विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] द्विचत्वारिंशोऽध्यायः १५७
प्रधानात्मा पुरा ह्येष ब्रह्माणमसृजत् प्रभुः।
सोऽसृजत् पूर्वपुरुषः पुरा कल्पे प्रजापतीन् ॥ ७ ॥
सृष्टिके आदिमे इन प्रधानात्मा—प्रकृतिके संचालक प्रभुने ही ब्रह्माको उत्पन्न किया और इन्हीं पुराणपुरुषने पूर्वकल्पमें (मरीचि आदि) प्रजापतियोंकी सृष्टि की ॥ ७ ॥
ते तन्वानास्तनूस्तत्र ब्रह्मवंशाननुत्तमान् ।
तेभ्योऽभवन्महात्मभ्यो बहुधा ब्रह्म शाश्वतम् ॥ ८ ॥
उन प्रजापतियोंने (कश्यप आदिके रूपसे) अपने स्वरूपका विस्तार करके श्रेष्ठ ब्रह्मवंशों (गोत्रों) को उत्पन्न किया और उन महात्माओंसे सनातन वेद अनेक शाखाओंमे विभक्त हो गया ॥ ८ ॥
एतदाश्चर्यभूतस्य विष्णोर्नामानुकीर्तनम् ।
कीर्तनीयस्य लोकेषु कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ९ ॥
लोकोंमे कीर्तनीय आश्चर्यमय विष्णुके इस (वेदरूप) नामकीर्तनका उल्लेख मेरे द्वारा किया जा रहा है, तुम इसे सुनो ॥
वृत्ते वृत्रवधे तात वर्तमाने कृते युगे ।
आसीत् त्रैलोक्यविख्यातः संग्रामस्तारकामयः ॥१०॥
तात ! वर्तमान सत्ययुगमें वृत्रासुरका वध हो चुकनेपर त्रिलोकीमें प्रसिद्ध तारकामय संग्राम हुआ ॥ १० ॥
तत्रासन् दानवा घोराः सर्वे संग्रामदर्पिताः ।
घ्नन्ति देवगणान् सर्वान् सयक्षोरगराक्षसान् ॥ ११ ॥
उस समय सब-के-सब दानव संग्राममें दर्प भरे एवं भयकर दिखायी देते थे । उन्होंने यक्ष, राक्षस और सर्पों-सहित समस्त देवताओंको मारना आरम्भ कर दिया था ॥११॥
ते वध्यमाना विमुखाः क्षीणप्रहरणा रणे ।
त्रातारं मनसा जग्मुर्देवं नारायणं हरिम् ॥ १२ ॥
मार खाते-खाते जब उनके आयुध क्षीण हो गये, तब वे रणसे विमुख हो गये और सबकी रक्षा करनेवाले नारायणदेव श्रीहरिके ही मनसे शरण हो गये ॥ १२ ॥
एतस्मिन्नन्तरे मेघा निर्वाणाङ्गारवर्षिणः ।
सार्कचन्द्रग्रहगणं छादयन्तो नभस्तलम् ॥ १३ ॥
इसी बीचमे मेघ तपे हुए लोहेके समान ज्वालारहित अँगारे बरसाने लगे । वे सूर्य, चन्द्रमा आदि ग्रहोंसहित आकाशको ढकते हुए दिखायी देते थे ॥ १३ ॥
चञ्चद्विद्युद्गणाविद्धा घोरा निर्ह्रादकारिणः ।
अन्योऽन्यवेगाभिहताः प्रववुः सप्त मारुताः ॥ १४ ॥
कौधती हुई बिजलियोंसे व्याप्त हो वे भयंकर बादल बड़े जोरसे गर्जने और परस्पर वेगसे टकराने लगे; क्योकि उस समय प्रवह आदि सात प्रकारकी हवाएँ चल रही थीं ॥ १४ ॥
दीप्ततोयाशनीपातैर्वज्रवेगानिलाकुलैः ।
ररास घोरैरुत्पातैर्दह्यमानमिवाम्बरम् ॥ १५ ॥
बिजली और तपे हुए जलके गिरने तथा वज्रके समान वेगवाली वायुके चलने आदि भयंकर उत्पातोंसे जलता हुआ-सा आकाश मानो कराहने लगा ॥ १५ ॥
पेतुरुल्कासहस्राणि मुहुराकाशगान्यपि ।
न्युब्जानि च विमानानि प्रपतन्त्युत्पतन्ति च ॥ १६ ॥
उस समय हजारो उल्काएँ गिरती और फिर आकाशमे पहुँच जाती थीं तथा विमान नीचेको मुख करके गिरते और फिर उलटे ही उड़ जाते थे ॥ १६ ॥
चतुर्युगान्तपर्याये लोकानां यद् भयं भवेत् ।
तादृशान्येव रूपाणि तस्मिन्नुत्पातलक्षणे ॥ १७ ॥
हजार चतुर्युगोंके अन्तमे होनेवाले प्रलयके समय लोकों-को जो भय प्राप्त होता है, इस उत्पातके समय भी वैसे ही चिह्न दीखने लगे ॥ १७ ॥
तमसा निष्प्रभं सर्वं न प्राज्ञायत किंचन ।
तिमिरौघपरिक्षिप्ता न रेजुश्च दिशो दश ॥ १८ ॥
सारा संसार अन्धकारसे व्याप्त हो जानेके कारण प्रभाहीन प्रतीत होने लगा; कुछ भी सूझता न था । अन्धकारसमूहसे आच्छादित हुई दसो दिशाएँ ज्ञात ही नहीं होती थीं ॥१८॥
निशेव रूपिणी काली कालमेघावगुण्ठिता ।
द्यौर्न भात्यभिभूताऽर्का घोरेण तमसा वृता ॥ १९ ॥
जैसे काले मेघोके घिर आनेपर अमावास्याकी रात्रि मूर्ति-मती-सी दीख पड़ती है, वैसे ही अन्धकारसे सूर्यके तिरोहित होनेपर घोर अन्धकारसे भरा हुआ आकाश शोभायमान नहीं लगता था ॥ १९ ॥
तान् घनौघान् सतिमिरान् दोर्भ्यामुत्क्षिप्य स प्रभुः ।
वपुः संदर्शयामास दिव्यं कृष्णवपुर्हरिः ॥ २० ॥
उस समय श्यामवर्ण भगवान् श्रीहरिने अपनी दोनों भुजाओंद्वारा अन्धकारसे व्याप्त उन मेघसमूहोंको ऊपरकी ओर ठेलकर अपने दिव्य स्वरूपका साक्षात्कार कराया ॥ २० ॥
बलाहकाञ्जननिभं बलाहकतनूरुहम् ।
तेजसा वपुषा चैव कृष्णं कृष्णमिवाचलम् ॥ २१ ॥
दीप्तपीताम्बरधरं तप्तकाञ्चनभूषणम् ।
धूमान्धकारवपुषा युगान्ताग्निमिवोत्थितम् ॥ २२ ॥
चतुर्द्विगुणपीनांसं बलाकापङ्क्तिभूषणम् ।
चामीकरकराकारैरायुधैरुपशोभितम् ॥ २३ ॥
चन्द्रार्ककिरणोद्द्योतं गिरिकूटं शिलोच्चयम् ।
नन्दकानन्दितकरं शराशीविषधारिणम् ॥ २४ ॥
शक्तिचित्रं हलोदग्रं शङ्खचक्रगदाधरम् ।
विष्णुशैलं क्षमामूलं श्रीवृक्षं शार्ङ्गधन्विनम् ॥ २५ ॥
हर्यश्वरथसंयुक्तं सुपर्णध्वजशोभिते ।
चन्द्रार्कचक्ररुचिरे मन्दराक्षधृतान्तरे ॥ २६ ॥