हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)
Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary
महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा
पृष्ठ 538, कुल 548 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५०६ ) हारीतसंहिता । [ षष्ठस्थाने- पिङ्गलः ॥ पित्तवांश्च नरो रूक्षः स्निग्धः श्यामः कफासृजा ॥३३॥ भृङ्गराजाजनाकारं वातेन दृष्टिमण्डलम् ॥ सूक्ष्मलोमा च कृष्णश्च रूक्षमूर्द्धजयान्वितः॥यस्य वातेन तं विद्धि नखसू- क्ष्मासितच्छविम् ॥३४॥ पित्तेन पीतश्च भवेदलोमा पिङ्गेक्षणा- भासपिशङ्गकेशः॥अलोमशः पीतनखप्रभःस्यात्क्षुधातुरश्चो- ष्मणकेन दृप्तः ॥ ३५ ॥ सलोमशो दृप्तकठोरकेशः श्याम- च्छविर्हृततनुर्विशालः ॥ सुस्निग्धदन्तः सितनेत्ररम्यो नख- च्छविः पाण्डुसुदीर्घनासः ॥ ३६ ॥ आत्रेयजी कहते हैं-हे पुत्र ! विरुद्ध जो स्थावर वृक्ष वेल आदिक हैं उनको तो धातुके संग बीज योगसहित प्रवृत्त होता है ॥ १३ ॥ हे पुत्र ! उनके भिन्न दृष्टि नहीं है सो सुनो संपूर्ण स्थावर वृक्ष आदिकोंके शिव और शक्तिको जान ॥ १४ ॥ वहां निश्चल तो शिव है और शक्ति व्याप्त हो रही है वहां स्त्री पुरुषके गुण संग ही प्रवृत्त होते हैं ॥ १५ ॥ इसवास्ते आमके पुष्प और फल संगमें ही प्रवृत्त होता है और बीजको वीर्यकी जगह जान और स्त्रियोंके रज ही वीर्य है और पुरुषके वीर्य बीजरूप है हे पुत्र ! इस वास्ते संयोगसे ही गर्भकी उत्पत्ति होती है ॥ १६ ॥ और पहले दिन वीर्यके संयोगसे बुलबुलाके आकार वीर्य स्थित होता है दशदिनमें रुधिर होजाता है ॥ १७ ॥ पंदरह दिनमें कड़ा होजाता है और बीसमें दिनमें मांसकी पिंडी होती है, २५ दिनमें पांच तत्त्वोंका संभव होता है ॥ १८ ॥ एक महीनामें उसके पांचों तत्त्व प्रकट होजाते हैं, पंचाशदिनोंमें अंकुरोंकी उत्पत्ति होजाती है ॥१९॥ तीन महीने होजावे तब हाथ पैर बढने लग जाते हैं साढे तीन महीनोंमें शिर प्रकट होजाता है ॥ २० ॥ चौथे महीनेमें रोम होते हैं और पांचवें महीनेमें जीव प्रकट होजाता है, छठे महीनेमें फुरने लगजाता है ॥ २१ ॥ पीछे आठमें महीनेमें उसके जठराग्निका योग होजाता है, नवमें महीनेमें उसको चेष्टा होती है ॥ २२ ॥ पीछे उसको गर्भवासके कारणसे वैराग्य होता है अर्थात् संसारसे दूर होनेका ज्ञान होता है, फिर दशवें महीनेमें उत्पन्न होता है ॥ २३ ॥ वातआदिक दोषोंके बलसे गर्भ जनता है, जो दशवां महीनातक दिन पूरे नहीं हुए हों ॥ २४ ॥ तो वह वातदोषसे प्रेरित हुआ गर्भ पहले ही उत्पन्न होजाता है हे महामते ! अब देहके वर्णज्ञानको कहते हैं ॥ २५ ॥ मनुष्यका वीर्य शुक्र अधिक होवे तो पुरुष जन्मे ॥ २६ ॥ और स्त्रीका वीर्य रज अधिक होवे और शुक्र हीन होवे तो कन्या जन्मे ॥ २७ ॥ सात धातुओंके बलसे प्रकृति और विकृति जब समान होजावे और रजस्वला होनेके स्त्रीके ऋतुसमयमें स्त्रियोंकी जैसी २ भावना हो ॥ २८ ॥ सत्त्वगुणी अथवा रजोगुणी