विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 311, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] चतुर्विंशोऽध्यायः २८९
चतुर्विंशोऽध्यायः
केशीके अत्याचार और श्रीकृष्णद्वारा उसका वध
वैशम्पायन उवाच
अन्धकस्य वचः श्रुत्वा कंसः संरक्तलोचनः ।
न किंचिदब्रवीत् क्रोधाद् विवेश स्वं निकेतनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय ! अन्धककी बातें सुनकर कंसकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह उनसे कुछ नहीं बोला और रोषपूर्वक उठकर अपने महलमें चला गया ॥ १ ॥
ते च सर्वे यथावेश्म यादवाः श्रुतविस्तराः ।
जग्मुर्विगतसंकल्पाः कंसवैकृतशंसिनः ॥ २ ॥
फिर वे सब यादव, जो वहाँकी सारी बातें विस्तारपूर्वक सुन चुके थे, निराश होकर अपने-अपने घरको लौट गये। वे मार्गमें यह चर्चा कर रहे थे कि कंसका मस्तिष्क खराब हो गया है ॥ २ ॥
अक्रूरोऽपि यथाऽऽज्ञप्तः कृष्णदर्शनलालसः ।
जगाम रथमुख्येन मनसा तुल्यगामिना ॥ ३ ॥
अक्रूरके मनमें भगवान् श्रीकृष्णके दर्शनकी लालसा जाग उठी थी, अतः वे भी कंसकी आज्ञाके अनुसार उठे और मनके समान शीघ्रगामी श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो वहाँसे चल दिये ॥ ३ ॥
कृष्णस्यापि निमित्तानि शुभान्यङ्गगतानि वै ।
पितृतुल्येन शंसन्ति बान्धवेन समागमम् ॥ ४ ॥
उधर श्रीकृष्णको भी अपने अङ्गोंमें ही कुछ ऐसे शुभ लक्षण दिखायी देते थे, जो पिता-जैसे बान्धवसे भेंट होनेकी सूचना दे रहे थे ॥ ४ ॥
प्रागेव च नरेन्द्रेण माथुरेणोग्रसेनिना ।
केशिनः प्रेषितो दूतो वधायोपेन्द्रकारणात् ॥ ५ ॥
(अक्रूरको भेजनेसे) पहले ही मथुराके राजा उग्रसेन-कुमार कंसने केशीके पास दूत भेजा और कहलाया कि तुम श्रीकृष्णका वध कर डालो ॥ ५ ॥
स च दूतवचः श्रुत्वा केशी क्लेशकरो नृणाम् ।
वृन्दावनगतो गोपान् बाधते स्म दुरासदः ॥ ६ ॥
दूतकी बात सुनकर मनुष्योंको क्लेश प्रदान करनेवाला दुर्जय दैत्य केशी वृन्दावनमें जाकर गोपोंको सताने लगा ॥ ६ ॥
मानुषं मांसमश्नन् क्रुद्धो दुष्टपराक्रमः ।
दुर्दान्तो वाजिदैत्योऽसावकरोत् कदनं महत् ॥ ७ ॥
केशी घोड़ेके रूपमें रहनेवाला दुर्दान्त दैत्य था और मनुष्यका मांस खाता था। उस दुष्ट पराक्रमी असुरने कुपित होकर वहाँ महान् संहार आरम्भ कर दिया ॥ ७ ॥
निघ्नन् गा वै सगोपालान् गवां पिशितभोजनः ।
दुर्मदः कामचारी च स केशी निरवग्रहः ॥ ८ ॥
वह ग्वालोंसहित गौओंको मार डालता और गौओंका मांस खाया करता था। मदमत्त केशी स्वच्छन्द विचरनेवाला और उच्छृङ्खल था ॥ ८ ॥
तदरण्यं श्मशानाभं नृणां मांसास्थिभिर्वृतम् ।
यत्रास्ते स हि दुष्टात्मा केशी तुरगदानवः ॥ ९ ॥
अश्वरूपधारी दुष्टात्मा दानव केशी जहाँ रहता था, वह वन मनुष्योंके मांस और हड्डियोंसे व्याप्त होकर श्मशान-भूमिके समान प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
खुरैर्दारयते भूमिं वेगेनाभ्रजते द्रुमान् ।
ह्रेषितैः स्पर्धते वायुं प्लुतैर्लङ्घयते नभः ॥ १० ॥
वह टापोंसे पृथ्वीको विदीर्ण कर देता और वेगसे वृक्षोंको भी तोड़ डालता था, हाँसते या हिनहिनाते समय प्रचण्ड वायुके कोलाहलसे होड़ लगाता था और उछलकर आकाशको भी लाँघ जाता था ॥ १० ॥
अतिप्रवृद्धो मत्तश्च दुष्टोऽश्वो वनगोचरः ।
आकम्पितसटो रौद्रः कंसस्य चरितानुगः ॥ ११ ॥
वह वनमें विचरनेवाला दुष्ट अश्व बहुत बड़ा और मतवाला था। उसके अयाल कुछ हिलते रहते थे। वह, भयंकर दैत्य कंसके चरित्रका अनुसरण करनेवाला था ॥ ११ ॥
ईरिणं तद् वनं सर्वं तेनासीत् पापकर्मणा ।
कृतं तुरगदैत्येन सर्वान् गोपाञ्जिघांसता ॥ १२ ॥
समस्त गोपोंको मार डालनेकी इच्छावाले उस पापाचारी अश्वरूपधारी दैत्यने वह सारा वन मनुष्योंसे सूना कर दिया था ॥ १२ ॥
तेन दुष्टप्रचारेण दूषितं तद् वनं महत् ।
न नृभिर्गोधनैर्वापि सेव्यते वनवृत्तिभिः ॥ १३ ॥
उस दुराचारीने वह विशाल वन दूषित कर डाला था। वनसे ही जीवन निर्वाह करनेवाले मनुष्य और गोधन भी कभी उस वनका सेवन नहीं करते थे ॥ १३ ॥
निःसम्पातः कृतः पन्थास्तेन तद्विषयाश्रयः ।
मदात्स्खलितवृत्तेन नृमांसान्यश्नता भृशम् ॥ १४ ॥
मदके कारण वह सदाचारसे भ्रष्ट हो चुका था और अधिकतर मनुष्योंके ही मांस खाता था। उसके निवास-स्थानमें होकर जो रास्ता जाता था, उसे उसने अगम्य बना दिया था। १४।
नृशब्दानुसरः क्रुद्धः स कदाचिद् वनागमे ।
जगाम घोषसंवासं चोदितः कालधर्मणा ॥ १५ ॥
म० ह० १०