भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 700, कुल 1169 में से

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पृष्ठ 700
६७८श्रीमन्महाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

उषोवाच स्मरामि भामिनि वचो देव्याः क्रीडागते भवे ।
यथोक्तं सर्वमखिलं प्राप्तं हर्म्यतले मया ॥ ३३ ॥

उषा बोली—भामिनि ! जब महादेवजी क्रीडामें तत्पर थे, उस समय देवी पार्वतीजीने जो बात कही थी, वह मुझे याद आ रही है। उन्होंने जो कुछ कहा था, वह सब पूर्णरूपसे इस अट्टालिकाके भीतर मैंने अनुभव किया है ॥

भर्ता तु मम यश्चैष लोकनाथस्य भार्यया ।
व्यादिष्टः स कथं ज्ञेयस्तत्र कार्ये विधीयताम् ॥ ३४ ॥

यदि भगवान् विश्वनाथकी भार्या पार्वती देवीने इसी पुरुषको मुझे पतिरूपमें प्रदान किया है तो उसका पता कैसे लगेगा ? इसके लिये कोई उपाय करो ॥ ३४ ॥

इत्येवमुक्ते वचने कुम्भाण्डदुहिता पुनः।
व्याजहार यथान्यायमर्थतत्त्वविशारदा ॥ ३५ ॥

उषाके ऐसा कहनेपर अर्थतत्त्वके ज्ञानमें कुशल कुम्भाण्ड-कुमारी चित्रलेखाने पुनः यह न्यायोचित बात कही—॥

न हि तस्य कुलं देवि न कीर्ति नापि पौरुषम् ।
कश्चिज्जानाति तत्त्वेन किमिदं त्वं विमुह्यसे ॥ ३६ ॥

'देवि ! उस पुरुषका न तो कोई कुल जानता है, न उसकी कीर्ति और पुरुषार्थका ही किसीको ठीक-ठीक पता है; फिर इस विषयको लेकर तुम क्यों मोहित हो रही हो ॥३६॥

अदृष्टाश्रुतश्चैव दृष्टः स्वप्ने च यः शुभे ।
कथं ज्ञेयो भवेद् भीरु सोऽस्माभी रतिस्करः ॥ ३७ ॥

'शुभे ! भीरु ! जिसको तुमने सपनेमें देखा है, उसे दूसरे किसीने न तो कभी देखा है और न उसके विषयमें कुछ सुना ही है, फिर हम तुम्हारे उस रति तस्करका पता कैसे लगा सकती हैं ? ॥ ३७ ॥

येन त्वमसितापाङ्गि मत्तकाशिनि विक्रमात् ।
रुदती प्रसभं भुक्ता प्रविश्यान्तःपुरं सखि ॥ ३८ ॥
न ह्यसौ प्राकृतः कश्चिद् यः प्रविष्टः प्रसह्य ते ।
नगरं लोकविख्यातमेकः शत्रुनिबर्हणः ॥ ३९ ॥

'मतवाली सी प्रतीत होनेवाली और कजरारे नेत्रोंवाली सखि ! जिसने अन्तःपुरमें घुसकर तुम्हारे रोते रहनेपर भी बलपूर्वक तुम्हारा उपभोग किया है, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। जो तुम्हारे इस लोकविख्यात नगरमें बलपूर्वक अकेला ही घुस आया, वह कोई शत्रुमर्दन शूरवीर ही हो सकता है ॥ ३८-३९ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा अश्विनौ च महौजसौ ।
न शक्ताः शोणितपुरं प्रवेष्टुं भीमविक्रमाः ॥ ४० ॥

'बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और दोनों महाबली अश्विनीकुमार—ये भयानक पराक्रमी देवता भी शोणितपुरमें प्रवेश नहीं कर सकते ॥ ४० ॥

सोऽयमेतैः शतगुणैर्विशिष्टश्चारिसूदनः ।
प्रविष्टः शोणितपुरं बाणमाक्रम्य मूर्धनि ॥ ४१ ॥

'उपर्युक्त देवता यदि सौगुने होकर आ जायँ तो उनसे विशिष्ट यह शत्रुसूदन वीर होगा, जिसने बाणासुरके मस्तकपर पैर रखकर शोणितपुरमें प्रवेश किया है ॥ ४१ ॥

यस्या नैवंविधो भर्ता भवेद् युद्धविशारदः ।
कस्तस्या जीवितेनार्थो भोगैर्वास्त्यम्बुजेक्षणे ॥ ४२ ॥

'कमललोचने ! जिस नारीका पति ऐसा युद्धविशारद वीर न हो, उसके जीवन अथवा भोगोंसे क्या लाभ ? ॥४२॥

धन्यास्यनुगृहीतासि यस्यास्ते पतिरीदृशः ।
प्राप्तो देव्याः प्रसादेन कन्दर्पसमविक्रमः ॥ ४३ ॥

'तुम धन्य हो, तुमपर देवीका महान् अनुग्रह है; क्योंकि तुम्हें पार्वती देवीके प्रसादसे ऐसा कामदेव-तुल्य पराक्रमी पति प्राप्त हुआ है ॥ ४३ ॥

इदं तु यत् कार्यतमं शृणु त्वं तन्मयेरितम् ।
विज्ञेयो यस्य पुत्रो वै यन्नामा यत्कुलश्च सः ॥ ४४ ॥

'इस समय जो यह सबसे महान् कार्य है, वह मेरे मुखसे सुनो । पहले तुम्हें इस बातको जान लेना चाहिये कि वह किसका पुत्र है ? उसका क्या नाम है ? और वह किस कुलमें उत्पन्न हुआ है ?' ॥ ४४ ॥

इत्येवमुक्ते वचने तत्रोषा काममोहिता ।
उवाच कुम्भाण्डसुतां कथं ज्ञास्याम्यहं सखि ॥ ४५ ॥

उसके ऐसा कहनेपर वहाँ काममोहित उषा कुम्भाण्ड-कुमारीसे बोली—'सखि ! यह सब मैं कैसे जानूँगी ॥ ४५ ॥

त्वमेव चिन्तय सखि नोत्तरं प्रतिभाति मे ।
स्वकार्ये मुह्यते लोको यथा जीवं लभाम्यहम् ॥ ४६ ॥

'सखि ! तुम्हीं कोई उपाय सोचो, मुझे तो कोई उत्तर नहीं सूझता । अपने कार्यमें प्रायः सब लोग मोहित हो जाते हैं। अतः तुम्हीं कोई ऐसा उपाय करो, जिससे मुझे नूतन जीवन प्राप्त हो' ॥ ४६ ॥

उषाया वचनं श्रुत्वा रामा वाक्यमिदं पुनः ।
उवाच रुदतीं चोपां कुम्भाण्डदुहिता सखी ॥ ४७ ॥

उषाकी यह बात सुनकर उसकी सखी कुम्भाण्डकुमारी रामा (जो चित्रलेखा अप्सराके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण चित्रलेखा भी कही जाती थी) रोती हुई उषासे पुनः इस प्रकार बोली—॥ ४७ ॥

कुशला ते विशालाक्षि सर्वथा संधिविग्रहे ।
अप्सरा चित्रलेखा वै क्षिप्रं विज्ञाप्यतां सखि ॥ ४८ ॥

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