विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें५० श्रीमद्महाभारते खिलभागे [ हरिवंशे
तच्च मांसं स्वयं चैव विश्वामित्रस्य चात्मजान्।
भोजयामास तच्छ्रुत्वा वसिष्ठोऽप्यस्य चुक्रुधे।
क्रुद्धस्तु भगवान् वाक्यमिदमाह नृपात्मजम् ॥ १६ ॥
उस मांसको उसने विश्वामित्रके पुत्रोंको खिलाया और अपने आप भी खाया। यह सुनकर वसिष्ठजी भी क्रोधमें भर गये और क्रोधमें भरे हुए वसिष्ठजीने राजाके पुत्रसे यह बात कही ॥ १६ ॥
वसिष्ठ उवाच
पातयेमहं क्रूर तव शङ्कूमसंशयम्।
यदि ते द्वाविमौ शङ्कन स्यातां वै कृतौ पुनः॥ १७ ॥
वसिष्ठजीने कहा—क्रूर ! यदि तुझमें फिर किये हुए ये दो शङ्कु (पाप) न होते तो मैं तेरे प्रथम शङ्कु (पाप) को अवश्य नष्ट कर देता ॥ १७ ॥
पितुश्चापरितोषेण गुरोर्दाग्धीवधेन च।
अप्रेक्षितोपयोगाच्च त्रिविधस्ते व्यतिक्रमः ॥ १८ ॥
पिताको संतुष्ट न रखने, गुरुकी दूध देनेवाली गौकी हत्या कर डालने और अप्रेक्षित मांस खानेसे तुम्हारे द्वारा तीन प्रकारके पाप बन गये ॥ १८ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं त्रीण्यस्य शङ्कनि तानि दृष्ट्वा महोतपाः।
त्रिशङ्कुरिति होवाच त्रिशङ्कुरिति स स्मृतः॥ १९ ॥
वैशम्पायनजी बोले—इस प्रकार उसके तीन शङ्कुओंको देखकर महातपस्वी वसिष्ठजीने जो उसे त्रिशङ्कु कहा, इसके कारण वह त्रिशङ्कु ही कहलाने लगा ॥ १९ ॥
विश्वामित्रस्तु दारणामागतो भरणे कृते।
स तु तस्मै वरं प्रादान्मुनिः प्रीतस्त्रिशङ्कवे ॥ २० ॥
जब विश्वामित्रजी लौटे, तब अपनी स्त्री आदिका भरण-पोषण करनेके कारण प्रसन्न होकर त्रिशङ्कुको वर देने लगे ॥
छन्द्यमानो वरेणाथ वरं वव्रे नृपात्मजः।
सशरीरो व्रजे स्वर्गमित्येवं याचितो मुनिः ॥ २१ ॥
जब विश्वामित्रजीने राजकुमारसे इच्छानुसार वर माँगनेके लिये कहा तब उसने मुनिसे वर माँगा कि ‘मैं सदेह स्वर्गमें जाऊँ’ ॥ २१ ॥
अनावृष्टिभये तस्मिन् गते द्वादशवार्षिके।
राज्येऽभिषिच्य पित्र्ये तु याजयामास तं मुनिः॥ २२ ॥
(विश्वामित्रके प्रसादमात्रसे) बारह वर्षोंकी अनावृष्टिका भय दूर हो जानेपर विश्वामित्र (मुनि अपने तपसे उसके पापोंको भस्म करके) उसका पिताके राज्यपर अभिषेक कर उसका यज्ञ कराने लगे ॥ २२ ॥
मिषतां देवतानां च वसिष्ठस्य च कौशिकः।
सशरीरं तदा तं तु दिवमारोपयत् प्रभुः ॥ २३ ॥
तदनन्तर तपकी शक्तिसे सम्पन्न कौशिकगोत्री विश्वामित्र वसिष्ठ और देवताओंके देखते-देखते ही त्रिशङ्कुको सशरीर स्वर्गमें भेज दिया ॥ २३ ॥
तस्य सत्यरथा नाम भार्या कैकयवंशजा।
कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम् ॥ २४ ॥
त्रिशङ्कुके कैकयवंशमें उत्पन्न हुई एक सत्यरथा नामकी भार्या थी। उसमें उसने हरिश्चन्द्र नामवाले निष्पाप पुत्रको उत्पन्न किया ॥ २४ ॥
स वै राजा हरिश्चन्द्रस्त्रैशङ्कव इति स्मृतः।
आहर्ता राजसूयस्य स सम्राडिति विश्रुतः॥ २५ ॥
वे राजा हरिश्चन्द्र त्रैशङ्कवनामसे प्रसिद्ध थे, उन्होंने राजसूय यज्ञ किया था, अतएव वे सम्राट् कहलाते थे ॥ २५ ॥
हरिश्चन्द्रस्य पुत्रोऽभूद्रोहितो नाम वीर्यवान्।
येनेदं रोहितपुरं कारितं राज्यसिद्धये ॥ २६ ॥
हरिश्चन्द्रके रोहित नामवाला वीर्यवान् पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसने अपने राज्य-कार्यकी सिद्धिके लिये रोहितपुर बसाया था ॥ २६ ॥
कृत्वा राज्यं स राजर्षिः पालयित्वा त्वथ प्रजाः।
संसारासारतां ज्ञात्वा द्विजेभ्यस्तत्पुरं ददौ ॥ २७ ॥
उस राजर्षिने राज्य तथा प्रजाका पालन करनेके अनन्तर संसारकी असारताको जानकर अपना नगर ब्राह्मणोंको दे दिया था ॥ २७ ॥
हरितो रोहितस्याथ चञ्चुर्हारीत उच्यते।
विजयश्च सुदेवश्च चञ्चुपुत्रौ बभूवतुः ॥ २८ ॥
रोहितका पुत्र हरित और हरितका पुत्र चञ्चु हुआ—यह प्रसिद्ध है। चञ्चुके विजय और सुदेव नामवाले दो पुत्र हुए ॥ २८ ॥
जेता क्षत्रस्य सर्वस्य विजयस्तेन संस्मृतः।
रुरुकस्तनयस्तस्य राजधर्मार्थकोविदः ॥ २९ ॥
उस (विजय) ने सम्पूर्ण क्षत्रियोंको जीत लिया था, इसलिये वह विजय कहलाता था। उसके राजकार्य, धर्मकार्य और आर्थिक विषयोंमें चतुर रुरुक नामवाला पुत्र हुआ ॥ २९ ॥
रुरुकस्य वृकः पुत्रो वृकाद् बाहुस्तु जज्ञिवान्।
शकैर्यवनकाम्बोजैः पारदैः पह्लवैः सह ॥ ३० ॥
हैहयास्तालजङ्घाश्च निरस्यन्ति स्म तं नृपम्।
नात्यर्थं धार्मिकस्तात स हि धर्मयुगेऽभवत् ॥ ३१ ॥
रुरुकका पुत्र वृक हुआ और वृकके बाहु नामवाला पुत्र उत्पन्न हुआ। वह राजा उस (राज) धर्मके युगमें