विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें[ विष्णुपर्व ] अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ३९५
संग्राम कैसा होगा—(यह आपलोग स्वयं अनुमान कर सकते हैं) ॥१०॥
कन्यार्थे यतमानेन गरुडस्थेन विष्णुना।
कः स्थास्यति रणे तस्मिन्नपि शक्रः सुरैः सह ॥ ११॥
राजकन्याके लिये यत्न करते हुए इन गरुडवाहन भगवान् विष्णुके साथ युद्धमे देवताओंसहित इन्द्र ही क्यों न हों, कौन ठहर सकेगा ॥ ११॥
यदा चास्मै नापि सुता कदाचित् सम्प्रदीयते ।
ततो ह्ययं बलादेनां नेतुं शक्तः सुरैः सह ॥ १२॥
यदि कदाचित् इन्हें कन्या न भी दी जाय तो ये देवताओंके साथ उपस्थित हो बलपूर्वक इसे ले जानेमे समर्थ हैं॥
पुरा एकार्णवे घोरे श्रूयते मेदिनी वियम् ।
पातालतलसम्मग्ना विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ १३॥
वाराहं रूपमास्थाय उद्धृता जगदादिना ।
हिरण्याक्षश्च दैत्येन्द्रो वराहेण निपातितः ॥ १४ ॥
सुना जाता है कि प्राचीन कालमे यह पृथ्वी भयंकर एकार्णवमें निमग्न हो रसातलमे जा पहुँची थी। उस समय जगत्के आदि कारण इन्हीं प्रभावशाली विष्णुने वाराहरूप धारण करके इसका उद्धार किया था। उस समय दैत्यराज हिरण्याक्षको भी वाराहरूपसे ही मार गिराया था ॥ १३-१४॥
हिरण्यकशिपुश्चैव महाबलपराक्रमः ।
अवध्योऽमरदैत्यानामृषिगन्धर्वकिन्नरैः ॥ १५॥
यक्षराक्षसनागानां नाकाशे नावनिस्थले ।
न चाभ्यन्तररात्र्यहोर्न शुष्केणार्द्रेकेण च ॥ १६ ॥
महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न दैत्यराज हिरण्यकशिपु देवताओं और दैत्योके लिये भी अवध्य था। ऋषि, गन्धर्व और किन्नर भी उसे मार नहीं सकते थे। यक्ष, राक्षस और नागोंके लिये भी वह अजेय था। वह न तो आकाशमें मर सकता था, न पृथ्वीपर। न रातमे न दिनमे और न सूखे अस्त्रसे न गीले अस्त्रसे ही ॥ १५-१६ ॥
अवध्यस्त्रिषु लोकेषु दैत्येन्द्रस्त्वपराजितः ।
नरसिंहेन रूपेण निहतो विष्णुना पुरा ॥ १७॥
तीनो लोकोंमे अवध्य वह दैत्यराज किसीसे पराजित होनेवाला नहीं था, तो भी पूर्वकालमे भगवान् विष्णुने नरसिंहरूप धारण करके उसे मार डाला ॥ १७॥
वामनेन तु रूपेण कश्यपस्यात्मजो बली ।
अदित्या गर्भसम्भूतॊ बलिर्बद्धोऽसुरोत्तमः ॥ १८॥
सत्यरज्जुमयैः पाशैः कृतः पातालसंश्रयः ।
बनाये गये पाशोंद्वारा बाँध लिया और उसे पाताललोकका निवासी बना दिया ॥ १८½ ॥
कार्तवीर्यो महावीर्यः सहस्रभुजविग्रहः ॥ १९ ॥
दत्तात्रेयप्रसादेन मत्तो राज्यमदेन च ।
कृतवीर्यका पुत्र महापराक्रमी अर्जुनका शरीर दत्तात्रेयजीकी कृपासे सहस्र भुजाओंसे सुशोभित होता था। वह राज्यमदसे उन्मत्त हो गया था ॥ १९½ ॥
जामदग्न्यो महातेजा रेणुकागर्भसंभवः ॥ २० ॥
त्रेताद्वापरयोः संधौ रामः शस्त्रभृतां वरः ।
(उसके दमनके लिये भगवान् विष्णु) त्रेता और द्वापरकी सन्धिके समय रेणुकाके गर्भसे प्रकट हुए। वे शस्त्रधारियोंमे श्रेष्ठ महातेजस्वी जमदग्निकुमार परशुरामके नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ २०½ ॥
पशुना वज्रकल्पेन सप्तद्वीपेश्वरो नृपः ।
विष्णुना निहतो भूयः छद्मरूपेण हैहयः ॥ २१ ॥
इस तरह पुनः छद्मरूपधारी भगवान् विष्णुने हैहयवंशमे उत्पन्न राजा कार्तवीर्यको, जो सातो द्वीपोंका स्वामी था, अपने वज्रतुल्य फरसेसे मार डाला ॥ २१ ॥
इक्ष्वाकुकुलसम्भूतो रामो दाशरथिः पुरा ।
त्रिलोकविजयं वीरं रावणं संन्यपातयत् ॥ २२॥
तत्पश्चात् वे इक्ष्वाकु-कुलमें दशरथनन्दन श्रीरामके रूपमें प्रकट हुए। उन्होंने पूर्वकालमें त्रिलोकविजयी वीर रावणको मार गिराया था ॥ २२ ॥
पुरा कृतयुगे विष्णुः संग्रामे तारकामये ।
षोडशार्द्धभुजो भूत्वा गरुडस्थो हि वीर्यवान् ॥ २३॥
निजघानासुरान् युद्धे वरदानेन गर्वितान् ।
कालनेमिश्च दैत्येयो देवानां च भयप्रदः ॥ २४॥
प्राचीन कालकी बात है—सत्ययुगमें जब तारकामय संग्राम हुआ था, उस समय पराक्रमी विष्णु आठ भुजाओंसे युक्त हो गरुडपर बैठकर वहाँ पधारे। वहाँ उन्होंने वरदानसे गर्वित हुए असुरोंको युद्धमे मार डाला तथा देवताओंको भय देनेवाले कालनेमि नामक दैत्यका भी वध कर दिया ॥ २३-२४॥
सहस्रकिरणाभेन चक्रेण निहतो युधि ।
महायोगबलेनाजौ विश्वरूपेण विष्णुना ॥ २५ ॥
यह सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, उन भगवान् विष्णुने युद्धमे महान् योगबलसे सूर्य-तुल्य तेजस्वी चक्रद्वारा उस दैत्यका संहार किया था ॥ २५ ॥
अनेन प्राप्तकालास्ते निहता बहवोऽसुराः ।
वने वनचरा दैत्या महाबलपराक्रमाः ॥ २६ ॥
निहता बालभावेन प्रलम्बारिष्टधेनुकाः ।