भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 183, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 183

१६० श्रीमहाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

आयसैः परिघैः कीर्णं क्षेपणीयैस्तथाश्मभिः ॥ १० ॥ प्रासैः पाशैश्च विततैरवसक्तैश्च मुद्गरैः । शोभितं त्रासनीयैश्च तोमरैः सपरश्वधैः ॥ ११ ॥ उद्यन्तं द्विषतां हेतोर्द्वितीयमिव मन्दरम् । युक्तं खरसहस्रेण सोऽध्यारोहद्रथोत्तमम् ॥ १२ ॥

तारनामक दैत्य लोहेके बने हुए उत्तम रथपर आरूढ हुआ, जिसका विस्तार एक कोसका था; उसके ऊपर कौएके चिह्नसे सुशोभित ध्वजा फहरा रही थी। उसके भीतर शिलाखण्डोंके समूह भरे हुए थे। वह नीली कज्जलराशिके समान प्रतीत होता था। उसमें काले लोहेके आठ पहिये लगे थे। उसके ईपादण्ड (हरसे या बम), जुआ और कूबर भी लोहेके ही बने हुए थे। उसकी कान्ति काले कोयलेके समान काली थी, वह अपनी घरघराहटसे गरजता हुआ मेघ-सा जान पड़ता था। उसके ऊपर लोहेकी बहुत बड़ी जाली लगी हुई थी, जिसमें झरोखे शोभा पाते थे। वह रथ लोहेके परिघों तथा फेंकने योग्य पत्थरोंके गोलोंसे भरा था। बहुत-से भाले, विस्तृत पाश, बहुसंख्यक लटकते हुए मुद्गर, डरावने तोमर और फरसे उसकी शोभा बढ़ाते थे। वह शत्रुओंके लिये दूसरे मन्दराचलकी भाँति उदित हुआ था, उस श्रेष्ठ रथमें एक हजार गधे जुते हुए थे ॥ ८-१२ ॥

विरोचनस्तु संक्रुद्धो गदापाणिरवस्थितः । प्रमुखे तस्य सैन्यस्य दीप्तशृङ्ग इवाचलः ॥ १३ ॥

क्रोधमें भरा हुआ विरोचन नामक दैत्य हाथमें गदा लिये उस सेनाके मुहानेपर खड़ा हो गया। वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था, मानो कान्तिमान् शिखरसे युक्त कोई पर्वत खड़ा हो ॥ १३ ॥

युक्तं हयसहस्रेण हयग्रीवस्तु दानवः । स्यन्दनं वाहयामास सपत्नानीकमर्दनः ॥ १४ ॥

दानव हयग्रीव शत्रुओंकी सेनाको कुचल डालनेमें समर्थ था। उसने एक हजार घोड़ोंसे जुते हुए रथको अपना वाहन बनाया ॥ १४ ॥

व्यायतं बहुसाहस्रं धनुर्विस्फारयन् महत् । वराहः प्रमुखे तस्थौ सावरोह इवाचलः ॥ १५ ॥

वराह नामक दानव कई हजार हाथ लंबा विशाल धनुष टंकारता हुआ दैत्य-सेनाके अग्रभागमें खड़ा हो गया, उस समय वह वरोहों (जटाओं) से युक्त बरगदके समान प्रतीत होता था ॥ १५ ॥

खरस्तु विक्षरन् दर्पान्नेत्राभ्यां रोषजं जलम् । स्फुरद्दन्तौष्ठवदनः संग्रामं सोऽभ्यकाङ्क्षत ॥ १६ ॥

खर नामक दैत्य अपने नेत्रोंसे रोषजनित आँसू बहाता हुआ बड़े दर्पके साथ आया और युद्धकी इच्छासे डट गया, उस समय उसके दाँत, ओठ और मुख क्रोधसे फड़क रहे थे ॥ १६ ॥

त्वष्टा त्वष्टादशहयं यानमास्थाय दानवः । व्यूहितो दानवैर्व्यूहैः परिचक्राम वीर्यवान् ॥ १७ ॥

त्वष्टा नामक बलशाली दानव अठारह घोड़ोंसे जुते हुए रथपर सवार होकर आया और व्यूहमें खड़े हुए दानवोंके साथ स्वयं भी व्यूहका एक अङ्ग बनकर सब ओर घूमने लगा ॥

विप्रचित्तिसुतः श्वेतः श्वेतकुण्डलभूषणः । श्वेतशैलप्रतीकाशो युद्धायाभिमुखः स्थितः ॥ १८ ॥

विप्रचित्तिका पुत्र श्वेत सफेद कुण्डलोंसे विभूषित हो युद्धके लिये सामने आकर डट गया, वह श्वेत-पर्वतके समान दिखायी देता था ॥ १८ ॥

अरिष्टो बलिपुत्रस्तु वरिष्ठोऽद्रिशिलायुधैः । युद्धायातिष्ठदायस्तो धराधर इवापरः ॥ १९ ॥

बलिक्रा ज्येष्ठ पुत्र अरिष्ट पर्वतीय शिलाखण्डोंको आयुधके रूपमें धारण किये शत्रुओंका सामना करनेके लिये खड़ा हुआ, उसने युद्धकी कलामें विशेष परिश्रम किया था। वह दूसरे पर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ १९ ॥

किशोरस्त्वतिसंरम्भात् किशोर इव चोदितः । अभवद् दैत्यसैन्यस्य मध्ये रविरिवोदितः ॥ २० ॥

किशोर नामक दैत्य चाबुकसे हाँके गये बछेड़ेके समान बड़े हर्ष और उत्साहके साथ आकर दैत्यसेनाके मध्यभागमें खड़ा हो गया। वह नवोदित सूर्यके समान शोभा पा रहा था ॥

लम्बस्तु लम्बमेघाभः प्रलम्बाम्बरभूषणः । दैत्यव्यूहगतो भाति सनीहार इवांशुमान् ॥ २१ ॥

लम्ब नामक दानव बरसनेके लिये झुके हुए मेघोंकी काली घटाके समान काला दिखायी देता था, उसके वस्त्र और आभूषण बड़े-बड़े थे। दैत्य-सेनाके व्यूहमें खड़ा होकर वह कुहासेसे ढँके हुए सूर्यके समान सुशोभित होता था ॥

स्वर्भानुर्वक्रयोधी तु दशनौष्ठेक्षणायुधः । हसंस्तिष्ठति दैत्यानां प्रमुखे स महाग्रहः ॥ २२ ॥

वक्र रीतिसे युद्ध करनेवाला राहु नामक महान् ग्रह हँसता हुआ आकर दैत्य-सेनाके मुहानेपर डट गया। वह अपने दाँतों, नेत्रों और ओठोंसे भी आयुधका काम लेता था ॥ २२ ॥

अन्ये हयगता भान्ति नागस्कन्धगताः परे । सिंहव्याघ्रगताश्चान्ये वराहर्क्षगताः परे ॥ २३ ॥

कुछ दानव घोड़ोंपर सवार दिखायी देते थे और कुछ गजराजोंकी पीठपर। दूसरे बहुत-से दैत्य सिंह, व्याघ्र, सूअर और रीछोंपर चढ़े हुए थे ॥ २३ ॥

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित) · पृष्ठ 183, कुल 1169 में से · BharatKosha