विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
एतानि कृत्वा कर्माणि रामो धर्मभृतां वरः। दशाश्वमेधाञ्जारूढ्यानाजहार निरर्गलान् ॥१४१॥ इन सब (पराक्रमपूर्ण) कर्मोंका सम्पादन करके धर्मत्माओं- में श्रेष्ठ श्रीरामने तीनगुनी दक्षिणासे युक्त दस अश्वमेध यज्ञ किये, जो बिना किसी विघ्न बाधाके पूर्ण हो गये ॥ १४१ ॥
नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नाकुलं मारुतो ववौ । न वित्तहरणं त्वासीद् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४२॥ श्रीरामचन्द्रजी जब राज्यका शासन करते थे, उन दिनों कहीं अशुभ बातें नहीं सुनी जाती थीं, वायु प्रचण्ड वेगसे नहीं चलती थी तथा कोई किसीके धनका अपहरण नहीं करता था ॥ १४२ ॥
पर्यदेवन्न विधवा नानर्थाश्चाभवंस्तदा । सर्वमासीज्जगद् दान्तं रामे राज्यं प्रशासति ॥१४३॥ श्रीरामके राज्य-शासनकालमें कभी विधवाओंका करुण क्रन्दन नहीं सुना गया। कहीं भी अनर्थपूर्ण घटनाएँ नहीं घटित हुईं। सारे जगत्के लोग (मन और इन्द्रियोंका संयम रखकर) विनीत एवं अनुशासित रहते थे॥ १४३ ॥
न प्राणिनां भयं चापि जलानलनिघातजम् । न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते ॥१४४॥ श्रीरामके राज्यकालमें प्राणियोंको जल और अग्निसे मृत्युका भय कभी नहीं होता था और वृद्धोंको बालकोंकी प्रेतक्रिया नहीं करनी पड़ती थी ॥ १४४ ॥
ब्रह्म पर्यचरत् क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः । शूद्राश्चैव हि वर्णांस्त्रीञ्छुश्रूषन्त्यनहंकृताः । नार्यो नात्यचरन् भर्तॄन् भार्या नात्यचरन् पतिः ॥१४५॥ क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी परिचर्या करते थे, वैश्य क्षत्रियोंके प्रति श्रद्धा रखते थे और शूद्र अहंकार छोड़कर ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंकी सेवा करते थे । श्रीरामके राज्यमें स्त्रियाँ अपने पतिको छोड़कर दूसरे किसी पुरुषमें आसक्त नहीं होती थीं और पुरुष भी अपनी पत्नीके सिवा दूसरी किसी स्त्रीपर आसक्तिपूर्ण दृष्टि नहीं डालते थे ॥ १४५ ॥
सर्वमासीज्जगद् दान्तं निर्दस्युरभवन्मही । राम एकोऽभवद् भर्त्ता रामः पालयिताभवत् ॥१४६॥ उस समय सारा जगत् जितेन्द्रिय था । पृथ्वीपर डाकुओंका कहीं नाम भी नहीं था। एकमात्र श्रीराम ही सबके स्वामी और संरक्षक थे ॥ १४६ ॥
आयुर्वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः । अरोगाः प्राणिनश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४७॥ श्रीरामके शासनकालमें मनुष्योंकी आयु हजारों वर्षकी होती थी । वे सहस्रों पुत्रोंके पिता होते थे और किसी भी प्राणीको रोग नहीं सताता था ॥ १४७ ॥
देवतानामृषीणां च मनुष्याणां च सर्वशः । पृथिव्यां समवायोऽभूद् रामे राज्यं प्रशासति ॥१४८॥ भगवान् श्रीराम जब यहाँ राज्यशासन करते थे, उन दिनों इस भूतलपर देवता, ऋषि और मनुष्योंका सब ओर समागम होता रहता था ॥ १४८ ॥
गाथा अप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः । रामे निबद्धतत्त्वार्था माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥१४९॥ श्रीरामके विषयमें 'वे ही परम तत्त्व हैं' ऐसी दृढ़ आस्था रखनेवाले पुराणवेत्ता पुरुष इस प्रसङ्गमें निम्नाङ्कित गाथाएँ गाया करते हैं, जो उन बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीके माहात्म्यको सूचित करती हैं—॥ १४९ ॥
श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्तास्यो मितभाषिता । आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥१५०॥ दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च । अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥१५१॥ 'श्रीरामचन्द्रजीका वर्ण श्याम था, वे सदा तरुण दिखायी देते थे, उनके नेत्र (कुछ-कुछ) लालिमा लिये हुए थे, मुखसे तेज बरसता रहता था, वे बहुत कम बोलते थे, उनकी लंबी भुजाएँ घुटनोंतक पहुँचती थीं, उनका मुख बड़ा सुन्दर था, कंधे सिंहके-से जान पड़ते थे, महाबाहु श्रीरामने अयोध्याके अधिपति होकर ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था॥ १५०-१५१ ॥
ऋक्सामयजुषां घोषो ज्याघोषश्च महात्मनः । अव्युच्छिन्नोऽभवद्राज्ये दीयतां भुज्यतामिति ॥१५२॥ 'उनके राज्यमें सदा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेदका घोष सुनायी देता था। धनुषकी प्रत्यञ्चा खींचनेसे उसकी टंकार-ध्वनि भी सदा श्रवणगोचर होती रहती थी तथा दान देने और भोजन करानेका उपदेश कभी बंद नहीं होता था ॥ १५२ ॥
सत्त्ववान् गुणसम्पन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा । अति चन्द्रं च सूर्यं च रामो दाशरथिर्बभौ ॥१५३॥ 'दशरथनन्दन श्रीराम सत्त्ववान् और गुणवान् होनेके साथ ही सदा अपने तेजसे देदीप्यमान रहते थे। उनकी सूर्य और चन्द्रमासे भी अधिक शोभा होती थी ॥ १५३ ॥
ईजे क्रतुशतैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः । हित्वायोध्यां दिवं यातो राघवः समहाबलः ॥१५४॥ 'श्रीरघुनाथजीने पर्याप्त एवं उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त सैकड़ों पवित्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया था। अन्तमें वे अयोध्याके महान् जन-समुदायको साथ ले अपनी उस पुरीको छोड़कर साकेत धामको पधारे' ॥ १५४ ॥