भारतकोश
हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

हारीत संहिता (महर्षि आत्रेय-हारीत मुनि संवाद - सम्पूर्ण ६ स्थान सटीक)

Harita Samhita of Sage Harita with Hindi Commentary

महर्षि हारीत / आत्रेय मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished548 पृष्ठ

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पांच तत्त्वोंकी अग्निसे पिंड होजाता है, पीछे पका हुआ वह पिंड कडा इकट्ठा होजावे तब उदान वायु पांच तत्त्व हाथ पैर आदिक-शिरआदिक अंग इनको उत्पन्न कर देता है और अन्तर हृदयमें स्थित हुआ एक ही वायु अनेक स्थानोंके आश्रय होके उस पिंडको देहके आकार कर देता है। उदान वायु तो गल हृदय इनमें स्थित होके देहमें मुखके द्वारको प्रकाशित कर देता है और अपानवायु नीचेको स्थित हो गुदाके द्वारको शोध देता है । ये सब भीतर रहनेवाले वायु पृथक् पृथक् मार्गमें छिद्र करके निकलते हैं वे ही नव द्वारोंको करते हैं। मुख, नासिका, कर्ण, नेत्र, गुदा, लिंग ऐसे ये ९ द्वार वायुसे होते हैं। वहां भीतर रहनेवाला वायु विस्तृत होके हाथ पैरआदिक अंगोंको उत्पन्न कर देता है ॥ ४१ ॥ और त्वचा, मांस, केश, रोम, अस्थि ये पृथ्वीतत्त्वसे उत्पन्न होते हैं। रस, रक्त, लार, मूत्र, वीर्य ये जलतत्त्वसे उत्पन्न होते हैं ॥४२॥ पित्त, नेत्र, अंधेरा, क्रोध, मोहादिक पांच ये अग्निसे होते हैं। कान, स्पर्श, ऊंचा श्वास, पसीना, चह- लकदमी आदि करना ॥ ४३ ॥ ये वातसे उत्पन्न होते हैं और मन, बुद्धि, निद्रा, आलस्य, मद ॥ ४४ ॥ ये पांच आकाश तत्त्वसे होते हैं। ऐसे सब शरीरोंमें व्यवस्था है और वातरक्तसे शरीरमें त्वचा होती है ॥ ४५ ॥ और मांस त्वचाके आश्रय कहा है और वीर्य तथा कफसे मेद उत्पन्न होता है और अस्थिरक्त इनसे रस होता है और हृदयमें पित्तका आश्रय है और वातरक्तसे युक्त यकृत् स्थान है ॥ ४६ ॥ रक्त, कफ, रस इनके आश्रय जांब है और कफरक्तके आश्रय तिल्लीस्थान है और कफरक्तके आश्रय मांसकी पेशी है ॥ ४७ ॥ यह पंच तत्त्वोंका शरीर है वहां आकाश शून्य है शून्यसे वायु उत्पन्न होता है वायुसे प्राण होते हैं फिर प्राणोंके अंशसे संपूर्ण जीवोंमें होनेवाला सत्त्वगुण होता है ॥ ४८ ॥ आकाशाज्जलंमुत्पन्नं जलाज्जाता वसुन्धरा ॥ तस्यास्तेजस्तथा जातं तेजसो जायते तमः ॥४९॥ पञ्चभूतात्मके देहे पञ्चेन्द्रि- यसमायुते॥भूतानाञ्च प्रधानो य आकाशमिति शब्दितः॥५०॥ आकाशात्तेजस्तेजसो दर्पो दर्पात्पराक्रम स्तस्मादहङ्कारस्ततः कोपःकोपात्तमस्तमसः पापमिति॥ आकाशात्सत्त्वं सत्त्वात्सत्यं सत्यात्तपस्तपसो नयो नयाद्विवेको विवेकाच्छान्तिः शान्त्या धर्म इति ॥ सत्त्वादद्रजो रजसः कामः कामाल्लौल्यं लौल्यादसत्य- मसत्यात्पापमिति॥रसात्कामः कामादभिलाषोऽभिलाषात्प्रजा प्रजाया मैत्री मैत्र्याःस्नेहः स्नेहान्मोहो मोहान्माया ततो भ्रान्ति- र्भ्रान्त्या मिथ्या ततोऽविद्या अविद्यायाः पुण्यपापानि पुण्य- पापेभ्यः सम्भव इति ॥५१॥ सत्त्वाच्च तम एव स्याज्जायते स्वपते