विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] तृतीयोऽध्यायः ११
**जनमेजयन पृच्छा—**द्विजश्रेष्ठ ! महर्षि नारदने प्रजापति दक्षके पुत्रोंको किस प्रकार नष्ट किया था ? इसको मैं स्पष्ट-रूपसे सुनना चाहता हूँ ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
दक्षस्य पुत्रा हर्यश्वा विवर्धयिषवः प्रजाः ।
समागता महावीर्या नारदस्तानुवाच ह ॥ १६ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन् ! दक्षके हर्यश्व नामक पुत्र महावीर्यवान् थे, जब वे प्रजाओंकी वृद्धिका विचार करनेके लिये उद्यत हुए, तब नारदजीने उनसे कहा—॥ १६ ॥
बालिशा बत यूयं वै नास्या जानीथ वै भुवः ।
प्रमाणं स्रष्टुकामाः स्म प्रजाः प्राचेतसात्मजाः ।
अन्तरूर्ध्वमधश्चैव कथं स्रक्ष्यथ वै प्रजाः ॥ १७ ॥
‘प्राचेतस (दक्ष) के पुत्रो ! खेदके साथ कहना पड़ता है कि तुम बड़े नादान हो। तुम्हें प्रजाकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई है; किंतु तुम इतना भी नहीं जानते कि जहाँ सृष्टि करनी है, उस पृथ्वीकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है ? यह ऊपर-नीचे और भीतरसे कैसी है ? ऐसी दशामें तुमलोग प्रजाओंकी सृष्टि कैसे करोगे ?’ ॥ १७ ॥
ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम् ।
प्रमाणं द्रष्टुकामास्ते गताः प्राचेतसात्मजाः ॥ १८ ॥
नारदजीकी इस बातको सुनकर वे प्राचेतस दक्षके पुत्र (इस पृथ्वीका) प्रमाण अर्थात् माप देखनेके लिये सब दिशाओंकी ओर चल दिये ॥ १८ ॥
वायोरनशनं प्राप्य गतास्ते वै पराभवम् ।
अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः ॥ १९ ॥
प्राणवायुके लिये आहार न पाकर वे सबके सब पराभव (विनाश) को प्राप्त हो गये। जैसे नदियाँ समुद्रमें मिल जानेपर फिर वहाँसे पीछे नहीं लौटती हैं, उसी प्रकार वे जाकर अबतक नहीं लौटे ॥ १९ ॥
हर्यश्वेष्वथ नष्टेषु दक्षः प्राचेतसः पुनः ।
वैरण्यामेव पुत्राणां सहस्रमसृजत् प्रभुः ॥ २० ॥
प्रचेताओँके पुत्र प्रभु दक्षने हर्यश्वोंके नष्ट हो जानेपर वैरण-की पुत्रीमे ही फिर सहस्र पुत्रोंको उत्पन्न किया ॥ २० ॥
विवर्धयिषवस्ते तु शबलाश्वाः प्रजास्तदा ।
पूर्वोक्तं वचनं तात नारदेनैव नोदिताः ॥ २१ ॥
तात ! वे दक्षके पुत्र शबलाश्व जब प्रजाकी वृद्धिके लिये इच्छुक हुए, तब नारदजीने पूर्वोक्त वचन कहकर उनको भी पृथ्वीका प्रमाण जाननेके लिये प्रेरित किया ॥ २१ ॥
अन्योन्यमूचुस्ते सर्वे सम्यगाह महामुनिः ।
भ्रातॄणां पदवीं ज्ञातुं गन्तव्यं नात्र संशयः ॥ २२ ॥
तब वे सब आपसमें कहने लगे—‘महामुनि नारदजी ठीक कहते हैं, अपने भाइयोंके मार्गको जाननेके लिये निःसंदेह हमें भी अवश्य प्रयत्न करना चाहिये ॥ २२ ॥
ज्ञात्वा प्रमाणं पृथ्व्याश्च सुखं स्रक्ष्यामहे प्रजाः ।
एकाग्राः स्वस्थ्यमनसा यथावदनुपूर्वशः ॥ २३ ॥
‘हम पृथ्वीके प्रमाणको जानकर एकाग्र और स्वस्थ-चित्तसे सुखपूर्वक प्रजाओंकी क्रमानुसार सृष्टि करेंगे ॥ २३ ॥
तेऽपि तेनैव मार्गेण प्रयाताः सर्वतोदिशम् ।
अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रेभ्य इवापगाः ॥ २४ ॥
ऐसा निश्चय करके वे भी उसी मार्गसे चारों दिशाओंकी ओर चल दिये और समुद्रोंसे उनमें मिली हुई नदियोंके समान अभीतक नहीं लौटे ॥ २४ ॥
नष्टेषु शबलाश्वेषु दक्षः क्रुद्धोऽवदद् वचः ।
नारदं नाशमेहीति गर्भवासं वसेति च ॥ २५ ॥
शबलाश्वोंके भी नष्ट हो जानेपर दक्ष प्रजापतिने क्रोधमें भरकर, नारदजीसे यह बात कही कि ‘तुम्हारी देह नष्ट हो जाय और तुम फिर गर्भमें निवास करो’ ॥ २५ ॥
तदाप्रभृति वै भ्राता भ्रातुरन्वेषणं नृप ।
प्रयातो नश्यति क्षिप्रं तन्न कार्यं विपश्चिता ॥ २६ ॥
राजन् ! उस दिनसे जो भाई भाईको खोजनेके लिये जाता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है, अतएव विद्वान्को ऐसा न करना चाहिये अर्थात् भाईको ढूँढ़नेके लिये भाईको नहीं जाना चाहिये ॥ २६ ॥
तांश्चापि नष्टान् विज्ञाय पुत्रान् दक्षः प्रजापतिः।
षष्टिं भूयोऽसृजत् कन्या वीरण्यामिति नः श्रुतम् ॥
हमने सुना है कि अपने उन पुत्रोंको भी नष्ट हुआ जान-कर दक्ष प्रजापतिने वीरणकी पुत्रीमें फिर साठ कन्याओंको उत्पन्न किया (क्योंकि कन्याएँ स्त्री होनेसे नारदजीके आत्म-ज्ञानके उपदेशकी पात्र नहीं थीं ) ॥ २७ ॥
तास्तदा प्रतिजग्राह भार्यार्थे कश्यपः प्रभुः ।
सोमो धर्मश्च कौरव्य तथैवान्ये महर्षयः ॥ २८ ॥
कुरुकुलोत्पन्न जनमेजय ! उन (मेसे कुछ कन्याओं) को प्रभु कश्यपजीने अपनी पत्नीके रूपमे स्वीकार कर लिया एवं चन्द्रमा, धर्म तथा दूसरे महर्षियोंने भी उन (मेसे कितनी ही कन्याओ) को अपनी पत्नीके रूपमें स्वीकार कर लिया ॥ २८ ॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सप्तविंशतिं सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमिने ॥ २९ ॥
द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे चैवाङ्गिरसे तथा ।
द्वे कृशाश्वाय विदुषे तासां नामानि मे शृणु ॥ ३० ॥
दक्षने धर्मको दस, कश्यपजीको तेरह, चन्द्रमाको सत्ताईस, अरिष्टनेमिको चार, भृगुपुत्रको दो, अङ्गिराको दो