विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 306, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें२८४ श्रीमद्भारते खिलभागे [ हरिवंशे
हस्तिनां कलहे घोरे वधमृच्छन्ति वीरुधः ।
युद्धव्युपरमे ते तु सहाश्नन्ति महावने ॥ ६८ ॥
बान्धवानामपि तथा भेदकाले समुत्थिते ।
वध्यते योऽन्तरप्रेप्सुः स्वजनो यदि वेतरः ॥ ६९ ॥
'हाथियोंमें भयंकर युद्ध छिड़ जानेपर घास-पात और लता-बेलें नष्ट होती हैं; फिर युद्धका विराम होनेपर वे हाथी उस महान् वनमें साथ-साथ खाते-पीते हैं; उसी प्रकार भाई-बन्धुओंमें भेद उपस्थित होनेपर जो छिद्र ढूँढ़नेवाला होता है, वही मारा जाता है; भले ही वह स्वजन हो या और कोई ॥ ६८-६९ ॥
कालस्त्वं हि विनाशाय मया पुष्टो विजानता ।
वसुदेव कुलस्यास्य यद् विरोध्यसे भृशम् ॥ ७० ॥
'वसुदेव ! तुम इस कुलके काल हो। मैंने अपने विनाशके लिये ही तुम्हें जान-बूझकर पाला-पोसा है। तभी तो तुम मुझसे अत्यन्त विरोध बढ़ा रहे हो ॥ ७० ॥
अमर्षी वैरशीलश्च सदा पापमतिः शठः ।
स्थाने यदुकुलं मूढ शोचनीयं त्वया कृतम् ॥ ७१ ॥
'ओ मूढ़ ! तुम अमर्षशील (असहिष्णु) और स्वभावतः वैर रखनेवाले हो। तुम्हारी बुद्धि सदा पापमें ही लगी रहती है। तुम शठ हो। तुमने जो इस यदुकुलकी शोचनीय अवस्था कर दी है, वह उचित ही है ॥ ७१ ॥
वसुदेव वृथा वृद्ध यन्मया त्वं पुरस्कृतः ।
श्वेतेन शिरसा वृद्धो नैव वर्षशतैर्भवेत् ॥ ७२ ॥
यस्य बुद्धिः परिणता स वै वृद्धतरो नृणाम् ॥ ७३ ॥
'बूढ़े वसुदेव ! मैंने जो तुम्हें पुरस्कृत किया—सदा अगुआ बनाकर रक्खा, वह सब व्यर्थ हो गया। सिरके बाल सफेद हो जायें और सौ वर्षोंकी आयु हो जाय—इतनेसे ही कोई वृद्ध (श्रेष्ठ) नहीं हो सकता, जिसकी बुद्धि परिपक्व हो, वही मनुष्योंमें वृद्धतर (श्रेष्ठतम या बड़ा-बूढ़ा) माना गया है ॥ ७२-७३ ॥
त्वं च कर्कशशीलश्च बुद्ध्या च न बहुश्रुतः ।
केवलं वयसा वृद्धो यथा शरदि तोयदः ॥ ७४ ॥
'तुम्हारा स्वभाव तो कर्कश (क्रूर) है। तुम बुद्धिसे भी बहुश्रुत (अधिक बातोंके जानकार) नहीं हो। शरद् ऋतुके बादलकी भाँति केवल अवस्थामे ही बूढ़े हो (अनुभवमें नहीं) ॥७४॥
किं च त्वं साधु जानीषे वसुदेव वृथामते ।
मृते कंसे मम सुतो मथुरां पालयिष्यति ॥ ७५ ॥
'इतना ही नहीं, व्यर्थ बुद्धि रखनेवाले वसुदेव ! तुम यह अच्छी तरह समझने लगे हो कि कंसके मर जानेपर मेरा बेटा मथुराका पालन करेगा—वही यहाँका राजा होगा ॥ ७५ ॥
छिन्नाशास्त्वं वृथावृद्धो मिथ्या त्वेवं विचारितम् ।
जिजीविषुर्न सोऽप्यस्ति योऽवतिष्ठेन्ममाग्रतः ॥ ७६ ॥
'परंतु तुम्हारी यह आशा छिन्न-भिन्न हो जायगी। तुम व्यर्थ ही बूढ़े हुए। तुमने झूठे ही ऐसा विचार किया है। अरे ! जो मेरे सामने प्रतिद्वन्द्वी बनकर खडा हो, उसके विषयमे यह समझना चाहिये कि वह जीवित रहना नहीं चाहता ॥ ७६ ॥
प्रहर्तुकामो विश्वस्ते यस्त्वं दुष्टेन चेतसा ।
तत् ते प्रतिकरिष्येऽहं पुत्रयोस्तव पश्यतः ॥ ७७ ॥
'मैंने सदा तुम्हारा विश्वास किया और तुमने दुष्टतापूर्ण चित्तसे मुझपर प्रहार करनेकी अभिलाषा की। इसका बदला मैं तुम्हारे दोनों पुत्रोंसे लूँगा और तुम उसे अपनी आँखों देखोगे ॥ ७७ ॥
न मे वृद्धवधः कश्चिद् द्विजस्त्रीवध एव च ।
कृतपूर्वः करिष्ये वा विशेषेण तु बान्धवे ॥ ७८ ॥
'मैंने पहले कभी भी किसी बूढ़ेका, ब्राह्मणका अथवा स्त्रीका वध नहीं किया है तथा न आगे ही ऐसा करूँगा; विशेषतः अपने बन्धु-बान्धवपर तो मैं हाथ उठाऊँगा ही नहीं ॥ ७८ ॥
इह त्वं जातसंवृद्धो मम पित्रा विवर्धितः ।
पितृष्वसुश्च मे भर्ता यदूनां प्रथमो गुरुः ॥ ७९ ॥
'वसुदेव ! तुम यहीं पैदा हुए, यहीं बढ़े और मेरे पिताने ही तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया। तुम मेरी चचेरी बहिनके पति हो और यदुवंशियोंमें सर्वश्रेष्ठ गुरुरूप माने जाते हो ॥ ७९ ॥
कुले महति विख्यातः प्रथिते चक्रवर्तिनाम् ।
गुर्वर्थे पूजितः सद्भिर्महद्भिर्धर्मबुद्धिभिः ॥ ८० ॥
'चक्रवर्तियोंके सुविख्यात एवं महान् कुलमें तुम्हारा जन्म हुआ, तुम स्वयं भी प्रसिद्ध हो तथा धर्मविषयक बुद्धि रखनेवाले श्रेष्ठ महापुरुषोंने उसी गौरवके कारण तुम्हारा पूजन, आदर-सत्कार किया है ॥ ८० ॥
किं करिष्यामहे सर्वे सत्सु वक्तव्यतां गताः ।
यदूनां यूथमुख्यस्य यस्य ते वृत्तमflags... ईदृशम् ॥ ८१ ॥
'तुम यदुवंशियोंके समुदायमें मुख्य हो। जब तुम्हारा आचार-व्यवहार ऐसा है (तो औरोंका क्या कहा जाय ?)। क्या करें, हम सब लोग केवल तुम्हारे कारण सत्पुरुषोंके समाजमे निन्दाके पात्र बन गये ॥ ८१ ॥
मद्वधो वा जयो वापि वसुदेवस्य दुर्नयैः ।
सत्सु यास्यन्ति पुरुषा यदूनामवगुण्ठिताः ॥ ८२ ॥
'वसुदेवकी दुर्नीतिसे मेरा वध हो अथवा विजय, आजसे यदुकुलके पुरुष सज्जनोंके समाजमें अपना मुँह ढँककर जायेंगे ॥ ८२ ॥
त्वया हि मद्वधोपायं तर्कमाणेण वै मृधे ।
अविश्वास्यं कृतं कर्म वाच्याश्च यादवाः कृताः ॥ ८३ ॥
'वसुदेव ! तुमने युद्धमें मेरे वधका उपाय सोचते-सोचते अविश्वासयोग्य कर्म किया और यादवोंको निन्दनीय बना दिया ॥ ८३ ॥
१. यद्यपि ययातिके शापसे यदुकुलका कोई भी पुरुष चक्रवर्ती राजा नहीं हुआ तथापि यहाँ चक्रवर्तीके लक्षण-विशेषसे सम्पन्न पुरुषोंको ही चक्रवर्ती कहा गया है। वह लक्षण इस प्रकार है—
यस्य मूर्धनि दृश्येत विना छत्रेण भूपतेः । पद्मानुकारिणी छाया तमाहुश्चक्रवर्तिनम् ॥ अर्थात् जिस राजाके मस्तकपर बिना छत्र लगाये ही कमल-जैसी छाया दिखायी दे, उसे चक्रवर्ती कहते हैं।