विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे .
एकत्रिंशोऽध्यायः
पूरुकी वंशपरम्पराका वर्णन
जनमेजय उवाच
पूरोर्वंशमहं ब्रह्मञ्छ्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः।
द्रुह्योरुर्गोर्यदोश्चैव तुर्वसोश्च पृथक् पृथक् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा— ब्रह्मन् ! मैं पूरु, द्रुह्यु, अनु, यदु और तुर्वसुके वंशका पृथक्-पृथक् यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ ॥ १ ॥
वृष्णिवंशप्रसङ्गेन स्वं वंशं पूर्वमेव तु।
विस्तरेणानुपूर्व्या च तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ २ ॥
वृष्णिवंशके प्रसंगसे इन सबका वर्णन मुझे सुनना है; परंतु सबसे पहले मैं अपने ही वंश (पूरू-कुल) का क्रमशः विस्तारपूर्वक वर्णन सुनना चाहता हूँ। अतः आप पहले उसीका वर्णन करें ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणु पुरोर्महाराज वंशमुत्तमपौरुषम् ।
विस्तरेणानुपूर्व्या च यत्र जातोऽसि पार्थिव ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी बोले— महाराज ! उत्तम पराक्रमसे सम्पन्न पूरुवंशका, जिसमें तुम्हारा जन्म हुआ है, मैं क्रमानुसार विस्तारपूर्वक वर्णन करता हूँ। पृथ्वीनाथ ! तुम इसे सुनो ॥ ३ ॥
हन्त ते कीर्तयिष्यामि पूरोर्वंशमनुत्तमम् ।
द्रुह्योश्चानोर्यदोश्चैव तुर्वसोश्च नराधिप ॥ ४ ॥
नरेश्वर ! मैं बड़े हर्षके साथ तुमसे परम उत्तम पूरुवंशका वर्णन करूँगा। फिर द्रुह्यु, अनु, यदु तथा तुर्वसुके वंशका कीर्तन किया जायगा ॥ ४ ॥
पूरोः पुत्रो महावीर्यो राजाऽऽसीज्जनमेजयः।
प्रचिन्वांस्तु सुतस्तस्य यः प्राचीमजयद् दिशम् ॥ ५ ॥
पूरुके महापराक्रमी पुत्र राजा जनमेजय हुए। उनके पुत्रका नाम प्रचिन्वान् था; जिन्होंने पूर्वदिशाको जीता था ॥ ५ ॥
प्रचिन्वतः प्रवीरोऽभून्मनस्युस्तस्य चात्मजः।
राजा चाभयदो नाम मनस्योरभवत् सुतः ॥ ६ ॥
प्रचिन्वानके पुत्र प्रवीर और प्रवीरके मनस्यु हुए, मनस्युके पुत्र राजा अभयद थे ॥ ६ ॥
तथैवाभयदस्यासीत् सुधन्वा तु महीपतिः।
सुधन्वनो बहुगवः शम्यातिस्तस्य चात्मजः ॥ ७ ॥
अभयदके पुत्रका नाम सुधन्वा था, जो इस पृथ्वीका अधिपति हुआ। सुधन्वाके बहुगव और बहुगवके पुत्र शम्याति हुए ॥ ७ ॥
शम्यातेस्तु रहस्याती रौद्राश्वस्तस्य चात्मजः।
रौद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः ॥ ८ ॥
शम्यातिके रहस्याति और रहस्यातिके पुत्र रौद्राश्व हुए। रौद्राश्वके घृताची अप्सराके गर्भसे दस पुत्र हुए ॥ ८ ॥
ऋचेयुः प्रथमस्तेषां कृकणेयुस्तथैव च।
कक्षेयुः स्थण्डिलेयुश्च सन्नतेयुस्तथैव च ॥ ९ ॥
दशार्णेयुर्जलेयुश्च स्थलेयुश्च महायशाः।
धनेयुश्च वनेयुश्च पुत्रिकाश्च दश स्त्रियः ॥ १० ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—ऋचेयु अपने सभी भाइयोंमें ज्येष्ठ थे। उनके बाद कृकणेयु, कक्षेयु, स्थण्डिलेयु, सन्नतेयु, दशार्णेयु, जलेयु, महायशस्वी स्थलेयु, धनेयु और वनेयु थे। इनके सिवा रौद्राश्वके दस कन्याएँ भी थीं, जो पुत्रिका-धर्मके अनुसार ब्याही जानेवाली थीं ॥ ९-१० ॥
रुद्रा शूद्रा च भद्रा च मलदा मलहा तथा।
खलदा चैव राजेन्द्र नलदा सुरसापि च।
तथा गोचपला तु स्त्रीरत्नकूटा च ता दश ॥ ११ ॥
राजेन्द्र ! उन कन्याओंके नाम इस प्रकार हैं—रुद्रा, शूद्रा, भद्रा, मलदा, मलहा, खलदा, नलदा, सुरसा, गोचपला तथा स्त्रीरत्नकूटा—ये कुल मिलाकर दस थीं ॥ ११ ॥
ऋषिर्जातोऽथ्र्यिवंशे तु तासां भर्ता प्रभाकरः।
रुद्रायां जनयामास सुतं सोमं यशस्विनम् ॥ १२ ॥
अत्रिकुलमें उत्पन्न महर्षि प्रभाकर उन सबके पति हुए। उन्होंने रुद्राके गर्भसे यशस्वी सोमको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया ॥ १२ ॥
स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम्।
तमोऽभिभूते लोके च प्रभा येन प्रवर्तिता ॥ १३ ॥
राहुसे आहत होकर जब सूर्य आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे और समस्त संसारमें अन्धकार छा गया, उस समय प्रभाकरने ही अपनी प्रभा फैलायी ॥ १३ ॥
स्वस्ति तेऽस्त्विति चोक्तो वै पतमानो दिवाकरः।
वचनात् तस्य विप्रर्षेर्न पपात दिवो महीम् ॥ १४ ॥
महर्षिने गिरते हुए सूर्यको 'तुम्हारा कल्याण हो' यह कहकर आशीर्वाद दिया। उन ब्रह्मर्षिके इस वचनसे सूर्यदेव पृथ्वीपर नहीं गिरे ॥ १४ ॥
अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश्चकार महातपाः।
यज्ञेष्वत्रेर्धनं चैव सुरैर्यस्य प्रवर्तितम् ॥ १५ ॥
महातपस्वी प्रभाकरने सब गोत्रोंमें अत्रिगोत्रकी ही श्रेष्ठता स्थापित की। अत्रिके यज्ञोंमें उन्हींके प्रभावसे देवताओंने धन प्रस्तुत किया था ॥ १५ ॥
स तासु जनयामास पुत्रिकासु सनामकान्।
दश पुत्रान् महात्मा स तपस्युग्रे रतान् सदा ॥ १६ ॥