही है ॥ ८ ॥ गुड़, सोंठ, सेंधानमक, इनके संग हरडको देवे तो आमाशयमें स्थित होनेवाले उदररोगोंका ऐसे नाश होता है कि जैसे बिजलीसे वृक्षोंका नाश हो जाता है ॥ ९ ॥ शरदऋतुमें मिश्रीके संग देनी और हिमऋतुमें गुड़, सोंठ, इनके संग देनी, शिशिरऋतुमें सेंधानमक, पीपल़ी, इनके संग देनी और