भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

विष्णुपर्व ] चतुर्विंशोऽध्यायः २९१


अपने दोनों आगेवाले पैरोंसे उनकी छातीमें प्रहार किया ॥ ३१ ॥

पुनः पुनः स च बली प्राहिणोत् पार्श्वतः खुरान् ।
कृष्णस्य दानवो घोरं प्रहारममितौजसः ॥ ३२ ॥

उस बलवान् दानवने अगल-बगलसे भी बारंबार अपनी टाप चलायी और अमित तेजस्वी श्रीकृष्णपर घोर प्रहार किया ॥ ३२ ॥

वक्त्रेण चास्य घोरेण तीक्ष्णदंष्ट्रायुधेन वै।
अदशद् बाहुशिखरं कृष्णस्य रुषितो हयः ॥ ३३ ॥

तीखी दाढ़ ही जिसका आयुध थी, उस भयानक मुखके द्वारा रोषमें भरे हुए उस घोड़ेने श्रीकृष्णकी भुजाके अग्रभागको दाँत गड़ाकर घायल कर दिया ॥ ३३ ॥

स लम्बकेसरसटः कृष्णेन सह सङ्गतः ।
रराज केशी मेघेने संसक्तः ख इवांशुमान् ॥ ३४ ॥

लंबे-लंबे अयालसे सुशोभित केशी श्रीकृष्णके साथ जूझता हुआ उसी तरह शोभा पाने लगा, जैसे आकाशमें अंशुमाली सूर्य मेघके साथ उलझ गये हों ॥ ३४ ॥

उरस्तस्योरसा हन्तुमियेप बलवान् हयः ।
वेगेन वासुदेवस्य क्रोधाद् द्विगुणविक्रमः ॥ ३५ ॥

उस बलवान् घोड़ेका पराक्रम उसके क्रोधके कारण दूना बढ़ गया था। उसने श्रीकृष्णकी छातीपर अपनी छातीसे वेगपूर्वक चोट पहुँचानेका विचार किया ॥ ३५ ॥

तस्योत्सिक्तस्य बलवान् कृष्णोऽप्यमितविक्रमः ।
बाहुमाभोगिनं कृत्वा मुखे क्रुद्धः समादधत् ॥ ३६ ॥

तब अमित पराक्रमी बलवान् श्रीकृष्णने भी कुपित होकर उस घमंडी दैत्यके मुखमें अपनी एक बाँहको बहुत बड़ी करके डाल दिया ॥ ३६ ॥

स तं बाहुमशको वै खादितुं भेत्तुमेव च ।
दशनैर्मूलनिर्मुक्तैः सफेनं रुधिरं वमन् ॥ ३७ ॥

वह उनकी उस बाँहको अपने दाँतोंसे चबाने या विदीर्ण करनेमें समर्थ न हो सका, उलटे उसके दाँत ही जड़से उखड़ गये; साथ ही वह मुखसे फेनसहित रक्त वमन करने लगा ॥

विपाटिताभ्यामोष्ठाभ्यां कटाभ्यां विदलीकृतः ।
अक्षिणी विवृते चक्रे विसृते मुक्तबन्धने ॥ ३८ ॥

उसके ओठ और गलफर फटकर दो दलोंमें विभक्त हो गये । स्नायुबन्धनके ढीले हो जानेसे केशीकी आँखें फटकर बाहर निकल आयीं ॥ ३८ ॥

निरस्तहनुराविष्टः शोणिताक्तविलोचनः ।
उत्कर्णो नष्टचेतास्तु स केशी बह्वचेष्टत ॥ ३९ ॥

उसके होठोंका निचला भाग फटकर निकल गया । उस बाँहसे आविष्ट होनेके कारण उसके फटे हुए दोनों नेत्रोंसे रक्त बहने लगा । उसके कान भी उखड़कर गिर पड़े तथा चेतना नष्ट हो गयी । उस अवस्थामें केशी बारंबार छटपटाने लगा ॥

उत्पतन्नसकृत्पादैः शकृन्मूत्रं समुत्सृजन् ।
खिन्नाङ्गरोमा श्रान्तस्तु निर्यलचरणोऽभवत् ॥ ४० ॥

वह बार-बार पैरोंको उछालने और मल-मूत्र छोड़ने लगा । उसका एक-एक अङ्ग और रोम-रोम खिन्न हो उठा था। अन्तमें वह थक गया और उसके पैर निश्चेष्ट हो गये ॥ ४० ॥

केशिवक्त्रविलग्नस्तु कृष्णबाहुरशोभत ।
व्याभुग्न इव घर्मान्ते चन्द्रार्धकिरणैर्धनः ॥ ४१ ॥

केशीके मुखमें लगी हुई श्रीकृष्णकी वह बाँह उसके मुखमण्डलसे आधी आवेष्टित-सी होकर वर्षाकालमें आधे चन्द्रमाकी किरणोंसे घिरे हुए बादलके समान शोभा पाती थी ॥ ४१ ॥

केशी च कृष्णसंसक्तः शान्तगात्रो व्यरोचत ।
प्रभातावनतश्चन्द्रः श्रान्तो मेरुमिवाश्रितः ॥ ४२ ॥

श्रीकृष्णसे सटे हुए केशीका शरीर शान्त हो गया था । उस समय वह उसी तरह शोभा पा रहा था, जैसे प्रभात-कालमें अस्ताचलके शिखरपर पहुँचा हुआ चन्द्रमा थककर मेरुका आश्रय लेनेपर सुशोभित होता है ॥ ४२ ॥

तस्य कृष्णभुजोद्धूताः केशिनो दशना मुखात् ।
पेतुः शरदि निस्तोयाः सिताभ्रावयवा इव ॥ ४३ ॥

श्रीकृष्णकी भुजासे टकराकर केशीके सारे दाँत मुखसे बाहर गिर पड़े । वे ऐसे प्रतीत होते थे, मानो शरद्ऋतुके जलशून्य श्वेत बादलोंके टुकड़े बिखरे हुए हों ॥ ४३ ॥

स तु केशी भृशं शान्तः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ।
स्वभुजं स्वायतं कृत्वा पाटितो वलवत् तदा ॥ ४४ ॥

जब केशी भलीभाँति शान्त हो गया, तब अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने अपनी बाँहको बहुत बड़ी करके उस दैत्यके शरीरको बलपूर्वक बीचसे चीर डाला ॥ ४४ ॥

स पाटितो भुजेनाजौ कृष्णेन विकृताननः ।
केशी नदन्महानादं दानवो व्यथितस्तदा ॥ ४५ ॥

उस युद्धस्थलमें श्रीकृष्णकी भुजाद्वारा फाड़े गये केशीका मुख विकराल हो उठा । वह दानव व्यथित होकर बड़े जोर-जोरसे आर्तनाद करने लगा ॥ ४५ ॥

विघूर्णमानस्त्रस्ताङ्गो मुखाद् रुधिरमुद्वमन् ।
भृशं व्यङ्गीकृतवपुर्निकृत्तार्ध इवाचलः ॥ ४६ ॥

उसके सारे अङ्ग शिथिल हो गये थे । वह चक्कर काटता हुआ मुँहसे खून उगल रहा था । उसका शरीर कई अङ्गोंसे हीन हो चुका था । वह ऐसा दिखायी देता था, मानो किसी पर्वतको बीचसे चीर डाला गया हो ॥ ४६ ॥