भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

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पृष्ठ 593

विष्णुपर्व ] एकोननवतितमोऽध्यायः [ ५७१


विरागवस्त्राभरणाः प्रहृष्टाः
क्रीडाभिरामा मदिरविक्लाक्षाः ॥ ४१ ॥

बलरामजीके कूदनेके पश्चात् श्रीकृष्णके पुत्र तथा भीमवंशियोंके प्रधान-प्रधान व्यक्ति नाना प्रकारके रंगवाले वस्त्र और आभूषण धारण किये हर्षमें भरकर समुद्रमें कूद पड़े । उस समय वे जलक्रीड़ामें अभिरत थे और उनकी आँखें मधुसे मतवाली हो रही थीं ॥ ४१ ॥

शेषास्तु भैमा हरिमभ्युपेताः
क्रीडाभिरामा निशठोल्मुकाद्याः ।
विचित्रवस्त्राभरणाश्च मत्ताः
संतानमाल्यावृतकण्ठदेशाः ॥ ४२ ॥

शेष यादव तथा निशठ और उल्मुक आदि बलरामपुत्र क्रीड़ामें अभिरत होकर श्रीकृष्णके निकट गये । वे विचित्र वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और मदमत्त थे तथा उनके कण्ठदेश संतान-पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत थे ॥ ४२ ॥

वीर्योपपन्नाः कृतचारुचिह्ना
विलिप्तगात्रा जलपात्रहस्ताः ।
गीतानि तद्वेषमनोहराणि
स्वरोपपन्नान्यथ गायमानाः ॥ ४३ ॥

वे सब-के-सब बल-पराक्रमसे सम्पन्न तथा मनोहर वेषभूषासे युक्त थे । उनके अङ्गोंमें चन्दनका लेप लगा था । वे हाथोंमें जलपात्र लिये हुए थे और उस वेषके अनुरूप स्वरसम्पन्न मनोहर गीत गा रहे थे ॥ ४३ ॥

ततः प्रचक्रुर्जलावादितानि
नानास्वराणि प्रियवाद्यघोषाः ।
सहाप्सरोभिस्त्रिदिवालयाभिः
कृष्णाज्ञया वेशवधूशतानि ॥ ४४ ॥

तत्पश्चात् श्रीकृष्णकी आज्ञासे स्वर्गवासिनी अप्सराओंके साथ सैकड़ों वेशवधुओंने, जिन्हें वाद्यघोष बहुत ही प्रिय था, नाना स्वरोंमें जल-तरंग आदि बाजे बजाने आरम्भ किये ॥ ४४ ॥

आकाशगङ्गाजलवादनज्ञाः
सदा युवत्यो मदनैकचित्ताः ।
अवादयंस्ता जलदर्ददुरांश्च
वाद्यानुरूपं जगिरे च हृष्टाः ॥ ४५ ॥

अप्सराएँ नित्य युवती, एकमात्र काममें ही मनको लगानेवाली तथा आकाशगङ्गाके जलसे बाजा बजानेकी कलाका ज्ञान रखनेवाली थीं । उन्होंने जलदर्ददुर^१ बजाये और हर्षमें भरकर उस वाद्यके अनुरूप गीत भी गाये ॥ ४५ ॥

कुशेशयाकोशविशालनेत्राः
कुशेशयापीडविभूषिताश्च ।
कुशेशयानां रविबोधितानां
जहुः श्रियं ताः सुरचारुमुख्यः ॥ ४६ ॥

स्वर्गीय अप्सराओंके नेत्र कमलकलिकाओंके समान विशाल थे । वे कमलोंके ही मुकुटोंसे विभूषित थीं तथा सूर्यकी किरणोंद्वारा खिले हुए कमलोंकी शोभाको चुराये लेती थीं । उन सबके मुख देवताओंके समान मनोहर थे ॥ ४६ ॥

स्त्रीवक्त्रचन्द्रैः सकलेन्दुकल्पै
रराज राजञ्छतशः समुद्रः ।
यदृच्छया दैवविधानतो वा
नभो यथा चन्द्रसहस्रकीर्णम् ॥ ४७ ॥

राजन् ! सम्पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान मनोहर नारियोंके सैकड़ों मुख-चन्द्रोंसे अलंकृत हुआ समुद्र उस आकाशके समान शोभा पा रहा था, जो अकस्मात् या दैवके विधानके अनुसार सहस्रों चन्द्रमाओंसे व्याप्त हो गया हो ॥ ४७ ॥

समुद्रमेघः स रराज राज-
ञ्छतह्रदास्त्रीप्रभयाभिरामः ।
सौदामिनीभिन्न इवाम्बुनाथो
देदीप्यमानो नभसीव मेघः ॥ ४८ ॥

नरेश्वर ! विद्युत्‌के समान कान्तिमती स्त्रियोंकी प्रभासे अत्यन्त मनोहर दिखायी देनेवाला वह समुद्ररूपी मेघ उसी तरह सुशोभित हो रहा था, जैसे जलका स्वामी मेघ आकाशमें बिजलियोंसे संयुक्त होकर अत्यन्त उद्भासित हो उठता है ॥ ४८ ॥

नारायणश्चैव सनारदश्च
सिषेच पक्षे कृतचारुचिह्नः ।
बलं सपक्षं कृतचारुचिह्नं
स चैव पक्षं मधुसूदनस्य ॥ ४९ ॥

सुन्दर एवं मनोहर वेश-भूषा धारण किये भगवान् श्रीकृष्ण और नारद अपने दलके लोगोंके साथ स्थित हो सुन्दर वेश-भूषावाले बलराम तथा उनके पक्षके लोगोंपर पानी उछालने लगे और बलराम-पक्षके लोग भी श्रीकृष्णके पक्षवालोंको जलसे भिगोने लगे ॥ ४९ ॥


^१. प्राचीन कालका एक बाजा, जिसपर चमड़ा मढ़ा होता था।