विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 50, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंहरिवंशपर्व ] षष्ठोऽध्यायः २७
वीरूद्भिः श्रूयते राजन् पुनर्दुग्धा वसुंधरा ।
पालाशं पात्रमादाय दग्धच्छिन्नप्ररोहणम् ॥ ४२ ॥
राजन् ! सुना जाता है कि इसके बाद पलाशके पत्तेका पात्र (दोना) लेकर वृक्षोंने भी पृथ्वीका दोहन किया। जल जाने या कट जानेपर जो पुनः अंकुरित होनेकी शक्ति है, वही उन्हें दूधके रूपमें प्राप्त हुई थी ॥ ४२ ॥
दुदॊह पुष्पितः सालो वत्सः प्लक्षोऽभवत् तदा ।
सेयं धात्री विधात्री च पावनी च वसुंधरा ॥ ४३ ॥
उस समय खिले हुए साल वृक्षने इस पृथ्वीको दुहा था और पाकड़का वृक्ष बछड़ा बना था। इस प्रकार यह पृथ्वी धात्री-विधात्री (माताके समान सबका धारण-पोषण करनेवाली) तथा पवित्र है ॥ ४३ ॥
चराचरस्य सर्वस्य प्रतिष्ठा योनिरॆव च ।
सर्वकामदुघा दोग्ध्री सर्वसस्यप्ररोहिणी ॥ ४४ ॥
यह पृथ्वी समस्त चराचर प्राणियोंका आश्रय-स्थान और उत्पत्ति-स्थान है। यह समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली कामधेनु है तथा यही सब प्रकारके सस्यों (अन्नके पौधों) को अंकुरित करनेवाली है ॥ ४४ ॥
आसीदियं समुद्रान्ता मेदिनीति परिश्रुता ।
मधुकैटभयोः कृत्स्ना मेदसाभिपरेप्लुता ।
तेनेयं मेदिनी देवी प्रोच्यते ब्रह्मवादिभिः ॥ ४५ ॥
पहले यह समुद्रतककी सारी पृथ्वी मधु और कैटभके मेद (चरबी) से भर गयी थी, इसलिये 'मेदिनी' नामसे विख्यात हुई; अतएव यह देवी ब्रह्मवादियोंद्वारा मेदिनी कही जाती है ॥ ४५ ॥
ततोऽभ्युपगमाद् राज्ञः पृथोर्वैन्यस्य भारत ।
दुहितृत्वमनुप्राप्ता देवी पृथ्वीति चोच्यते ।
पृथुना प्रविभक्ता च शोधिता च वसुंधरा ॥ ४६ ॥
सस्याकरवती स्फीता पुरपत्तनमालिनी ।
एवं प्रभावो वैन्यः स राजासीद् राजसत्तमः ॥ ४७ ॥
भरतवंशी राजन् ! फिर वेनपुत्र राजा पृथुके पुत्रीरूपमे अङ्गीकार करनेपर यह देवी उनकी पुत्री बन गयी, इससे यह पृथ्वी कहलाती है। इस पृथ्वीको पृथुने अनेक भागोंमें विभक्त एवं शुद्ध किया, इसको अन्न आदिकी खान बना दिया और समृद्धिशालिनी बनाकर इसे ग्रामों और नगरोंकी श्रेणियोंसे सुशोभित कर दिया। नृपश्रेष्ठ ! महाराज पृथु ऐसे प्रभावशाली थे ॥ ४६-४७ ॥
नमस्यश्चैव पूज्यश्च भूतग्रामैर्न संशयः ।
ब्राह्मणैश्च महाभागैर्वेदवेदाङ्गपारगैः ॥ ४८ ॥
पृथुरेव नमस्कार्यो ब्रह्मयोनिः सनातनः ।
अतएव सभी प्राणियोंको निःसंदेह उनकी पूजा तथा वन्दना करनी चाहिये । वेद-वेदाङ्गके पारगामी महात्मा ब्राह्मणोंको भी (अत्रिकुलमें उत्पन्न होनेके कारण) ब्रह्म-योनि एवं सनातन पुरुष (विष्णुरूप) पृथुके प्रति निश्चय ही नमस्कार करना चाहिये ॥ ४८॥
पार्थिवैश्च महाभागैः पार्थिवत्वमभीप्सुभिः ॥ ४९ ॥
आदिराजो नमस्कार्यः पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् ।
पृथ्वीके स्वामित्वको चाहनेवाले महाभाग्यवान् राजाओंको भी आदि राजा वेनपुत्र प्रतापी पृथुको प्रणाम करना चाहिये ॥ ४९॥
योधैरपि च विक्रान्तैः प्राप्तुकामैर्जयं युधि ।
पृथुरेव नमस्कार्यो योधानां प्रथमो नृपः ॥ ५० ॥
जो पराक्रमी राजा युद्धमे विजय चाहते हों उनको भी योद्धाओंमें अग्रणी राजा पृथुको अवश्य प्रणाम करना चाहिये ॥
यो हि योद्धा रणं याति कीर्तयित्वा पृथुं नृपम् ।
स घोररूपान् संग्रामान् क्षेमी तरति कीर्तिमान् ॥ ५१ ॥
जो योद्धा राजा पृथुका कीर्तन करके युद्धमें जाता है, वह भयङ्कर संग्रामको कुशलपूर्वक तर जाता (उसमें विजय प्राप्त करता) और यशस्वी होता है ॥ ५१ ॥
वैश्यैरपि च वित्तार्थैः पण्यवृत्तिमधिष्ठितैः ।
पृथुरेव नमस्कार्यो वृत्तिदाता महायशाः ॥ ५२ ॥
वाणिज्य आदिसे आजीविका चलानेवाले धनवान् वैश्यों-को भी चाहिये कि वे वृत्ति (आजीविका) प्रदान करनेवाले महायशस्वी पृथुको अवश्य प्रणाम करें ॥ ५२ ॥
तथैव शूद्रैः शुचिभिस्त्रिवर्णपरिचारिभिः ।
आदिराजो नमस्कार्यः श्रेयः परमभीप्सुभिः ॥ ५३ ॥
इसी प्रकार परम कल्याण चाहनेवाले एवं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—इन तीनों वर्णोंकी सेवामे परायण रहनेवाले पवित्र शूद्रों-को भी आदि राजा पृथुको प्रणाम करना चाहिये ॥ ५३ ॥
एते वत्सविशेषाश्च दोग्धारः क्षीरमेव च ।
पात्राणि च मयोक्तानि किं भूयो वर्णयामि ते ॥ ५४ ॥
मैंने तुमसे इन बछड़ोंका, पात्रोंका, दुहनेवालोंका और दुग्धोंका वर्णन कर दिया। अब मैं तुमसे और क्या कहूँ ॥ ५४॥
य इदं शृणुयान्नित्यं पृथोरैश्वर्यमादितः ।
पुत्रपौत्रसमायुक्तो मोदते सुचिरं भुवि ॥ ५५ ॥
जो पुरुष (प्रत्येक कल्पमें होनेवाले अतएव) नित्य इस पृथु-चरित्रको आदिसे (अन्ततक) सुनता है, वह पुरुष पुत्र-पौत्रोंके साथ इस पृथ्वीपर चिर-कालतक आनन्द करता है ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पृथूपाख्याने षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पृथुके उपाख्यानकी समाप्तिविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ६ ॥