भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 128

हरिवंशपर्व ] त्रिंशोऽध्यायः १०५


तेषां ययातिः पञ्चानां विजित्य वसुधामिमाम् ।
देवयानीमुशनसः सुतां भार्यामवाप सः ।
शर्मिष्ठामासुरीं चैव तनयां वृषपर्वणः ॥ ४ ॥
शेष पाँच भाइयोंमें ययातिने इस पृथ्वीको जीतकर शुक्राचार्यकी पुत्री देवयानी तथा असुरराज वृषपर्वाकी कन्या शर्मिष्ठाको भी पत्नीके रूपमें प्राप्त किया ॥ ४ ॥

यदुं च तुर्वसुं चैव देवयानी व्यजायत ।
द्रुह्यं चानुं च पूरुं च शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी ॥ ५ ॥
देवयानीने यदु और तुर्वसुको जन्म दिया तथा वृषपर्वाकी पुत्री शर्मिष्ठाने द्रुह्यु, अनु तथा पूरु—ये तीन पुत्र उत्पन्न किये ॥ ५ ॥

तस्मै शक्रो ददौ प्रीतो रथं परमभास्वरम् ।
असङ्गं काञ्चनं दिव्यं दिव्यैः परमवाजिभिः ॥ ६ ॥
युक्तं मनोजवैः शुभ्रैर्येन भार्यामुवाह सः ।
ययातिपर प्रसन्न होकर इन्द्रने उन्हें एक अत्यन्त प्रकाशमान रथ प्रदान किया, जिसमें मनके समान वेगशाली, दिव्य, उत्तम एवं श्वेतवर्णके अश्व जुते हुए थे । वह दिव्य रथ सोनेका बना हुआ था । उसकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी । उसी रथके द्वारा वे अपनी भार्याको ब्याहकर लाये थे ॥ ६१/२ ॥

स तेन रथमुख्येन षडरात्रेणाजयन्महीम् ।
ययातिर्युधि दुर्धर्षस्तथा देवान् सदानवान् ॥ ७ ॥
उस श्रेष्ठ रथके द्वारा दुर्धर्ष राजा ययातिने छः रातोंमें ही सम्पूर्ण पृथ्वी तथा देवताओं और दानवोंको भी जीत लिया था ॥ ७ ॥

स रथः पौरवाणां तु सर्वेषामभवत् तदा ।
यावसु वसुनाम्नो वै कौरवाज्जनमेजय ॥ ८ ॥
जनमेजय ! कुरुवंशी राजा वसुतक सभी पौरव नरेशोंके पास वह रथ परम्परया प्राप्त होकर विद्यमान था ॥ ८ ॥

कुरोः पुत्रस्य राजेन्द्र राज्ञः पारीक्षितस्य ह ।
जगाम स रथो नाशं शापाद् गार्ग्यस्य धीमतः ॥ ९ ॥
राजेन्द्र ! कुरुवंशी परीक्षित्-कुमार इन्द्रोत जनमेजयको बुद्धिमान् गार्ग्यका शाप प्राप्त होनेके कारण वह रथ उनके यहाँसे अदृश्य हो गया ॥ ९ ॥

गार्ग्यस्य हि सुतं बालं स राजा जनमेजयः ।
वाक्छूरं हिंसयामास ब्रह्महत्यामवाप सः ॥ १० ॥
बात यह थी कि गार्ग्यके एक बालक पुत्र था, जो बड़ा ही वाचाल था । उसे इन्द्रोत नामवाले राजा जनमेजयने मार डाला । इससे उन्हें ब्रह्महत्या प्राप्त हुई ॥ १० ॥

स लोहगन्धी राजर्षिः परिधावन्नितस्ततः ।
पौरजानपदैस्त्यक्तो न लेभे शर्म कर्हिचित् ॥ ११ ॥
पुरवासियों तथा जनपदके लोगोंने उन्हें त्याग दिया । उनके शरीरसे लोहेकी-सी गन्ध आती थी ( अथवा वे पतितके समान जान पड़ते थे ) । राजर्षि इन्द्रोत इधर-उधर भागते-फिरते थे, किंतु कहीं भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥

ततः स दुःखसंतप्तो नालभत् संविदं क्वचित् ।
इन्द्रोतः शौनकं राजा शरणं प्रत्यपद्यत ॥ १२ ॥
जब कहीं भी स्वस्थ होनेका उपाय नहीं सूझा, तब दुःखसे संतप्त हुए राजा इन्द्रोत शौनक मुनिकी शरणमें गये ॥ १२ ॥

याजयामास चेन्द्रोतं शौनको जनमेजयम् ।
अश्वमेधेन राजानं पावनार्थं द्विजोत्तमः ॥ १३ ॥
द्विजश्रेष्ठ शौनक राजा इन्द्रोत जनमेजयको शुद्ध करनेके लिये उनसे अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान करवाया ॥ १३ ॥

स लोहगन्धो व्यनशत् तस्यावभृथमेत्य ह ।
स च दिव्यो रथो राजन् वसोश्चेदिपतेस्तदा ।
दत्तः शक्रेण तुष्टेन लेभे तस्माद् बृहद्रथः ॥ १४ ॥
उस यज्ञके अन्तमें अवभृथ स्नान कर लेनेपर इन्द्रोतका पाप दूर हो गया और उनके शरीरसे जो लोहेकी-सी गन्ध आती थी, वह मिट गयी । राजन् ! तत्पश्चात् इन्द्रने संतुष्ट होकर वह दिव्य रथ चेदिराज उपरिचर वसुको दे दिया । फिर वसुसे वह रथ मगधराज बृहद्रथको मिला ॥ १४ ॥

बृहद्रथात् क्रमेणैव गतो बार्हद्रथं नृपम् ।
ततो हत्वा जरासंधं भीमस्तं रथमुत्तमम् ॥ १५ ॥
प्रददौ वासुदेवाय प्रीत्या कौरवनन्दनः ।
बृहद्रथसे क्रमशः वह रथ उनके पुत्र राजा जरासंधको प्राप्त हुआ । तत्पश्चात् कौरवकुलको आनन्दित करनेवाले भीमसेनने जरासंधको मारकर वह उत्तम रथ प्रसन्नतापूर्वक भगवान् श्रीकृष्णको दे दिया ॥ १५१/२ ॥

सप्तद्वीपां ययातिस्तु जित्वा पृथ्वीं ससागराम् ॥ १६ ॥
व्यभजत् पञ्चधा राजन् पुत्राणां नाहुषस्तदा ।
राजन् ! नहुषनन्दन राजा ययातिने समुद्र और सातों द्वीपोंसहित सारी पृथ्वीको जीतकर उसके पाँच भाग किये और उन्हें अपने पाँचों पुत्रोंमें बाँट दिया ॥ १६१/२ ॥

दिशि दक्षिणपूर्वस्यां तुर्वसुं मतिमान् नृपः ॥ १७ ॥
प्रतीच्यामुत्तरस्यां च द्रुह्यं चानुं च नाहुषः ।
दिशि पूर्वोत्तरस्यां वै यदुं ज्येष्ठं न्ययोजयत् ॥ १८ ॥
उन बुद्धिमान् नरेशने दक्षिण-पूर्व दिशामें तुर्वसुको, पश्चिममें द्रुह्युको और उत्तर दिशामें अनुको अभिषिक्त करके पूर्वोत्तर दिशाके ( ईशान कोण ) राज्यपर ज्येष्ठ पुत्र यदुको नियुक्त कर दिया ॥ १७-१८ ॥

मध्ये पूरुं च राजानमभ्यषिञ्चत नाहुषः ।
तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपत्तना ॥ १९ ॥