भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 741

विष्णुपर्व ] चतुर्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ७१९

भीगे हुए विशाल मुखोंसे युक्त थे। उन्हें बलि अधिक प्रिय थी ॥ २४ १/२ ॥
देवं सम्परिवार्याथ महाशत्रुप्रमर्दनम् ॥ २५ ॥
लीलायमानास्तिष्ठन्ति संग्रामाभिमुखोन्मुखाः ।
ये सब-के-सब बड़े-बड़े शत्रुओंका मर्दन करनेवाले महादेवजीको चारों ओरसे घेरकर लीलापूर्वक संग्रामके लिये उत्सुक हो मुँह ऊपर किये खड़े थे ॥ २५ १/२ ॥
ततो दिव्यं रथं दृष्ट्वा रुद्रस्याक्लिष्टकर्मणः ॥ २६ ॥
कृष्णो गरुडमास्थाय ययौ रुद्राय संयुगे ।
तदनन्तर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले रुद्रदेवके दिव्य रथको देखकर गरुड़पर बैठे हुए श्रीकृष्ण भी भगवान् रुद्रके साथ युद्ध करनेके लिये गये ॥ २६ १/२ ॥
वैनतेयस्थमास्यन्तमायान्तंमग्रणीं हरिम् ॥ २७ ॥
विव्याध कुपितो बाणैर्नाराचानां शतेन सः ।
गरुड़की पीठपर बैठकर आते हुए यादवकुलके अग्रणी श्रीहरिको क्रोधमें भरे हुए भगवान् शिवने सौ नाराचोंसे घायल कर दिया ॥ २७ १/२ ॥
स शरैरर्दितस्तेन हरेणाक्लिष्टकर्मणा ॥ २८ ॥
हरिर्जग्राह कुपितो ह्यस्त्रं पार्जन्यमुत्तमम् ।
बिना क्लेशके ही बड़े-बड़े कर्म करनेवाले महादेवजीके द्वारा बाणोंसे पीड़ित किये जानेपर क्रोधमें भरे हुए श्रीहरिने उत्तम पार्जन्यास्त्र हाथमे लिया ॥ २८ १/२ ॥
प्रचचाल ततो भूमिर्विष्णुरुद्रप्रपीडिता ॥ २९ ॥
नागाश्चोर्ध्वमुखास्तत्र विचेलुरभिपीडिताः ।
उस समय भगवान् विष्णु और रुद्रके भारसे अत्यन्त पीड़ित हुई भूमि काँपने लगी । आठों दिग्गज ऊपर मुँह किये पीड़ा पाकर विचलित हो उठे ॥ २९ १/२ ॥
पर्वताः पतितास्तत्र जलधाराभिराप्लुताः ॥ ३० ॥
केचिन्मुमुचिरे तत्र शिखराणि समन्ततः ।
बहुत-से पर्वत जलकी धाराओंसे आप्लावित हो वहाँ धराशायी हो गये । कितने ही सब ओरसे अपने शिखरोंका परित्याग करने लगे ॥ ३० १/२ ॥
दिशश्च प्रदिशश्चैव भूमिरकाशमेव च ॥ ३१ ॥
प्रदीप्तानीव दृश्यन्ते स्थाणुकृष्णसमागमे ।
समन्ततश्च निर्घाताः पतन्ति धरणीतले ॥ ३२ ॥
भगवान् शिव और कृष्णके संघर्षके समय दिशाएँ, विदिशाएँ, पृथ्वी और आकाश—ये सभी प्रज्वलित-से दिखायी देते थे । भूतलपर सब ओरसे वज्रपात होने लगा ॥ ३१-३२ ॥
शिवाश्चैवाशिवान् नादान् नदन्ते भीमदर्शनाः ।
वासवश्चानदन् घोरं रुधिरं चाप्यवर्षत ॥ ३३ ॥
भयानक दिखायी देनेवाली गीदड़ियाँ अमङ्गलसूचक बोली बोलने लगीं । इन्द्र घोर गर्जना करते हुए रक्तकी वर्षा करने लगे ॥ ३३ ॥
उल्का च बाणसैन्यस्य पुच्छेनावृत्य तिष्ठति ।
प्रववौ मारुतश्चापि ज्योतींष्याकुलतां ययुः ॥ ३४ ॥
प्रभाहीनास्तथौषध्यो न चरन्त्यन्तरिक्षगाः ।
उल्का बाणासुरकी सेनाके पुच्छभागको आवृत करके स्थित हुई थी। वायु प्रचण्ड गतिसे बह रही थी और तारे व्याकुलताको प्राप्त हो रहे थे । ओषधियाँ निस्तेज हो गयीं और आकाशचारी प्राणी आकाशमें विचरण नहीं करते थे ॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा सर्वदेवगणैर्वृतः ॥ ३५ ॥
त्रिपुरान्तकमुद्यन्तं ज्ञात्वा रुद्रमुपागमत् ।
इसी बीचमें समस्त देवताओंसे घिरे हुए ब्रह्माजी त्रिपुरनाशक रुद्रको युद्धके लिये उद्यत जानकर वहाँ आये ॥
गन्धर्वाप्सरसश्चैव यक्षा विद्याधरास्तथा ॥ ३६ ॥
सिद्धचारणसंघाश्च पश्यन्तोऽथ दिवि स्थिताः।
गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, विद्याधर, सिद्ध और चारणोंके समुदाय भी वह युद्ध देखनेके लिये आकाशमें खड़े हो गये ॥ ३६ १/२ ॥
ततः पार्जन्यमस्त्रं तत् क्षिप्तं रुद्राय विष्णुना ॥ ३७ ॥
ययौ ज्वलन्नथ तदा यतो रुद्रो रथस्थितः ।
इसी समय भगवान् श्रीकृष्णने रुद्रदेवपर पार्जन्यास्त्रका प्रहार किया । वह अस्त्र प्रज्वलित होकर उसी ओर चला, जहाँ रुद्रदेव रथपर विराजमान थे ॥ ३७ १/२ ॥
ततः शतसहस्राणि शराणां नतपर्वणाम् ॥ ३८ ॥
निपेतुः सर्वतो दिग्भ्यो यतो हररथः स्थितः ।
फिर तो जहाँ भगवान् शङ्करका रथ खड़ा था, वहाँ सभी दिशाओंसे झुकी हुई गाँठवाले लाखों बाण गिरने लगे ॥
अथाग्नेयं महारौद्रमस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥ ३९ ॥
मुमोच रुषितो रुद्रस्तदद्भुतमिवाभवत् ।
तब रोषमें भरे हुए अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ रुद्रदेवने वहाँ महा-रौद्र आग्नेयास्त्रका प्रयोग किया । वह अद्भुत-सा प्रतीत हुआ ॥
ततो विशीर्णदेहास्ते चत्वारोऽपि समन्ततः ॥ ४० ॥
नादृश्यन्त शरैश्छन्ना दह्यमानाश्च वह्निना ।
सिंहनादं ततश्चक्रुः सर्व एवासुरोत्तमाः ॥ ४१ ॥
उससे उन चारोंके शरीर सब ओरसे क्षत विक्षत हो गये । वे बाणोंसे आच्छादित हो आगसेजलते हुए अदृश्य हो गये । यह देख सभी असुरप्रवर वीर वहाँ सिंहनाद करने लगे ॥
हतोऽयमिति विज्ञाय आग्नेयास्त्रेण वै तदा ।
ततस्तद् विसहित्वाऽऽजौ ह्यस्त्रमस्त्रविदां वरः ॥४२॥
जग्राह वारुणं सोऽस्त्रं वासुदेवः प्रतापवान् ।
उन्होंने यह समझ लिया था कि श्रीकृष्ण आग्नेयास्त्रसे मारे गये । तदनन्तर युद्धस्थानमें उस अस्त्रकी चोट सहकर अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ प्रतापी वासुदेवने वारुणास्त्र उठाया ॥
प्रयुक्ते वासुदेवेन वारुणास्त्रेऽतितेजसि ॥ ४३ ॥
आग्नेयं प्रशमं यातमस्त्रं वारुणतेजसा ।
वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णद्वारा अत्यन्त तेजस्वी वारुणास्त्रका प्रयोग होनेपर उसके तेजसे भगवान् शङ्करका आग्नेयास्त्र शान्त हो गया ॥ ४३ १/२ ॥
तस्मिन् प्रतिहते त्वस्त्रे वासुदेवेन संयुगे ॥ ४४ ॥
पैशाचं राक्षसं रौद्रं तथैवाङ्गिरसं भवः ।
मुमोचास्त्राणि चत्वारि युगान्ताग्निनिभानि वै ॥ ४५ ॥