विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 672, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६५० | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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एवं शुद्धात्मा मुनि तथा दूसरे यज्ञपरायण स्पृहणीय तथा शान्त महर्षि जिनका यहाँ कीर्तन नहीं किया गया है, सदा मेरे लिये शान्ति प्रदान करें ॥ ८५-९४ १/२ ॥
त्रयोऽग्नयस्त्रयो वेदास्त्रैविद्याः कौस्तुभो मणिः ॥ ९५॥
उच्चैःश्रवा हयः श्रीमान् वैद्यो धन्वन्तरिर्हरिः ।
अमृतं गौः सुपर्णश्च दधि गौराश्च सर्षपाः ॥ ९६ ॥
शुक्लाः सुमनसः कन्याः श्वेतच्छत्रं यवाक्षताः ।
दूर्वा हिरण्यं गन्धाश्च वालव्यजनमेव च ॥ ९७ ॥
तथाप्रतिहतं चक्रं महोक्षश्चन्दनं विषम् ।
श्वेतो वृषः करी मत्तः सिंहो व्याघ्रो हयो गिरिः ॥ ९८ ॥
पृथिवी चोद्धृता लाजा ब्राह्मणा मधु पायसम् ।
स्वस्तिको वर्धमानश्च नन्द्यावर्तः प्रियङ्गवः ॥ ९९ ॥
श्रीफलं गोमयं मत्स्यो दुन्दुभिः पटहस्वनः ।
ऋषिपत्न्यश्च कन्याश्च श्रीमद् भद्रासनं धनुः ।
रोचना रुचकश्चैव नदीनां संगमोदकम् ॥ १००॥
सुपर्णाः शतपत्राश्च चकोरा जीवजीवकाः ।
नन्दीमुखो मयूरश्च बद्धमुक्तामणिध्वजाः ॥ १०१॥
आयुधानि प्रशस्तानि कार्यसिद्धिकराणि च ।
तीन अग्नि, तीन वेद, तीनों विद्याओंके ज्ञाता, कौस्तुभमणि, उच्चैःश्रवा अश्व, श्रीमान् धन्वन्तरि वैद्य, हरि, अमृत, गौ, सुपर्ण (गरुड़), दही, श्वेत सरसों, सफेद फूल, कुमारी कन्या, श्वेत छत्र, जौ, अक्षत, दूर्वादल, सुवर्ण, गन्ध, वालव्यजन (चँवर); कहीं भी प्रतिहत न होनेवाला सुदर्शनचक्र, साँड, चन्दन, विष, श्वेत वृषभ, मदमत्त हाथी, सिंह, व्याघ्र, घोड़ा, पर्वत खोदकर निकाली हुई मिट्टी, लाजा, ब्राह्मण, मधु, खीर, स्वस्तिक, वर्धमान, नन्द्यावर्त, प्रियङ्गु, श्रीफल, गोमय, मत्स्य, दुन्दुभि और पटहकी ध्वनि, ऋषिपत्नियों, कन्याएँ, शोभाशाली भद्रासन, धनुष, गोरोचन, रुचक, नदियोंके सङ्गमका जल, सुपर्ण, शतपत्र, चकोर, जीवजीवक, नन्दीमुख, मयूर, जिनमें मोती और मणि बँधे हुए हों ऐसे ध्वज, कार्यसिद्धि करनेवाले उत्तम आयुध—ये सब सदा ही मेरी रक्षा करें ॥ ९५-१०१ १/२ ॥
पुण्यं वै विगतक्लेशं श्रीमद् वै मङ्गलान्वितम् ॥ १०२॥
रामेणोदाहृतं पूर्वमायुःश्रीजयकाङ्क्षिणा ।
पूर्वकालमें आयु, लक्ष्मी तथा विजयकी अभिलाषा रखनेवाले बलरामजीने इस पवित्र क्लेशहारी और उनकी प्राप्ति करानेवाले मङ्गलयुक्त स्तोत्रका वर्णन किया था ॥ १०२ १/२ ॥
य इदं श्रावयेद् विद्वांस्तथैव शृणुयान्नरः ॥ १०३॥
मङ्गलाष्टशतं स्नातो जपन् पर्वणि पर्वणि ।
वधबन्धपरिक्लेशं व्याधिशोकपराभवम् ॥ १०४॥
न च प्राप्नोति वैकल्यं परत्रेह च शर्मदम् ।
जो विद्वान् मनुष्य प्रत्येक पर्वमें स्नान करके जपपरायण हो, इस आठ सौ माङ्गलिक नामोंसे युक्त स्तोत्रका श्रवण करता अथवा कराता है, वह वध और बन्धनके क्लेश, व्याधि एवं शोकसे प्राप्त होनेवाले पराभव और व्याकुलताको नहीं पाता है। यह स्तोत्र इहलोक और परलोकमें भी कल्याण प्रदान करनेवाला है ॥ १०३-१०४ १/२ ॥
धन्यं यशस्यमायुष्यं पवित्रं वेदसम्मितम् ॥ १०५॥
श्रीमत्स्वर्ग्यं सदा पुण्यमपत्यजननं शिवम् ।
शुभं क्षेमकरं नृणां मेधाजननमुत्तमम् ।
सर्वरोगप्रशमनं स्वकीर्तिकुलवर्धनम् ॥ १०६॥
इससे धन, यश और आयुकी प्राप्ति होती है। यह पवित्र तथा वेदके तुल्य आदरणीय है। यह श्रीसम्पन्न, स्वर्गदायक, सदा पुण्यकारक, कल्याणमय तथा संतानकी प्राप्ति करानेवाला है; इस शुभ, उत्तम एवं बुद्धिवर्धक स्तोत्रके सेवनसे मनुष्योंको क्षेमकी प्राप्ति होती है। इतना ही नहीं, यह समस्त रोगोंको शान्त करनेवाला तथा अपनी कीर्ति और कुलको बढ़ानेवाला है ॥ १०५-१०६ ॥
श्रद्दधानो दयोपेतो यः पठेदात्मसंयतः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा लभते च शुभां गतिम् ॥ १०७॥
जो श्रद्धालु, दयालु और आत्मसंयमी मनुष्य इसका पाठ करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो शुभ गतिको भागी होता है ॥ १०७ ॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि बलदेवाह्निकं नाम नवाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें बलदेवाह्निक नामक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०९ ॥
दशाधिकशततमोऽध्यायः
साम्बकी उत्पत्ति और अस्त्रशिक्षा तथा द्वारकामें पधारे हुए राजाओंके बीच नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी परम धन्यताका प्रतिपादन
| वैशम्पायन उवाच | वैशम्पायनजी कहते हैं— |
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| हतो यदैव प्रद्युम्नः शम्बरेणात्मघातिना ।<br>मासेऽस्मिन्नेव साम्बस्तु जाम्बवत्यामजायत ॥ १ ॥ | जनमेजय ! आत्मघाती शम्बरासुरने जब प्रद्युम्नका अपहरण किया था, उसी महीनेमें जाम्बवतीके गर्भसे साम्बका जन्म हुआ ॥ १ ॥ |