विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 752, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ें| ७३० | श्रीमन्महाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे |
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केशवस्य तु बाणेन वर्तमाने महाहवे ॥ ६८ ॥
तस्य शार्ङ्गविनिर्मुक्तैः शरैरशनिसंनिभैः ।
तिलशस्तद्रथं चक्रे सोऽश्वध्वजपताकिनम् ॥ ६९ ॥
श्रीकृष्णका जब बाणासुरके साथ महान् युद्ध होने लगा, उस समय उन्होंने अपने शार्ङ्गधनुषसे छूटे हुए वज्र-तुल्य बाणोंद्वारा उसके अश्व, ध्वज और पताकासहित रथको तिल-तिल करके काट डाला ॥ ६८-६९ ॥
चिच्छेद कवचं कायान्मुकुटं च महाप्रभम् ।
कार्मुकं च महातेजा हस्तावापं च केशवः ॥ ७० ॥
विव्याध चैनमुरसि नाराचेन स्मयन्निव ।
तदनन्तर महातेजस्वी केशवने उसके शरीरसे कवचको, मस्तकसे महातेजस्वी मुकुटको तथा हाथसे धनुष और दस्तानेको काट गिराया; साथ ही हँसते हुए-से उन्होंने एक नाराचद्वारा उसकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ७०१/२ ॥
स मर्माभिहतः संख्ये प्रमुमोहाल्पचेतनः ॥ ७१ ॥
तं दृष्ट्वा मूर्च्छितं बाणं प्रहारपरिपीडितम् ।
प्रासादवरशृंगस्थो नारदो मुनिपुङ्गवः ॥ ७२ ॥
उत्थायापश्यत तदा कक्ष्यास्फोटनतत्परः ।
वादयानोनखांश्चैव दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रवीत् ॥ ७३॥
युद्धस्थलमें वह मर्मभेदी आघात लगनेपर उसकी चेतना क्षीण हो चली और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। बाणासुरको श्रीकृष्णके प्रहारसे अत्यन्त पीड़ित एवं मूर्च्छित हुआ देख उसके महलके ऊँचे शिखरपर खड़े हुए मुनिवर नारद बार-बार उठकर उसकी ओर देखने लगे। उस समय वे अपनी भुजाओंपर ताल ठोंकते और नख बजाते हुए इस प्रकार कहने लगे—'अहोभाग्य ! अहोभाग्य !' ॥७१-७३॥
अहो मे सफलं जन्म जीवितं च सुजीवितम् ।
दृष्टं मे यदिदं चित्रं दामोदरपराक्रमम् ॥ ७४ ॥
'अहो ! आज मेरा जन्म सफल है ! यह जीवन उत्तम जीवन है; क्योंकि मैंने श्रीकृष्णका यह अद्भुत पराक्रम अपनी आँखों देख लिया ॥ ७४ ॥
जय बाणं महाबाहो दैतेयं देवकिल्बिषम् ।
यदर्थमवतीर्णोऽसि तत् कर्म सफलीकुरु ॥ ७५ ॥
'महाबाहो ! आप इस देवद्रोही दैत्य बाणासुरको पराजित कीजिये और जिसके लिये आपका अवतार हुआ है, उस कर्मको सफल बनाइये' ॥ ७५ ॥
एवं स्तुत्वा तदा देवं बाणैः खं द्योतयञ्छितैः ।
इतस्ततः सम्पतद्भिर्नारदो व्यचरद् रणे ॥ ७६ ॥
इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति करके उस समय आकाशको प्रकाशित करते हुए नारदजी इधर-उधर पड़ते हुए तीखे बाणोंके साथ रणक्षेत्रमें विचरने लगे ॥ ७६ ॥
केशवस्य तु बाणेन वर्तमाने महाभये ।
प्रयुध्येतां ध्वजौ तत्र तावन्योन्यमभिद्रुतौ ।
युद्धं त्वभूद् वाहनयोरुभयोर्देवदैत्ययोः ॥ ७७ ॥
जब श्रीकृष्णका बाणासुरके साथ वह महाभयंकर संग्राम चल रहा था, उस समय वहाँ उन दोनोंके ध्वजचिह्न-वाहन एक दूसरेपर टूट पड़े और युद्ध करने लगे। भगवान् तथा दैत्य दोनोंके उन वाहनोंमें गहरी भिड़न्त हुई ॥ ७७ ॥
गरुडस्य च संग्रामो मयूरस्य च धीमतः ।
पक्षतुण्डप्रहारैस्तु चरणाग्रनखैस्तथा ॥ ७८ ॥
बुद्धिमान् गरुड़ और मयूरमें पंख, चोंच, पंजे, मुख और नखोंके प्रहारद्वारा युद्ध होने लगा ॥ ७८ ॥
अन्योन्यं जघ्नतुः क्रुद्धौ मयूरगरुडावुभौ ।
वैनतेयस्ततः क्रुद्धो मयूरं दीप्ततेजसम् ॥ ७९ ॥
जग्राह शिरसि क्षिप्रं तुण्डेनाभिपतंस्तदा ।
उत्क्षिप्य चैव पक्षाभ्यां निजघान महाबलः ॥ ८० ॥
मयूर और गरुड़ दोनों एक दूसरेपर क्रोधपूर्वक आघात करने लगे। तदनन्तर कुपित हुए महाबली गरुड़ने उड़कर अपनी चोंचसे उद्दीप्त तेजवाले मोरका मस्तक शीघ्रतापूर्वक पकड़ लिया और उसे उछाल-उछालकर दोनों पाँखोंसे मारना आरम्भ किया ॥ ७९-८० ॥
पद्भ्यां पार्श्वाभिघाताभ्यां कृत्वा घातान्यनेकशः।
आकृष्य चैनं तरसा विक्षिप्य च महाबलः ॥ ८१
निःसंज्ञं पातयामास गगनादिव भास्करम् ।
दोनों पैरोंसे अगल-बगलमें आघात करके महाबली गरुड़ने उसपर वारंवार प्रहार किये। वे उसे कभी वेगपूर्वक अपनी ओर खींचते और कभी पीछे ढकेलते थे, इस तरह उसे मूर्च्छित करके उन्होंने नीचे गिरा दिया, मानो आकाशसे सूर्यको धराशायी कर दिया गया हो ॥ ८११/२ ॥
मयूरे पतिते तस्मिन् पपातातिबलो भुवि ॥ ८२ ॥
बाणः समरसंविग्नश्चिन्तयन् कार्यमात्मनः ।
मोरके गिर जानेपर अत्यन्त बलशाली बाणासुर भी उस युद्धसे घबराकर अपने कर्तव्यका विचार करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ८२१/२ ॥
मयातिबलमत्तेन न कृतं सुहृदां वचः ॥ ८३ ॥
पश्यतां देवदैत्यानां प्राप्तोऽस्म्यापदमुत्तमाम् ।
(वह सोचने लगा—) 'अहो ! मैंने अत्यन्त बलके घमंडमें आकर अपने हितैषी सुहृदोंकी बात नहीं मानी, इसलिये आज देवताओं और दैत्योंके देखते-देखते मैं इस भारी विपत्तिमे फँस गया हूँ' ॥ ८३१/२ ॥