भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 654

६३२ श्रीमन्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे


निहत्य समरे सर्वांश्छतमुत्तमधन्विनाम् ॥ ९ ॥
प्रद्युम्नः समराकाङ्क्षी तस्थौ संग्राममूर्धनि ।
महातेजस्वी प्रद्युम्न खेल-सा करते हुए इनके मस्तक काट-काटकर गिराने लगे । समराङ्गणमे जो सौ उत्तम धनुर्धर वीर थे, उन सबका संहार करके वे मनमें और भी युद्धकी अभिलाषा लिये संग्रामके मुहानेपर खड़े हो गये ॥ ९½॥

हतं पुत्रशतं श्रुत्वा शम्बरः क्रोधमादधे ॥ १० ॥
सूतं संचोदयामास रथं मे संप्रयोजय ।
अपने सौ पुत्रोंका वध हुआ सुनकर शम्बरासुरको बड़ा क्रोध हुआ । उसने सारथिको आदेश दिया कि मेरे रथको जोतो ॥ १०½ ॥

राज्ञो वाक्यं निशाम्याथ प्रणम्य शिरसा भुवि ॥ ११ ॥
ससैन्यं नोदयामास रथं स सुसमाहितम् ।
राजाकी यह बात सुनकर सारथिने पृथ्वीपर मस्तक टेककर प्रणाम किया और सेनासहित रथको पूरी सावधानीके साथ युद्धके लिये प्रेरित किया ॥ ११½ ॥

युक्तमृष्यसहस्रेण सर्पयोक्त्रेण योजितम् ॥ १२ ॥
शार्दूलचर्मसंविष्टं किङ्किणीजालमालिनम् ।
ईहामृगगणाकीर्णं पङ्क्तिभिर्विराजितम् ॥ १३ ॥
उस रथमें एक सहस्र मृग जुते हुए थे । वह सर्पोंकी रस्सियोंसे जोता गया था । वह रथ व्याघ्रचर्मसे ढका हुआ था, उसमें घुँघुरुओंकी माला शोभा दे रही थी, वह कृत्रिम पशु-पक्षियोंसे व्याप्त तथा दस चित्रभागोंसे विभूषित था ॥

ताराचित्रपिनद्धाङ्गं स्वर्णकूवरभूषितम् ।
सुपताकमहोच्छ्रायं मृगराजोग्रकेतनम् ॥ १४ ॥
उसके सारे अङ्ग तारिकाओंके चित्रसे व्याप्त थे । सोनेका कूबर उस रथकी शोभा बढ़ा रहा था । उसका बहुत ही ऊँचा भाग सुन्दर पताकाओंसे सुशोभित था। उसमें सिंहके चिह्नवाली उग्र ध्वजा फहरा रही थी ॥ १४ ॥

सुविभक्तवरणं च लोहेषावज्रकूवरम् ।
मन्दरोदग्रशिखरं चारुचामरभूषितम् ॥ १५ ॥
उस रथका आवरण सुन्दर विभागपूर्वक बना हुआ था । उसमें लोहेके हरसे और वज्रमणिजटित कूबर शोभा पाते थे । उसका शिखर मन्दराचलके समान ऊँचा था । वह सुन्दर चँवरसे विभूषित था ॥ १५ ॥

नक्षत्रमालापिहितं हेमदण्डसमाहितम् ।
विराजमानं श्रीमन्तमारोहच्छम्बरो रथम् ॥ १६ ॥
नक्षत्रोंकी मालाओंसे आवृत्त तथा सुवर्णमय दण्डसे सुस्थिर बने हुए उस शोभाशाली कान्तिमान् रथपर शम्बरासुर आरूढ़ हुआ ॥ १६ ॥

काञ्चनं चित्रसंनाहं धनुर्गृह्य शरांस्तथा ।
प्रस्थितः समराकाङ्क्षी मृत्युना परिचोदितः ॥ १७ ॥
सोनेका विचित्र कवच, धनुष और बाण धारण करके कालसे प्रेरित हो युद्धकी इच्छासे वह प्रस्थित हुआ ॥ १७ ॥

चतुर्भिः सचिवैः सार्द्धं सैन्येन महता वृतः ।
दुर्धरः केतुमाली च शत्रुहन्ता प्रमर्दनः ॥ १८ ॥
एतैः परिवृतोऽमात्यैर्युयुत्सुः प्रस्थितो रणे ।
उसके साथ चार मन्त्री थे और वह विशाल सेनासे घिरा हुआ था । दुर्धर, केतुमाली, शत्रुहन्ता और प्रमर्दन—इन मन्त्रियोंमें घिरा हुआ वह युद्धकी इच्छासे रणभूमिकी ओर प्रस्थित हुआ ॥ १८½ ॥

दशनागसहस्राणि रथानां द्वे शते तथा ॥ १९ ॥
हयानां चाष्टसाहस्रैः प्रयुतश्च पदातिनाम् ।
एतैः परिवृतो योधैः शम्बरः प्रययौ तदा ॥ २० ॥
दस हजार हाथी, दो सौ रथ, आठ हजार घोड़े और दस लाख पैदल इतने योद्धाओंमे घिरे हुए शम्बरासुरने उस समय युद्धके लिये प्रस्थान किया ॥ १९-२० ॥

प्रयातस्य तु संग्रामे उत्पाता बहवोऽभवन् ।
गृध्रचक्राकुलं व्योम संध्याकाराभ्रनादितम् ॥ २१ ॥
युद्धके लिये जाते समय उसके सामने बहुत-से उत्पात प्रकट हुए । आकाशमें गृध्रोंका मण्डल मँडराने लगा । संध्याकालके समान लाल रङ्गके बादल गड़गड़ाने लगे ॥ २१ ॥

गर्जन्ति परुषं मेघा निर्घाताश्चाम्बरात् पतन् ।
शिवा विनेदुरशिवं सैन्यं संकालयन्महत् ॥ २२ ॥
मेघ बड़े कठोर शब्दमें गर्जना करने लगे, आकाशसे बिजली गिरने लगी, गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं, जिससे सेनाके महान् संहारकी सूचना मिलती थी ॥

ध्वजशीर्षेऽपतद्गृध्रः काङ्क्षन् वै दानवासृजम् ।
रथाग्रे पतितश्चास्य कबन्धो भुवि दृश्यते ॥ २३ ॥
गीध दानवोंके रक्तका पान करनेकी इच्छा रखकर उसकी ध्वजाके अग्रभागपर जा बैठा । उसके रथके सामने पृथ्वीपर कबन्ध पड़ा हुआ दिखायी देने लगा ॥ २३ ॥

चीचींकूचीति वाशन्ति शम्बरस्य रथोपरि ।
खर्भानुग्रस्त आदित्यः परिघैः परिवेष्टितः ॥ २४ ॥
शम्बरासुरके रथके ऊपर बहुत-से पक्षी 'चीचीं कूची' ऐसी बोली बोलने लगे । सूर्यको राहुने ग्रस लिया और उनपर अनेक घेरे पड़ गये ॥ २४ ॥

स्फुरते नयनं चास्य सव्यं भयनिवेदनम् ।
बाहुः प्रकम्पते सव्यः प्रास्खलन् रथवाजिनः ॥ २५ ॥
उसका बायाँ नेत्र फड़कने लगा, जो भयकी सूचना दे रहा था । बायीं भुजा काँपने लगी और रथके घोड़े लड़खड़ाकर गिरने लगे ॥ २५ ॥