भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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हरिवंशपर्व ] षट्त्रिंशोऽध्यायः [ १२७

रुक्मकवचने युद्धमें धनुष और कवचको धारण करने- वाले सौ योद्धाओंको मारकर बड़ी भारी कीर्ति पायी थी ॥

जज्ञेऽथ रुक्मकवचात् पराजित् परवीरहा । जज्ञिरे पञ्च पुत्रास्तु महावीर्याः पराजितः ॥ ११ ॥

रुक्मकवचके पुत्र शत्रुवीरनाशक पराजित् हुए, पराजित्- के महावीर्यवान् पाँच पुत्र हुए ॥ ११ ॥

रुक्मेषुः पृथुरुक्मश्च ज्यामघः पालितो हरिः । पालितं च हरिं चैव विदेहेभ्यः पिता ददौ ॥ १२ ॥

( उनके नाम इस प्रकार हैं— ) रुक्मेपु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, पालित और हरि । उनके पिता पराजित्ने पालित और हरिको विदेह देशका पालन करनेके लिये वहाँके राजाको दे दिया था ॥ १२ ॥

रुक्मेषुरभवद् राजा पृथुरुक्मस्य संश्रितः । ताभ्यां प्रव्राजितो राज्याज्ज्यामघोऽवसदाश्रमे ॥ १३ ॥

रुक्मेपु पृथुरुक्मका आश्रय लेकर राजा बन गया था, उन दोनोंने ज्यामघको राज्यसे निकाल दिया, तब ज्यामघ आश्रममे रहने लगा ॥ १३ ॥

प्रशान्तः स वनस्थस्तु ब्राह्मणैश्चावबोधितः । जिगाय रथमास्थाय देशमन्यं ध्वजी रथी ॥ १४ ॥

वह (वृद्ध होनेसे) शान्त होकर वनमे पड़ा रहता था, परंतु ब्राह्मणोंने तप आदिके द्वारा उसको बलवान् बना दिया; तब रथी ज्यामघने एक ध्वजावाले रथमें बैठकर एक दूसरे देशको जीत लिया ॥ १४ ॥

नर्मदाकूलमेकाकी नगरीं मृत्तिकावतीम् । ऋक्षवन्तं गिरिं जित्वा शुक्तिमत्यामुवास सः ॥ १५ ॥

उसने अकेले ही नर्मदाके किनारेकी मृत्तिकावती नगरी और ऋक्षवान् पर्वतको जीतकर शुक्तिमतीपुरीमें अपना निवास-स्थान बनाया ॥ १५ ॥

ज्यामघस्याभवद् भार्या शैव्या बलवती सती । अपुत्रोऽपि च राजा स नान्यां भार्यामविन्दत ॥ १६ ॥

ज्यामघकी भार्या सती शैव्या बड़ी बलवती थी, इस- लिये ज्यामघने पुत्रहीन होनेपर भी दूसरा विवाह नहीं किया ॥ १६ ॥

तस्यासीद् विजयो युद्धे तत्र कन्यामवाप सः । भार्यामुवाच संत्रस्तः स्नुषेति स नरेश्वरः ॥ १७ ॥

उसने एक युद्धमें विजय होनेपर एक कन्या प्राप्त की। उस नरेश्वरने डरकर अपनी भार्यासे उस कन्याको स्नुषा (पुत्रवधू) कह दिया ॥ १७ ॥

एतच्छ्रुत्वाऽब्रवीद् देवी कस्य चेयं स्नुषेति वै । अब्रवीत् तदुपश्रुत्य ज्यामघो राजसत्तमः ॥ १८ ॥

यह सुनकर पत्नीने पूछा—'यह किसकी पुत्रवधू है?' तब राजसत्तम ज्यामघने प्रतिज्ञा करके कहा— ॥ १८ ॥

यस्ते जनिष्यते पुत्रस्तस्य भार्योपदानवी । उग्रेण तपसा तस्याः कन्यायाः सा व्यजायत । पुत्रं विदर्भं सुभगा शैव्या परिणता सती ॥ १९ ॥

तेरे जो पुत्र उत्पन्न होगा, यह उपदानवी कन्या उसकी भार्या होगी । उस उपदानवी कन्याकी उग्र तपस्याके प्रभावसे सौभाग्यवती शैव्याके बूढ़ी होनेपर भी उसके विदर्भ नामका एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १९ ॥

राजपुत्र्यां तु विद्वांसौ स्नुषायां क्रथकौशिकौ । पश्चाद् विदर्भोज्जनयच्छूरौ रणविशारदौ ॥ २० ॥

तदनन्तर विदर्भने उस राजकुमारीसे शूरवीर एवं रणविशारद क्रथ और कौशिक नामके दो विद्वान् पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ २० ॥

लोमपादं तृतीयं तु पुत्रं परमधार्मिकम् । लोमपादात्मजो बभ्रुराहूतिस्तस्य चात्मजः ॥ २१ ॥

तथा लोमपाद नामक एक तीसरे परम धार्मिक पुत्रको भी उत्पन्न किया। लोमपादके पुत्र बभ्रु हुए और उनके पुत्र हुए आहुति ॥ २१ ॥

आहुतेः कौशिकश्चैव विद्वान् परमधार्मिकः । चेदिः पुत्रः कौशिकस्य तस्माच्चैद्या नृपाः स्मृताः ॥ २२॥

आहुतिके पुत्र कौशिक हुए, वे विद्वान् और परम धार्मिक थे । कौशिकके पुत्र चेदि हुए, इस कारण उनके वंशके राजा चैद्य कहलाते हैं ॥ २२ ॥

भीमो विदर्भस्य सुतः कुन्तिस्तस्यात्मजोऽभवत्। कुन्तेर्घृष्टसुतो जज्ञे रणधृष्टः प्रतापवान् । धृष्टस्य जज्ञिरे शूरास्त्रयः परमधार्मिकाः ॥ २३ ॥ आवन्तश्च दशार्हश्च बली विषहरश्च यः । दशार्हस्य सुतो व्योमा व्योम्नो जीमूत उच्यते ॥ २४ ॥

विदर्भका (चौथा) पुत्र भीम हुआ, भीमके पुत्र कुन्ति