विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 399, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[विष्णुपर्व ] त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ३७७
तदनन्तर सहस्रों बाणोंकी बौछार ग्रहण करते हुए वे दोनों युद्धाभिलाषी महायोद्धा वर्षाका आघात सहन करनेवाले दो पर्वतोंके समान वहाँ अविचलभावसे खड़े रहे ॥ ३३ ॥
गदाभिश्चैव शूर्मीभिः क्षेपणीयैश्च मुद्गरैः ।
अदर्द्यमानौ महेष्वासौ यादवौ न चकम्पतुः ॥ ३४ ॥
शत्रुओंकी भारी गदाओं, गोफनों या ढेलवासों तथा मुद्गरोंकी मारसे पीड़ित होते हुए भी वे दोनों महाधनुर्धर यादव वीर कम्पित नहीं हुए ॥ ३४ ॥
ततः कृष्णोऽम्बुदाकारः शङ्खचक्रगदाधरः ।
व्यवधंत महातेजा वातयुक्त इवानलः ॥ ३५ ॥
तत्पश्चात् शङ्ख, चक्र और गदा धारण करनेवाले घनश्यामविग्रह महातेजस्वी श्रीकृष्ण वायुसे प्रेरित होकर प्रज्वलित हुई अग्निके समान बढ़ने लगे ॥ ३५ ॥
स चक्रेणार्कनृत्येन दीप्यमानेन तेजसा ।
चिच्छेद समरे वीरो नृगजाश्वमहारथान् ॥ ३६ ॥
समराङ्गणमें उन वीर मधुसूदनने तेजसे उद्दीप्त होनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रके द्वारा मनुष्यों, हाथियों, घोड़ों तथा बड़े-बड़े रथोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले ॥ ३६ ॥
गदानिपातविहता लाङ्गलेन च कर्षिताः ।
न शेकुस्ते रणे स्थातुं पार्थिवा नष्टचेतसः ॥ ३७ ॥
गदाके आघातसे मारे गये तथा हलसे खींचकर नष्ट किये गये राजा लोग अपनी चेतना खोकर रणभूमिमें खड़े न रह सके ॥ ३७ ॥
चक्रक्षुरनिकृत्तानि विचित्राणि महीक्षिताम् ।
रथयूथानि भग्नानि न शेकुश्चलितुं रणे ॥ ३८ ॥
चक्रके छुरोंसे टुकड़े-टुकड़े किये गये राजाओंके विचित्र रथसमूह भग्न होकर युद्धभूमिमें आगे न बढ़ सके ॥ ३८ ॥
मुसलाक्षेपभग्नाश्च कुञ्जराः षष्टिहायनाः ।
घना इव घनापाये भग्नदन्ता विचुक्रुशुः ॥ ३९ ॥
मूसलोंकी मारसे घायल हुए साठ वर्षोंकी अवस्थावाले हाथी दाँत टूट जानेके कारण शरद्-ऋतुके जलहीन बादलोंके समान असमर्थ हो आर्तभावसे चीत्कार कर रहे थे ॥ ३९ ॥
चक्रानलज्वालहताः सादिनः सपदातयः ।
पेतुः परासवस्तत्र यथा वज्रहतास्तथा ॥ ४० ॥
सुदर्शन चक्रसे प्रकट हुई आगकी ज्वालासे झुलसकर कितने ही घुड़सवार और पैदल योद्धा धरतीपर पड़े थे। उनके प्राण-पखेरू उड़ गये थे तथा वे वज्रके आघातसे मरे हुएके तुल्य प्रतीत होते थे ॥ ४० ॥
चक्रलाङ्गलनिर्दग्धं तत्सैन्यं विदिलीकृतम् ।
युगान्तोपहतप्रख्यं सर्वं पतितमब्भौ ॥ ४१ ॥
चक्र और हलसे दग्ध होकर विदीर्ण की गयी वह सारी सेना इस तरह धरतीपर पड़ी थी मानो प्रलयकालमें सबका एक साथ संहार हो गया हो ॥ ४१ ॥
आक्रीडभूमिं दिव्यानामायुधानां वपुष्मताम् ।
वैष्णवानां नृपास्ते तु द्रष्टुमप्यबलीयसः ॥ ४२ ॥
वहाँ मूर्तिमान् होकर प्रकट हुए उन वैष्णव दिव्यास्त्रोंकी क्रीडा-भूमिरूप युद्धस्थलकी ओर देखनेमें भी वे राजालोग असमर्थ हो गये थे ॥ ४२ ॥
केचिद्रथाः सम्मृदिताः केचिन्निहतपार्थिवाः ।
भग्नैकचक्रास्त्वपरे विकीर्णा धरणीतले ॥ ४३ ॥
कितने ही रथ रौंद डाले गये। कितनोंके राजा मार डाले गये और कितने ही एक-एक पहिया नष्ट हो जानेके कारण भूतलपर बिखरे पड़े थे ॥ ४३ ॥
तस्मिन् विशसने घोरे चक्रलाङ्गलसम्प्लवे ।
दारुणानि प्रवृत्तानि रक्षांस्यौत्पातिकानि च ॥ ४४ ॥
चक्र और हलद्वारा जहाँ विप्लव मच गया था, उस घोर संग्राममें राक्षसोंद्वारा उपस्थित की गयी भयंकर उत्पातसूचक घटनाएँ घटित होने लगीं ॥ ४४ ॥
आर्तानां कूजमानानां पाटितानां च वेणुवत् ।
अन्तो न शक्यतेऽन्वेष्टुं नृनागरथवाजिनाम् ॥ ४५ ॥
जो आर्तभावसे चीख रहे थे तथा जो बाँसकी तरह चीर डाले गये थे, ऐसे मनुष्यों, हाथियों, रथारोहियों और घोड़ोंकी अन्तिम संख्या कितनी है, इसका पता लगाना असम्भव हो गया था ॥ ४५ ॥
सा पतितनरेन्द्राणां रुधिराऽऽर्द्रा रणक्षितिः ।
योषेव चन्दनाद्रार्ङ्गी भैरवा प्रतिभाति वै ॥ ४६ ॥
धरतीपर पड़े हुए राजाओंके रुधिरसे भीगी हुई वह रणभूमि लाल चन्दनसे आर्द्र अङ्गवाली नारीके समान भयंकर प्रतीत होती थी ॥ ४६ ॥
नरकेशास्थिमज्जान्त्रैः शातितानां च दन्तिनाम् ।
रुधिरौघप्लवस्तत्र च्छादयामास मेदिनीम् ॥ ४७ ॥
मनुष्योंके केशों, हड्डियों, मज्जाओं तथा आँतोंसे मिला हुआ कटे हाथियोंके रक्तका प्रवाह वहाँकी भूमिको आच्छादित करता जा रहा था ॥ ४७ ॥
तस्मिन् महाभीषणके नरवाहनसंक्षये ।
शिवानामशिवैः शब्दैर्नादिते घोरदर्शने ॥ ४८ ॥
वह रणभूमि बड़ी भयानक प्रतीत होती थी। वहाँ मनुष्यों और उनके वाहनोंका संहार हो रहा था। गीदड़ियोंके अमङ्गलसूचक शब्द वहाँ सदा गूँजते रहते थे। वह देखनेमें भी बड़ी भयंकर थी ॥ ४८ ॥