भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

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अ० ४] भाषाटीकासमेता । ( ४९७ ) ग्रस्तो गतिहीनोऽतिजर्जरः ॥ सयष्टिः सरणिक्षुण्णः शीर्णदन्ता- वलीमुखः ॥ ५ ॥ सव्यक्तस्थैः क्षुधापन्नैर्ऋषिभिस्तत्र विश्रुतः ॥ सोऽपि क्षुधातुरः सर्वां पर्यटत्युर्वर्रां महीम् ॥ ६ ॥ कुत्रचित् पुण्ययोगेन दृष्टवान्विटपान् शुभान् ॥ नीलशैवालसंकाशान् शाद्वलान्बहुलान् भुवि ॥ ७ ॥ क्षुधासंपीड़नेनापि भुक्तवान् सदलानपि ॥ ८॥ षण्मासानन्तरं शुष्कान् विटपांस्तदनन्तरम्॥ भुक्तवान्कन्दकान् सोऽपि मासमेकं तथा ऋषिः॥ ९ ॥ पश्चात् सुभिक्षे सञ्जाते सर्व्वे चैकत्र संस्थिताः ॥ सोऽपि वृद्धो युवा भूत्वा गतस्तत्र च यत्र ते ॥१०॥ तं दृष्ट्वा विस्मयापन्नाः पप्रच्छुः किं कृतं त्वया ॥ नोक्तवान्स तु किञ्चिच्च रुषा तैः शापितस्ततः ॥११॥ यत्त्वया खादितं द्रव्यं तद्भक्ष्यं द्विजातिभिः॥ दुर्गन्धमपि चि- त्रञ्च तस्माज्जातं रसोनकम् ॥१२॥ अथ वीर्य्यञ्च वक्ष्यामि रसो- नस्य महामते ॥ रसैः पञ्चभिः संयुक्तो रसोनस्तेन वर्जितः॥१३॥ अमृतमयनेके समय देवताओंका और दैत्योंका महान् युद्ध होता भया तब गरुड अमृतको हरके चोंचमें ग्रहणकर स्वर्गमें जाते भये ॥ १ ॥ फिर युद्धकी हारके श्रमसे और मार्गके खेद होनेसे युक्त हो गया तब बैठ गया वहां अमृतकी बिंदु गिरती भयी वे बूंद ॥ २ ॥ विष्ठासे दूषित किसीके शरीरपै गिरके वहां ही स्थिति होती भई पीछे कालके वशसे उस देशमें बारह वर्षतक दुर्भिक्ष काल पड़ता भया ॥ ३ ॥ उस वनमें सब वेल वृक्ष पत्ते सूखते भये इससे सब ऋषि दूर गहरवनमें जाते भये ॥ ४ ॥ उन ऋषियोंमें बुढ़ापेसे ग्रसित हुआ गमन करनेमें समर्थ नहीं, जर्जर अंगवाला यष्टिकाको पकड़े हुए क्षुधासे युक्त- हुआ, दाँत हिलते हुए ऐसा एक ऋषि था ॥ ५ ॥ सो क्षुधामें युक्त हुए कहीं एकांतमें बेमालूम हुए ऐसे अन्यऋषियोंसे विछुड़ता भया पीछे वह भी क्षुधासे युक्तहुआ सब पृथ्वीपे विचरता भया ॥ ६ ॥ पीछे पुण्यके योगसे कहींक सुंदर वृक्षोंको देखता भया और नीली सिवालाके समान कांतिवाले बहुतसे घासोंको पृथ्वीपे देखता भया ॥ ७ ॥ पीछे क्षुधासे पीड़ित होनेसे उन वृक्षोंके पत्तोंको खाता भया ॥ ८ ॥ फिर छह महीने पीछे सूखे वृक्षोंको खाता भया पीछे वह ऋषि एक महीनातक कंद अर्थात् लसुनकी जड़ोंको खाते भये वहां लहसन कंद भी खाया, फिर सुभिक्ष संवत् होगया ॥ ९ ॥ तब सब ऋषि एक जगह इकट्ठे हुए और वह वृद्ध ऋषि भी जहां वे थे उसी जगह जवान होके आया ॥ १० ॥ तब उसको देख आश्चर्यमें युक्त हो पूछते भये कि तैंने क्या किया ? फिर वह कुछ भी नहीं ३२