भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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६३० श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे

मार डालनेकी चेष्टा करो। इसने मेरा अप्रिय किया है, अब मैं इस तरह इसे जीवित देखना नहीं चाहता' ॥ ४०-४१॥

श्रुत्वा तु शम्बराद्वाक्यं सुतास्ते शम्बरस्य ह ॥ ४२ ॥
संनद्धा निर्ययुर्हृष्टाः प्रद्युम्नवधकाङ्क्षया।

शम्बरका यह आदेश सुनकर उसके पुत्र कवच आदिसे सुसज्जित हो प्रद्युम्नके वधकी इच्छासे हर्षपूर्वक निकले ॥४२॥

चित्रसेनोऽतिसेनश्च विष्वक्सेनो गदस्तथा ॥ ४३ ॥
श्रुतसेनः सुषेणस्तु सोमसेनो मनस्तथा।
सेनानी सैन्यहन्ता च सेनाहा सैनिकस्तथा ॥ ४४ ॥
सेनस्कन्धोऽतिसेनश्च सेनको जनकः सुतः।
सकालो विकलः शान्तः स शातान्तकरोऽशुचिः॥४५॥
कुम्भकेतुः सुदंष्ट्रश्च केशिरित्येवमादयः।

चित्रसेन, अतिसेन, विष्वक्सेन, गद, श्रुतसेन, सुषेण, सोमसेन, मन, सेनानी, सैन्यहन्ता, सेनाहा, सैनिक, सेनस्कन्ध, अतिसेन, सेनक, जनक, सुत, सकाल, विकल, शान्त, शातान्तकर, अशुचि, कुम्भकेतु, सुदंष्ट्र और केशि आदि उनके नाम थे ॥ ४३-४५॥

चक्रतोमरशूलानि पट्टिशानि परश्वधान् ॥ ४६ ॥
गृहीत्वा निर्ययुर्हृष्टा मन्युना परमाप्लुताः।
आह्वयंतस्तममित्रं वै तस्थुः संग्राममूर्धनि ॥ ४७ ॥

वे सब-के-सब हर्ष और उत्साहसे परिपूर्ण हो प्रद्युम्नके प्रति क्रोधसे भरकर चक्र, तोमर, शूल, पट्टिश और फरसे लिये निकले और अपने उस शत्रुको ललकारते हुए युद्धके मुहानेपर खड़े हो गये ॥ ४६-४७ ॥

प्रद्युम्नस्तु महाबाहु रथमारुह्य सत्वरम्।
निर्ययौ चापमादाय संग्रामाभिमुखस्तदा ॥ ४८ ॥

उस समय महाबाहु प्रद्युम्न तुरंत ही रथपर आरूढ़ हो धनुष लेकर युद्धक्षेत्रकी ओर चल दिये ॥ ४८ ॥

ततः प्रवृत्तं युद्धं तु तुमुलं लोमहर्षणम्।
शम्बरस्य तु पुत्राणां केशवस्य च सूनुना ॥ ४९ ॥

तदनन्तर शम्बरासुरके पुत्रोंका केशवकुमारके साथ भयंकर एवं रोमाञ्चकारी युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ४९ ॥

ततो देवाः सगन्धर्वाः समहोरगचारणाः।
देवराजं पुरस्कृत्य विमानाग्रेषु धिष्ठिताः ॥ ५० ॥

फिर तो सब देवता, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग और चारण देवराज इन्द्रको आगे करके विमानोंके अग्रभागोंमें स्थित हुए ॥

नारदस्तुम्बुरुश्चैव हाहाहूहूश्च गायनाः।
अप्सरोभिः परिवृताः सर्वे तत्रावतस्थिरे ॥ ५१ ॥

नारद, तुम्बुरु, हाहा और हूहू—ये गान करनेवाले गन्धर्व अप्सराओंसे घिरकर सभी उन विमानोंमें स्थित थे ॥ ५१ ॥

देवराजप्रतीहारो गन्धर्वश्चित्रमद्भुतम्।
शशंस देवराजाय वज्रिणे तद्विचेष्टितम् ॥ ५२ ॥

देवराज इन्द्रका प्रतीहार गन्धर्व वज्रधारी इन्द्रको प्रद्युम्नकी विचित्र एवं अद्भुत चेष्टाएँ सुनाने लगा—॥५२॥

शम्बरस्य शतं पुत्रा एकः कृष्णस्य चात्मजः।
बहूनां युध्यतामेष कथं विजयमाप्नुयात् ॥ ५३ ॥

'एक ओर तो शम्बरासुरके सौ पुत्र हैं और दूसरी ओर श्रीकृष्णके एकमात्र पुत्र प्रद्युम्न हैं, बहुत-से योद्धाओंके सामने ये अकेले ही कैसे विजय पा सकते हैं' ॥ ५३ ॥

तच्छ्रुत्वा भाषितं तस्य प्रहस्य बलसूदनः।
उवाच वचनं चेदं शृणु योऽस्य पराक्रमः ॥ ५४ ॥

उसका वह कथन सुनकर बलसूदन इन्द्र जोर-जोरसे हँस पड़े और बोले—'प्रद्युम्नका जो पराक्रम है, उसका वर्णन सुनो ॥

कामोऽयं पूर्वदेहे तु हरक्रोधाग्निना हतः।
रत्या प्रसादितो देवः कामपत्नया त्रिलोचनः।
परितुष्टेन देवेन वरमस्याः प्रदीयते ॥ ५५ ॥

'ये कामदेव हैं, जो पूर्वशरीरमें रहते समय भगवान् शंकरकी क्रोधाग्निसे भस्म हो गये थे, फिर कामपत्नी रतिने महादेवजीको प्रसन्न किया। प्रसन्न हुए महादेवजीने उसे वर दिया ॥ ५५ ॥

विष्णुर्मानुषदेहस्तु द्वारकायां भविष्यति।
तस्य पुत्रत्वमस्यैव भविष्यति न संशयः ॥ ५६ ॥

'भगवान् विष्णु मानव-शरीर धारण करके जब द्वारकामें निवास करेंगे, उस समय तुम्हारे स्वामी कामदेव उनके पुत्र होंगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ५६ ॥

अनङ्ग इति विख्यातस्त्रैलोक्ये तु महायशाः।
तत्रोत्पन्नो महातेजाः शम्बरं घातयिष्यति ॥ ५७ ॥

'इस समय ये महायशस्वी कामदेव तीनों लोकोंमें अनङ्ग नामसे विख्यात होंगे और द्वारकामें उत्पन्न होनेपर महान् तेजसे सम्पन्न हो शम्बरासुरका वध करेंगे ॥ ५७ ॥

सप्ताहे जातमात्रे तु रुक्मिण्याः क्रोडसंस्थितम्।
आस्थाय शम्बरो मायां प्रद्युम्नमपनेष्यति ॥ ५८ ॥

'उनके जन्मसे केवल सात दिनका समय व्यतीत होनेपर रुक्मिणीकी गोदमें स्थित हुए प्रद्युम्नको मायाका आश्रय ले शम्बरासुर हर ले जायगा ॥ ५८ ॥

तद् गच्छ शम्बरगृहं भार्या मायावती भव।
मायारूपप्रतिच्छन्ना शम्बरं मोहयिष्यसि ॥ ५९ ॥

'अतः तू शम्बरासुरके घर जा और उसकी मायामयी भार्या बन जा। मायासे अपने यथार्थ रूपको छिपाकर तू शम्बरासुरको मोहमें डाले रहेगी ॥ ५९ ॥