विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 318, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| २९६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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ये ही परब्रह्म परमात्माके प्रथम पद^१ (तुरीय ब्रह्म) हैं, जो यहाँ जगत्के कल्याणके लिये अवतीर्ण हुए हैं। देवताओंकी रक्षाका भार वहन करनेवाले वे सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर आज भूतलपर अवतीर्ण होकर शोभा पाते हैं॥ २७ ॥
अयं भविष्ये कथितो भविष्यकुशलैर्नरैः ।
गोपालो यादवं वंशं क्षीणं विस्तारयिष्यति ॥ २८ ॥
इन्हींके विषयमें भविष्यकी बात बतानेमें कुशल मनुष्योंने कहा है कि गोपाल श्रीकृष्ण भविष्यमें क्षीण हुए यादववंशका विस्तार करेंगे ॥ २८ ॥
तेजसा यादवाश्चास्य शतशोऽथ सहस्रशः ।
वंशमापूरयिष्यन्ति ह्रदा इव महार्णवम् ॥ २९ ॥
जैसे नदियोंके बहुत-से जलप्रवाह महासागरको पूर्ण करते रहते हैं, उसी प्रकार सैकड़ों और हजारों यदुवंशी इनके प्रभावसे अपने वंशकी वृद्धि करेंगे ॥ २९ ॥
अस्येदं शासने सर्वं जगत् स्थास्यति शाश्वतम् ।
निहतामित्रसामन्तं स्फीतं कृतयुगे तथा ॥ ३० ॥
यह सारा जगत्, जो सनातनकालसे चला आ रहा है, इनके शासनमें स्थित होगा। उस समय इसको कष्ट देनेवाले शत्रु और सामन्त नष्ट हो जायेंगे और यह विश्व सत्ययुगकी भाँति सुख-शान्ति एवं समृद्धिसे सम्पन्न हो जायगा ॥ ३० ॥
अयमास्थाय वसुधां स्थापयित्वा जगद् वशे ।
राज्ञां भविष्यत्युपरि न च राजा भविष्यति ॥ ३१ ॥
ये इस वसुधापर रहकर जगत्को अपने वशमें स्थापित करके समस्त राजाओंके ऊपर प्रतिष्ठित हो जायेंगे, परंतु स्वयं राजा नहीं बनेंगे ॥ ३१ ॥
नूनं त्रिभिः क्रमैर्जित्वा यथायेन प्रभुः कृतः ।
पुरा पुरंदरो राजा देवतानां त्रिविष्टपे ॥ ३२ ॥
तथैव वसुधां जित्वा जितपूर्वां त्रिभिः क्रमैः ।
स्थापयिष्यति राजानमुग्रसेनं न संशयः ॥ ३३ ॥
निश्चय ही पूर्वकालमें जिस प्रकार इन्होंने अपने तीन पगोंद्वारा त्रिलोकीको जीतकर स्वर्गमें पुरन्दर इन्द्रको देवताओंका राजा बनाया था, उसी प्रकार पहलेकी तीन पगोंद्वारा जीती हुई इस वसुधाको फिर जीतकर यह उग्रसेनको राजाके आसनपर बैठायेंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ३२-३३ ॥
प्रसृतवैरघातोऽयं प्रश्नैश्च बहुभिः श्रुतः ।
ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादैश्च पुराणोऽयं हि गीयते ॥ ३४ ॥
यह फैले हुए वैरका अन्त करनेवाले हैं, प्रश्नोपनिषद्में बहुत-से (छः) प्रश्नोंद्वारा इन्हींके तत्त्वका प्रतिपादन सुना गया है। ब्रह्मवादी ब्राह्मणोंद्वारा ये पुराण-पुरुष कहे जाते हैं ॥ ३४ ॥
स्पृहणीयो हि लोकस्य भविष्यति च केशवः ।
तथा ह्यास्योत्थिता बुद्धिर्मानुष्यमुपजीवितुम् ॥ ३५ ॥
यह भगवान् केशव समस्त जगत्के लिये स्पृहणीय होंगे, क्योंकि इनकी बुद्धिमें मानवताको नया जीवन देनेका विचार उठ खड़ा हुआ है ॥ ३५ ॥
अहं त्वस्याद्य वसतिं पूजयिष्ये यथाविधि ।
विष्णुत्वं मनसा चैव पूजयिष्यामि मन्त्रवत् ॥ ३६ ॥
आज मैं इनके निवासस्थानका विधिपूर्वक पूजन करूँगा, फिर मन-ही-मन इनके विष्णुरूपकी भावना करके मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसकी अर्चना करूँगा ॥ ३६ ॥
यच्च ज्ञातिपरिज्ञानं प्रादुर्भावश्च वै नृषु ।
अमानुषं वेद्मि चैनं ये चान्ये दिव्यचक्षुषः ॥ ३७ ॥
इनमें जो अपने बन्धु-बान्धवोंको पहचाननेकी शक्ति है और जो इनका मनुष्योंमें अवतार हुआ है, वह सब मेरे लिये आदरणीय है। मैं तो इन्हें अमानव (अलौकिक परमात्मा) समझता ही हूँ, दूसरे दिव्य नेत्रधारी महापुरुष भी इन्हें ऐसा ही मानते हैं ॥ ३७ ॥
सोऽहं कृष्णेन वै रात्रौ सम्मन्त्र्य विदितात्मना ।
सहानेन गमिष्यामि सब्रजो यदि मंस्यते ॥ ३८ ॥
अतः मैं इन आत्मवेत्ता श्रीकृष्णके साथ रातमें भलीभाँति सलाह करके यदि ब्रजवासियोंसहित ये मेरी बात मान लेंगे तो इनके साथ ही कल मथुराकी यात्रा करूँगा ॥ ३८ ॥
एवं बहुविधं कृष्णं दृष्ट्वा हेत्वर्थकारणैः ।
विवेश नन्दगोपस्य कृष्णेन सह संसदम् ॥ ३९ ॥
इस प्रकार युक्तियुक्त कार्य-कारणका विचार करते हुए अक्रूरने श्रीकृष्णको बारंबार देखा और उनके साथ नन्दगोपकी बैठकमें प्रवेश किया ॥ ३९ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि अक्रूरागमने पञ्चविंशोऽध्यायः ॥ २५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें अक्रूरका आगमनविषयक पच्चीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २५ ॥
१. माण्डूक्य उपनिषद्में प्रणवकी मात्राओंपर विचार करते हुए ब्रह्मके चार पाद बताये गये हैं—विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तुरीय। इनमें तुरीय साक्षात् पूर्ण परब्रह्मका बोधक है। उत्पत्ति-क्रमसे गणना करनेपर यह तुरीय ही प्रथम पाद हो सकता है। इसीलिये यहाँ प्रथम पदका अर्थ तुरीय ब्रह्म किया गया है।