विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| १२४ | श्रीमद्भारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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(वसुदेवजीके भाई) कनककके तन्द्रिज और तन्द्रिपाल नामक दो पुत्र हुए तथा शृञ्जिमके वीर और अश्वहन नामक दो वीर पुत्र उत्पन्न हुए ॥ ३८ ॥
श्यामुपुत्रः शमीकस्तु शमीको राज्यमावहत् ।
जुगुप्समानौ भोजत्वाद् राजसूयमवाप सः ।
अजातशत्रुः शत्रूणां जज्ञे तस्य विनाशनः ॥ ३९ ॥
(वसुदेवजीके भाई श्याम अपने छोटे भाई शमीकको अपने पुत्रके समान मानते थे। इस कारण) श्यामके पुत्र शमीक हुए। इन शमीकने राज्य किया था, उन्होंने भोज होनेके कारण (अर्थात् भोजवंशी एक वंशके और एक देशके ही राजा हैं—यह) निन्दा मानकर उन्होंने राजसूय (साम्राज्य) पाया था। शमीकके शत्रुनाशक अजातशत्रु नामक पुत्र हुआ ॥ ३९ ॥
वसुदेवसुतान् धीरान् कीर्तयिष्यामि ताञ्छृणु ॥ ४० ॥
अब मैं वसुदेवजीके वीर पुत्रोंका वर्णन करता हूँ, उसको आप सुनिये ॥ ४० ॥
वृष्णेस्त्रिविधमेतत् तु बहुशाखं महौजसम् ।
धारयन् विपुलं वंशं नान्यैररिष्टैर् युज्यते ॥ ४१ ॥
जो मनुष्य वृष्णिके बहुत-सी शाखाओंवाले, महापराक्रमी पुरुषोंसे सुशोभित इस तीन प्रकारके बड़े विशाल वंशके वृत्तान्तको मनमें धारण करता है, वह इस संसारके अनर्थोंसे मुक्त रहता है ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि वृष्णिवंशकीर्तनं नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें वृष्णिवंशका कीर्तनविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका अवतार लेना, श्रीकृष्णके अन्य भाई-बहिनों और कुटुम्बियोंका वर्णन तथा कालयवनकी उत्पत्ति
वैशम्पायन उवाच
याः पत्न्यो वसुदेवस्य चतुर्दश वराङ्गनाः ।
पौरवी रोहिणी नाम इन्दिरा च तथा वरा ॥ १ ॥
वैशाखी च तथा भद्रा सुनाम्नी चैव पञ्चमी ।
सहदेवा शान्तिदेवा श्रीदेवी देवरक्षिता ॥ २ ॥
वृकदेव्युपदेवी च देवकी चैव सप्तमी ।
सुतनुर्वडवा चैव द्वे एते परिचारिके ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! वसुदेवजीकी जो चौदह सुन्दराङ्गी पत्नियाँ थीं, उनमें रोहिणी और रोहिणीसे छोटी इन्दिरा, वैशाखी, भद्रा तथा पाँचवीं सुनाम्नी—ये पाँच पौरव-वंशकी थीं तथा सहदेवा, शान्तिदेवा, श्रीदेवी, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और सातवीं देवकी—ये सात देवककी पुत्रियाँ थीं तथा सुतनु और वडवा—ये दो उनकी परिचर्या करनेवाली स्त्रियाँ थीं ॥ १-३ ॥
पौरवी रोहिणी नाम बाह्लीकस्यात्मजाभवत् ।
ज्येष्ठा पत्नी महाराज दयिताऽऽनकदुन्दुभेः ॥ ४ ॥
महाराज ! पौरव-वंशकी कुमारी रोहिणी (महाराज शन्तनुके बड़े भाई) बाह्लीककी पुत्री थीं, वे वसुदेवजीकी प्रियतमा बड़ी पत्नी थीं ॥ ४ ॥
लेभे ज्येष्ठं सुतं रामं सारणं शठमेव च ।
दुर्दं दमनं श्वभ्रं पिण्डारकमुशीनरम् ॥ ५ ॥
चित्रां नाम कुमारीं च रोहिणीतनया दश ।
चित्रा सुभद्रेति पुनर्विख्याता कुरुनन्दन ॥ ६ ॥
कुरुनन्दन ! रोहिणीके ज्येष्ठ पुत्र बलराम और (उनसे छोटे) सारण, शठ, दुर्दम, दमन, श्वभ्र, पिण्डारक और उशीनर हुए तथा चित्रा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई । (यह चित्रा एक अप्सरा थी, जो रोहिणीके गर्भसे उत्पन्न होते ही मर गयी थी । इसने मरते समय अपनेको धिक्कारा था कि मैं यादवकुलमें जन्म धारण करके भी यदुवंशमें उत्पन्न होनेवाले भगवान्की लीलाको न देख सकी । इस वासनाके कारण) यह चित्रा ही दूसरी बार सुभद्रा बनकर उत्पन्न हुई थी । इस प्रकार रोहिणीके दस संतानें उत्पन्न हुईं ॥ ५-६ ॥
वसुदेवाच्च देवक्यां जज्ञे शौरिर्महायशाः ।
रामाच्च निशाठो जज्ञे रेवत्यां दयितः सुतः ॥ ७ ॥
वसुदेवसे देवकीमें महायशस्वी श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए और बलरामजीसे रेवतीके द्वारा उनके प्रिय पुत्र निशाठ उत्पन्न हुए ॥
सुभद्रायां रथी पार्थादभिमन्युरजायत ।
अक्रूरात् काशिकन्यायां सत्यकेतुरजायत ॥ ८ ॥