विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 25, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २ | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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वाजपेय और राजसूय यज्ञोंके अनुष्ठानसे तथा हाथी जुते हुए रथके दानसे जिस फलकी प्राप्ति देखी या बतायी गयी है, वही फल हरिवंश-ग्रन्थका दान करनेसे मिल जाता है। इसमें व्यासजीका वचन प्रमाण है तथा महर्षि वाल्मीकि-ने भी इसी माहात्म्यका गान किया है ॥ ६ ॥
यो हरिवंशं लेखयति यथाविधिना महातपाः सपदि ।
स जयति हरिपदकमलं मधुपो हि यथा रसेन लुब्धः ॥ ७ ॥
जो महातपस्वी पुरुष शास्त्रीय विधिके अनुसार हरिवंशको लिखता या लिखवाता है, वह रसपर लुभाये हुए भँवरेके समान भगवान् श्रीकृष्णके चरण-कमलोंपर पहुँच जाता है ॥ ७ ॥
पितामहाद्यं प्रवदन्ति षष्ठं महर्षिमक्षय्यविभूतियुक्तम् ।
नारायणस्यांशजमेकपुत्रं द्वैपायनं वेद महानिधानम् ॥ ८ ॥
ब्रह्माजीके आदि कारण श्रीनारायणको जिनसे उनकी छठी* पीढ़ीका पुरुष बताते हैं, जो अक्षय्य विभूतियोंसे युक्त तथा नारायणके अंशसे प्रकट हैं, एकमात्र शुकदेव ही जिनके पुत्र हैं (अथवा जो अपने पिता पराशरके एक ही पुत्र हैं), वैदिक ज्ञानकी महानिधिरूप उन महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासकी मैं उपासना करता हूँ ॥ ८ ॥
आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरुष्टुतम् ।
ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्ताव्यक्तं सनातनम् ॥ ९ ॥
असच सदसच्चैव यद्विश्वं सदसत्परम् ।
परावराणां स्रष्टारं पुराणं परमव्ययम् ॥ १० ॥
माङ्गल्यं मङ्गलं विष्णुं वरेण्यमनघं शुचिम् ।
नमस्कृत्य हृषीकेशं चराचरगुरुं हरिम् ॥ ११ ॥
नैमिषारण्ये कुलपतिः शौनकस्तु महामुनिः ।
सौतिं पप्रच्छ धर्मात्मा सर्वशास्त्रविशारदः ॥ १२ ॥
नैमिषारण्यकी बात है, सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ, धर्मात्मा एवं कुलपति† महामुनि शौनक ने सबके आदि कारण, अन्तर्यामी पुरुष, पुरुहूत (बहुत-से यजमानोंद्वारा दी गयी आहुतिको ग्रहण करनेवाले), पुरुष्टुत (बहुसंख्यक उपासकोंद्वारा स्तुत्य), ऋत (सत्यस्वरूप), एकाक्षर (प्रणवमय अथवा एक, अविनाशी), ब्रह्म (परमात्मा), व्यक्ताव्यक्तरूप, सनातन, असत् (कार्यरूप), सदसत् (कारण और कार्यरूप), अखिल विश्वमय, सत् और असत्—दोनोंसे पर (विलक्षण), कारण और कार्य दोनोंके स्रष्टा, पुरातन, सर्वोत्कृष्ट, अविकारी, मङ्गलकारी, मङ्गलरूप, सर्वव्यापी, सबके द्वारा वरणीय, पापरहित, परम पवित्र, इन्द्रियोंके प्रेरक तथा समस्त चराचर जगत्के गुरु श्रीहरिको प्रणाम करके लोमहर्षण सूतके पुत्र उग्रश्रवासे इस प्रकार पूछा ॥ ९–१२ ॥
शौनक उवाच
सौते सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् ।
भारतानां च सर्वेषां पार्थिवानां तथैव च ॥ १३ ॥
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
दैत्यानामथ सिद्धानां गुह्यकानां तथैव च ॥ १४ ॥
शौनकजीने कहा—सूतनन्दन ! आपने भरतवंशियों, अन्य सब राजाओं, देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, नागों, राक्षसों, दैत्यों, सिद्धों तथा गुह्यकोंसे सम्बन्ध रखनेवाला यह बहुत बड़ा उपाख्यान (महाभारत) कह सुनाया ॥ १३-१४ ॥
अत्यद्भुतानि कर्माणि विक्रमा धर्मनिश्चयाः ।
विचित्राश्च कथायोगा जन्म चाग्र्यमनुत्तमम् ॥ १५ ॥
कथितं भवता पुण्यं पुराणं श्लक्ष्णया गिरा ।
मनःकर्णसुखं सौते प्रीणात्यमृतसम्मितम् ॥ १६ ॥
आपने (ऋषि-महर्षियोंके) अद्भुत कर्म, (शूरवीरोंके) बल-विक्रम, धर्मतत्त्वके निर्णय, विचित्र-विचित्र कथा-प्रसङ्ग तथा (द्रोण आदिके) श्रेष्ठ एवं परम उत्तम जन्म-वृत्तान्त आदि प्राचीन एवं पुण्यप्रद विषयोंका अपनी मधुर वाणीद्वारा वर्णन किया है। उग्रश्रवाजी ! मन और कानोंको सुख देनेवाला यह प्रसङ्ग मुझे अमृतके समान तृप्ति प्रदान करता है ॥ १५-१६ ॥
तत्र जन्म कुरूणां वै त्वयोक्तं लोमहर्षणे ।
न तु वृष्ण्यन्धकानां च तद् भवान् वक्तुमर्हति ॥ १७ ॥
लोमहर्षणकुमार ! आपने महाभारत सुनाते समय कुरुवंशियोंके ही जन्मका विशेषरूपसे वर्णन किया है, वृष्णि तथा अन्धकवंशके वीरोंके जन्मका नहीं; अतः अब आप इन सबके जन्म-कर्मका भी वर्णन कीजिये ॥ १७ ॥
सौतिरुवाच
जनमेजयेन यत् पृष्टः शिष्यो व्यासस्य धर्मवित् ।
तद् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि वृष्णीनां वंशमादितः ॥ १८ ॥
सूत-पुत्र उग्रश्रवाने कहा—शौनकजी ! जनमेजयने व्यासजीके धर्मवेत्ता शिष्य वैशम्पायनजीसे जो कुछ पूछा था, उसीके अनुसार मैं आरम्भसे ही वृष्णियोंके वंशका आपसे वर्णन करता हूँ ॥ १८ ॥
* व्यास, पराशर, शक्ति, वसिष्ठ, ब्रह्मा तथा भगवान् नारायण—इस प्रकार गणना करनेपर श्रीमन्नारायणदेव व्यासजीसे छठी पीढ़ी ऊपरके पूर्वज ज्ञात होते हैं।
† जो ग्यारह हजार तपस्वियोंको अन्न आदि देकर पालन करता है, वह वेद-वेदाङ्गपारगामी ऋषि 'कुलपति' कहलाता है।