भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 667

विष्णुपर्व ] नवाधिकशततमोऽध्यायः ६४५ तदनन्तर प्रद्युम्नने अपने पिता श्रीकृष्ण और माता रुक्मिणीके चरणोंमें प्रणाम करके अपने ताऊ महाबली हलधरका भी पूजन किया ॥ ३३ ॥ उत्थाप्य तं परिष्वज्य मूर्क्युपाघ्राय वीर्यवान् । प्रद्युम्नं वलिनां श्रेष्ठं केशवः परवीरहा ॥ ३४ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णने बलवानोंमें श्रेष्ठ प्रद्युम्नको उठाकर हृदयसे लगाया और मस्तक सूँघकर अपना स्नेह प्रदान किया ॥ ३४ ॥ स्नुषां चोत्थाप्य तां देवी रुक्मिणी रुक्मभूषणा । परिष्वज्योपसंगृह्य स्नेहाद् गद्गदभाषिणी ॥ ३५ ॥ सोनेके आभूषणोंसे विभूषित हुई देवी रुक्मिणीने अपनी उस पुत्रवधूको उठाकर हृदयसे लगा लिया और उसे सर्वतोभावेन अपनाकर स्नेहसे गद्गद वाणीद्वारा उसका स्वागत किया ॥ ३५ ॥ समेत्य भवनं पत्न्या शचीन्द्रमदितिर्यथा । प्रवेशयामास तदा रुक्मिणी सुतमागतम् ॥ ३६ ॥ जैसे देवमाता अदितिने शची और इन्द्रको देवभवनमें प्रविष्ट किया था, उसी प्रकार रुक्मिणीने पत्नीके साथ आये हुए पुत्रसे मिलकर उसका भवनके भीतर प्रवेश कराया ॥ ३६ ॥ इति श्रीमन्महाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि प्रद्युम्नागमने अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०८ ॥ इस प्रकार श्रीमन्महाभारते खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें प्रद्युम्नका आगमनविषयक एक सौ आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०८ ॥ नवाधिकशततमोऽध्यायः बलदेवजीके द्वारा प्रद्युम्नको आह्निकस्तोत्रका उपदेश वैशम्पायन उवाच अत्राश्चर्यात्मकं स्तोत्रमाह्निकं जयतां वर । प्रद्युम्ने द्वारकां प्राप्ते हत्वा तं कालशम्बरम् ॥ १ ॥ बलदेवेन रक्षार्थं प्रोक्तमाह्निकमुच्यते । यज्जप्त्वा तु नृपश्रेष्ठ सायं पूतात्मतां व्रजेत् ॥ २ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ जनमेजय ! जब प्रद्युम्न कालशम्बरका वध करके द्वारकापुरी- में आये, उस समय बलदेवजीने उनकी रक्षाके लिये उन्हें एक स्तोत्रका उपदेश दिया; जिसे आह्निक कहते हैं। नृपश्रेष्ठ ! उसी आश्चर्यमय आह्निक स्तोत्रका यहाँ वर्णन किया जाता है, जिसका सायंकालमें जप करनेसे मनुष्य पूतात्मा ( पवित्र अन्तःकरणवाला) हो जाता है ॥ १-२ ॥ कीर्तितं बलदेवेन विष्णुना चैव कीर्तितम् । धर्मकामैश्च मुनिभिर्ऋषिभिश्चापि कीर्तितम् ॥ ३ ॥ इस स्तोत्रका बलदेवजीने, भगवान् विष्णुने तथा धर्मा- भिलाषी ऋषि-मुनियोंने भी कीर्तन किया है ॥ ३ ॥ कर्हिचिद् रुक्मिणीपुत्रो हलिना संयुतो गृहे । उपविष्टः प्रणम्याथ तमुवाच कृताञ्जलिः ॥ ४ ॥ एक समयकी बात है, रुक्मिणीपुत्र प्रद्युम्न घरमें बलरामजीके साथ बैठे हुए थे। उन्होंने हाथ जोड़कर बलरामजीको प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा ॥ ४ ॥ प्रद्युम्न उवाच कृष्णानुज महाभाग रोहिणीतनय प्रभो । किंचित् स्तोत्रं मम ब्रूहि यज्जप्त्वा निर्भयोऽभवम् ॥ ५ ॥ प्रद्युम्न बोले—भगवान् श्रीकृष्णके बड़े भाई महाभाग रोहिणीनन्दन ! प्रभो ! मुझे किसी ऐसे स्तोत्रका उपदेश दीजिये, जिसका जप करके मैं निर्भय हो जाऊँ ॥ ५ ॥ श्रीबलदेव उवाच सुरासुरगुरुर्ब्रह्मा पातु मां जगतः पतिः। अथोङ्कारवषट्कारौ सावित्री विधयस्त्रयः ॥ ६ ॥ ऋचो यजूंषि सामानि छन्दांस्याथर्वणानि च । चत्वारस्त्वखिला वेदाः सरहस्याः सविस्तराः ॥ ७ ॥ पुराणमितिहासश्चाखिलान्युपखिलानि च। अङ्गान्यङ्गोपाङ्गानि तथा व्याख्यातानि च पान्तु माम् ॥ ८ ॥ श्रीबलदेवजीने कहा--देवताओं और असुरोंके गुरु जगत्पति ब्रह्माजी मेरी रक्षा करें। ओङ्कार, वषट्कार, सावित्री, तीन प्रकारकी¹ विधियाँ, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, रहस्य और विस्तारसहित सम्पूर्णरूपसे चारों वेद, इतिहास, पुराण, खिल, उपखिल, अङ्ग, उपाङ्ग तथा व्याख्याग्रन्थ-इन सबके अभिमानी देवता मेरी रक्षा करें ॥ पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम् । इन्द्रियाणि मनो बुद्धिस्तथा सत्त्वं रजस्तमः ॥ ९ ॥ व्यानोदानौ समानश्च प्राणोऽपानश्च पञ्चमः । वायवः सप्त चैवान्ये येष्वायत्तमिदं जगत् ॥ १० ॥ मरीचिरङ्गिरात्रिश्च पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। भृगुर्वसिष्ठो भगवान् पान्तु ते मां महर्षयः ॥ ११ ॥ पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, पाँचवाँ तेज, इन्द्रियाँ, १. अपूर्वविधि, नियमविधि और परिसंख्याविधि ।