विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९२ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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नगरमें आ गये। वर्ष समाप्त होनेपर उर्वशी उनके पास फिर आयी ॥ ३८ ॥
उषितश्च तया सार्द्धमेकरात्रं महायशाः ।
उर्वश्याथाब्रवीद्दैलं गन्धर्वा वरदास्तव ॥ ३९ ॥
महायशस्वी पुरूरवा उसके साथ एक रात्रि रहे। तदनन्तर उर्वशीने पुरूरवासे कहा—'गन्धर्व आपको वर देना चाहते हैं ॥ ३९ ॥
तान् वृणीष्व महाराज ब्रूहि चैनांस्त्वमेव हि ।
वृणीष्व समतां राजन् गन्धर्वाणां महात्मनाम् ॥ ४० ॥
'महाराज ! अब आप वर माँग लीजिये। आप इनसे इन महात्मा गन्धर्वोंकी समता माँग लीजिये' ॥ ४० ॥
तथेत्युक्त्वा वरं वव्रे गन्धर्वांश्च तथास्त्विति ।
पूरयित्वाग्निना स्थालीं गन्धर्वाश्च तमब्रुवन् ॥ ४१ ॥
तब पुरूरवाने 'बहुत अच्छा' कहकर गन्धर्वोंसे वर माँग लिया। तब गन्धर्वोंने 'बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा,' कहकर एक थालीमें अग्नि भरकर पुरूरवासे कहा—॥ ४१ ॥
अनेनेष्ट्वा च लोकान्नः प्राप्स्यसि त्वं नराधिप ।
तानादाय कुमारांस्तु नगरायोपचक्रमे ॥ ४२ ॥
'राजन् ! इस अग्निसे यज्ञ करके तुम हमारे लोकोंमें आ जाओगे।' तब वे राजा (अग्नि और) अपने पुत्रोंको लेकर नगरकी ओर चले ॥ ४२ ॥
निक्षिप्याग्निमरण्ये तु सपुत्रस्तु गृहं ययौ ।
स त्रेताग्निं तु नापश्यदश्वत्थं तत्र दृष्टवान् ॥ ४३ ॥
(मार्गमें) उन्होंने वनमें अग्निको रख दिया और अपने पुत्रोंको लेकर घरमें प्रवेश किया। फिर वनमें जानेपर वहाँ उन्होंने अग्निको नहीं देखा; किंतु उसकी जगह एक पीपलके वृक्षको खड़ा देखा ॥ ४३ ॥
शमीजातं तु तं दृष्ट्वा अश्वत्थं विस्मितस्तदा ।
गन्धर्वेभ्यस्तदाशंसदग्निनाशं ततस्तु सः ॥ ४४ ॥
तब वे राजा (अग्निको अपने गर्भमें छिपानेवाले) शमी (जंड) के वृक्षमेंसे उत्पन्न हुए पीपलको देखकर विस्मयमें पड़ गये और उन्होंने गन्धर्वोंसे अग्निके न दीखनेका वृत्तान्त कहा ॥ ४४ ॥
श्रुत्वा तमर्थमखिलमरणीं तु समादिशन् ।
अश्वत्थादरणीं कृत्वा मथित्वाग्निं यथाविधि ॥ ४५ ॥
मथित्वाग्निं त्रिधा कृत्वा अयजत् स नराधिपः ।
इष्ट्वा यज्ञैर्बहुविधैर्गन्तस्तेषां सलोकताम् ॥ ४६ ॥
गन्धर्वोंने सब बातको सुनकर कहा, 'तुम पीपलकी अरणी बना लो' तब उन्होंने पीपलकी अरणी बनाकर शास्त्रीय विधिके अनुसार उन अरणियोंको मथकर अग्निको उत्पन्न किया। फिर उस अग्निके तीन विभाग किये। तदनन्तर उस अग्निसे उन्होंने यजन किया था। वे उस त्रेताग्निसे अनेक प्रकारके यज्ञ कर गन्धर्वोंकी समानता पाकर गन्धर्वोंके लोकमें पहुँच गये ॥ ४५-४६ ॥
गन्धर्वेभ्यो वरं लब्ध्वा त्रेताग्निं समकारयत् ।
एकोऽग्निः पूर्वमेवासीदैलेस्त्रेतामकारयत् ॥ ४७ ॥
राजा पुरूरवाने गन्धर्वोंसे वर पाकर त्रेताग्निकी रचना की थी। पहले अग्नि एक ही था, पुरूरवाने उसको तीन बनाया था ॥ ४७ ॥
एवंप्रभावो राजासीदैलस्तु नरसत्तम ।
देशे पुण्यतमे चैव महर्षिभिरभिष्टुते ॥ ४८ ॥
राज्यं स कारयामास प्रयागे पृथिवीपतिः ।
उत्तरे जाह्नवीतीरे प्रतिष्ठाने महायशाः ॥ ४९ ॥
नरश्रेष्ठ ! राजा पुरूरवा ऐसे प्रतापी थे। उन महायशस्वी पृथ्वीपतिने गङ्गाके उत्तर तटपर बसे हुए महर्षियोंसे प्रशंसित परम पवित्र प्रतिष्ठान (झूँसी—प्रयाग) में राज्य किया था ॥ ४८-४९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि ऐलोत्पत्तिर्नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पुरूरवाकी उत्पत्तिविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
सप्तविंशोऽध्यायः
पुरूरवाके द्वितीय पुत्र अमावसुके वंशका वर्णन, विश्वामित्र और परशुरामकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
ऐलपुत्रा बभूवुस्ते सर्वे देवसुतोपमाः ।
दिवि जाता महात्मान आयुर्धीमानमावसुः ॥ १ ॥
विश्वायुश्चैव धर्मात्मा श्रुतायुश्च तथापरः ।
दृढायुश्च वनायुश्च शतायुश्चोर्वशीसुताः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! पुरूरवाके सभी पुत्र देवकुमारोंके तुल्य थे। वे सब महात्मा उर्वशीके गर्भसे स्वर्गमें उत्पन्न हुए थे। (उनके नाम इस प्रकार हैं—) आयु, बुद्धिमान् अमावसु, धर्मात्मा विश्वायु, श्रुतायु, दृढायु, वनायु और शतायु ॥ १-२ ॥
अमावसोश्च दायादो भीमो राजाथ नग्नजित् ।
श्रीमान् भीमस्य दायादो राजासीत् काञ्चनप्रभः ।