भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 117
९४श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

बुलाकर कहा—‘तू इस चरुका उपयोग करना और इस (दूसरे) चरुका उपयोग करनेके लिये अपनी मातासे कहना ॥ १९॥
तस्यां जनिष्यते पुत्रो दीप्तिमान् क्षत्रियर्षभः।
अजेयः क्षत्रियैर्लोके क्षत्रियर्षभसूदनः ॥ २० ॥
‘तुम्हारी माताके जो पुत्र होगा, वह क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ, दीप्तिमान्, संसारमें क्षत्रियोंसे अजेय और बड़े-बड़े क्षत्रियोंको दबानेवाला होगा ॥ २० ॥
तवापि पुत्रं कल्याणि धृतिमन्तं तपोनिधिम्।
शमात्मकं द्विजश्रेष्ठं चरुरेव विधास्यति ॥ २१ ॥
‘कल्याणि ! यह चरु तुम्हें भी धैर्यधारी तपोनिधि शान्तस्वरूप द्विजश्रेष्ठ पुत्र देगा’ ॥ २१ ॥
एवमुक्त्वा तु तां भार्यामृचीको भृगुनन्दनः।
तपस्यभिरतो नित्यमरण्यं प्रविवेश ह ॥ २२ ॥
सदा तपस्यामें ही तत्पर रहनेवाले भृगुनन्दन ऋचीक अपनी पत्नीसे इस प्रकार कहकर (तप करनेके लिये) वनमें चले गये ॥ २२ ॥
गाधिः सदारस्तु तदा ऋचीकावासमभ्यगात्।
तीर्थयात्राप्रसङ्गेन सुतां द्रष्टुं जनेश्वरः॥ २३ ॥
उसी समय राजा गाधि अपनी भार्याके साथ तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे अपनी पुत्रीको देखनेके लिये ऋचीक ऋषिके आश्रमपर आये ॥ २३ ॥
चरुद्वयं गृहीत्वा तदृषेः सत्यवती तदा।
चरुमादाय यत्नेन सा तु मात्रे न्यवेदयत् ॥२४ ॥
तब सत्यवतीने ऋषिके दिये हुए दोनों चरुओंको ग्रहण करके उन्हें यत्नपूर्वक अपनी माताके सामने लाकर रख दिये ॥ २४॥
माता व्यत्यस्य दैवेन दुहित्रे स्वं चरुं ददौ।
तस्याश्चरुमथाज्ञानादात्मसंस्थं चकार ह ॥ २५ ॥
तब दैववश माताने चरु बदलकर पुत्रीको अपना चरु दे दिया और उसने अज्ञानवश पुत्रीके चरुको स्वयं खा लिया ॥ २५ ॥
अथ सत्यवती गर्भं क्षत्रियान्तकरं तदा।
धारयामास दीप्तेन वपुषा घोरदर्शनम् ॥ २६ ॥
तदनन्तर सत्यवतीने क्षत्रियोंका संहार करनेवाले गर्भको धारण कर लिया, जो अपने शरीरकी कान्तिके कारण घोर (क्रूर) दीखने लगा॥ २६ ॥
तामृचीकस्ततो दृष्ट्वा योगेनाभ्यनुसृत्य च।
तामब्रवीद् द्विजश्रेष्ठः स्वां भार्यां वरवर्णिनीम् ॥ २७ ॥
उसको देखकर ऋषिने ध्यानके द्वारा सारी बातोंको जान लिया। फिर द्विजश्रेष्ठ ऋचीक ऋषि अपनी श्रेष्ठ अङ्गोंवाली भार्यासे कहने लगे—॥ २७ ॥
मात्रासि वञ्चिता भद्रे चरुव्यत्यासहेतुना।
जनिष्यति हि पुत्रस्ते क्रूरकर्मातिदारुणः ॥ २८ ॥
भ्राता जनिष्यते चापि ब्रह्मभूतस्तपोधनः।
विश्वं हि ब्रह्म तपसा मया तस्मिन् समर्पितम् ॥ २९ ॥
‘भद्रे ! माताने तुझे ठग लिया है, चरुमें उलट-फेर होनेसे तेरा पुत्र अत्यन्त दारुण क्रूर कार्य करनेवाला होगा और तेरा भाई तपस्याका धनी एवं ब्रह्मस्वरूप होगा, मैंने तपके द्वारा उस (चरु) में सारा वेद भर दिया था’ ॥ २८-२९ ॥
एवमुक्ता महाभागा भर्त्रा सत्यवती तदा।
प्रसादयामास पतिं पुत्रो मे नेदृशो भवेत्।
ब्राह्मणापसदस्तत्र इत्युक्तो मुनिरब्रवीत् ॥ ३० ॥
पतिके इस प्रकार कहनेपर महाभाग्यवती सत्यवती स्वामीको प्रसन्न करके बोली—‘मेरा पुत्र ऐसा ब्राह्मणाधम न हो।’ तब मुनिने उससे कहा—॥ ३० ॥
नैष संकल्पितः कामो मया भद्रे तथास्त्विति।
उग्रकर्मा भवेत् पुत्रः पितुर्मातृश्च कारणात्।
पुनः सत्यवती वाक्यमेवमुक्ताब्रवीदिदम् ॥ ३१ ॥
‘भद्रे ! पिता अथवा माताके कारण ही पुत्र क्रूर कर्म करनेवाला हो जाता है, मैंने तो उग्र कर्म करनेवाले पुत्रकी कामना नहीं की थी (परंतु तेरी ही असावधानीसे चरुका उलट-फेर हो गया है अतएव ऐसा ही पुत्र होगा)।’ इस प्रकार कहनेपर सत्यवतीने फिर कहा—॥ ३१ ॥
इच्छँल्लोकानपि मुने सृजेथाः किं पुनः सुतम्।
शमात्मकंऋजुं त्वं मे पुत्रं दातुमर्हसि ॥ ३२ ॥
‘मुने ! आप चाहें तो तीनों लोकोंका निर्माण कर सकते हैं, फिर पुत्रकी तो बात ही क्या ? आप तो मुझे शमपरायण सरल पुत्र ही प्रदान करें’ ॥ ३२ ॥
काममेवंविधः पौत्रो मम स्यात्तव च प्रभो।
यद्यन्यथा न शक्यं वै कर्तुमेतद् द्विजोत्तम ॥ ३३ ॥
‘प्रभो ! द्विजश्रेष्ठ ! यदि इस बातको पलटा न जा सके तो भले ही आपका और मेरा पौत्र ऐसा हो जाय’ ॥ ३३ ॥
ततः प्रसादमकरोत्स तस्यास्तपसो बलात्।
भद्रे नास्ति विशेषो मे पौत्रे च वरवर्णिनि।
त्वया यथोक्तं वचनं तथा भद्रं भविष्यति ॥ ३४ ॥
तब उन्होंने अपने तपोबलसे उसके ऊपर अनुग्रह किया और कहा—‘भद्रे ! वरवर्णिनि ! मैं (पुत्रमें और) पौत्रमे कुछ भेद नहीं समझता, अतः तूने जो कहा है, वह वैसा ही होगा’ ॥ ३४ ॥
ततः सत्यवती पुत्रं जनयामास भार्गवम्।
तपस्यभिरतं दान्तं जमदग्निं शमात्मकम् ॥ ३५ ॥