भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

पृष्ठ 831, कुल 1169 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 831
८०८श्रीमहाभारते खिलभागे[ हरिवंशे

तीनों वेदोंके पाँच स्वरोंसे उस पर्वतशिखरकी बड़ी शोभा हो रही थी। वहाँ बैठे हुए वे ब्राह्मण मन्त्रजपरूपी यज्ञमें सदा तत्पर रहनेवाले थे। व्रतके पालन और परहितके साधनमें उनकी सदा ही प्रवृत्ति थी ॥ २-३ ॥

एकमेवाग्निमाधाय सर्वे ब्राह्मणपुङ्गवाः ।
बिभिदुर्मन्त्रविषयैः सुसमाहितमानसाः ॥ ४ ॥
वे समस्त ब्राह्मणशिरोमणि वहाँ एक ही अग्निकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी उपासना करते थे। उन्होंने मन्त्रप्रतिपाद्य विषयोंकी दृष्टिसे उस अग्निके अनेक भेद किये ॥ ४ ॥

त्रिधा प्रणीतो ज्वलनो मुनिभिर्वेदपारगैः ।
अतस्ते तत्त्वमापन्ना यदेकस्त्रिविधः कृतः ॥ ५ ॥
वेदोंके पारङ्गत विद्वान् मुनियोंने उस अग्निको तीन भागोंमें विभक्त करके स्थापित किया (उन तीनों अग्नियोंके नाम ये हैं—आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि)। उनके द्वारा एक ही अग्निकी तीन स्वरूपोंमें अभिव्यक्ति हुई, इसलिये उन्हें तत्त्वका बोध प्राप्त हुआ ॥ ५ ॥

एक एव महानग्निर्हविषा सम्प्रवर्तते ।
स्वधाकारेण धर्मज्ञ मन्त्राणां कार्यसिद्धये ॥ ६ ॥
धर्मज्ञ जनमेजय ! एक ही अग्नि मन्त्रोक्त कार्योंकी सिद्धिके लिये स्वधारूप हविष्यके सेवनसे महान् होकर सम्यक्-रूपसे प्रज्वलित होता है ॥ ६ ॥

स्वयं च दक्षः सम्प्राप्तो भगवान् भूतसत्कृतः ।
ब्रह्मा ब्राह्मणनिर्माता सर्वभूतपितामहः ॥ ७ ॥
वहाँ समस्त प्राणियोंद्वारा सम्मानित स्वयं भगवान् दक्ष पधारे, जो ब्रह्मा अर्थात् ब्राह्मण हैं। उन्होंने ब्राह्मणोंकी सृष्टि की है तथा वे सम्पूर्ण भूतोंके पितामह हैं ॥ ७ ॥

दण्डी चर्मी शरी खड्गी शिखी पद्मनिभाननः ।
अभवन्न्यस्तसंतापो जितक्रोधो जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥
उनके हाथोंमें दण्ड, बाण, ढाल और तलवार—ये आयुध शोभा पाते थे। उन्होंने शिखा धारण कर रखी थी। उनका मुख कमलके समान कान्तिमान् था। वे संतापरहित, क्रोधको जीतनेवाले तथा जितेन्द्रिय थे ॥ ८ ॥

यजते पुष्करे ब्रह्मा मेधया सह संगतः ।
इन्द्रप्रोक्तानि सामानि गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः ॥ ९ ॥
वहाँ पुष्करतीर्थमें ब्रह्माजी मेधाके साथ बैठकर यज्ञ करने लगे और बहुत-से ब्रह्मवादी मुनि इन्द्रकथित साममन्त्रोंका गान करने लगे ॥ ९ ॥


१. वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी विधिमें स्वरप्रदर्शनके पाँच प्रकार ही यहाँ पाँच स्वर कहे गये हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, एकश्रुति और प्रचय ।


घृतं क्षीरं यवा व्रीहिः सर्वं परमकं हविः ।
वेदप्रोक्तं मखे न्यस्तं कल्पितं ब्रह्मणः पदे ॥ १० ॥
उस यज्ञमें घृत, खीर, जौ, चावल आदि सब उत्तमोत्तम हविष्य, जिसका वेदमें वर्णन किया गया है, ब्रह्माजीके निकट सजाकर रखा गया था ॥ १० ॥

निर्मथ्यारणिमाग्नेयीं शमीगर्भसमुत्थिताम् ।
स ब्रह्मा प्रथमं तस्मिन्नग्निमग्र्यं प्रवर्तयत् ॥ ११ ॥
शमीके गर्भसे उत्पन्न हुई अग्निसम्बन्धिनी अरणीका मन्थन करके ब्रह्माजीने उस यज्ञमें एक दूसरे ही प्रधान अग्निको प्रकट किया ॥ ११ ॥

न ह्यल्पं विहितं द्रव्यं यथानिर्यक्षकर्मणि ।
प्रवर्तयेद् विभागैर्वा हुतद्रव्यमयं बलम् ॥ १२ ॥
जैसे यक्षकर्ममें मन्थनसे प्रकट हुए अग्निदेवको स्थापित करके उन्हें ही हवनीय पदार्थकी आहुति देनेका विधान है, उसी प्रकार वहाँ अल्प द्रव्य देनेकी विधि नहीं है । यज्ञ करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह हुत द्रव्यमय बलको विभागपूर्वक प्रकट करे ॥ १२ ॥

फलानि तैः प्रयुक्तानि हवींषि विततेऽध्वरे ।
प्रयुञ्जते प्रयोगज्ञा मुनयो ब्रह्मवादिनः ॥ १३ ॥
उस विशाल यज्ञमें जिन-जिन विहित हविष्योंका उपयोग किया गया उनके द्वारा उनके यथायोग्य फल भी प्रकट हुए। प्रयोगके ज्ञाता ब्रह्मवादी मुनि ही उन हविष्योंका प्रयोग करते थे ॥ १३ ॥

षण्मासांश्चतुरो वेदान् सम्बभाषे बृहस्पतिः ।
ब्रह्मणो वितते यज्ञे परया ब्रह्मसम्पदा ॥ १४ ॥
उत्तम ब्रह्म-सम्पत्तिसे युक्त ब्रह्माजीके उस विस्तृत यज्ञमें देवगुरु बृहस्पतिने छः मासतक चारों वेदोंका प्रवचन किया ॥

शिक्षाक्षरसमेताया मधुरायाः समन्ततः ।
सानुखरितरामायाः सरस्वत्याः प्रभाषते ॥ १५ ॥
वे उपनिषद् और कर्मकाण्डके द्वारा अत्यन्त रमणीय तथा शिक्षाके अक्षरोंसे युक्त मधुर वेदवाणीका सब ओर प्रवचन करते थे ॥ १५ ॥

तेन ब्राह्मणशब्देन ब्रह्मप्रोक्तेन भारत ।
विभाति स मखो व्यक्तं ब्रह्मलोक इवापरः ॥ १६ ॥
भारत ! ब्राह्मण-मन्त्रोंके पाठ और वेदोंके उस प्रवचनसे वह विशाल यज्ञमण्डप निश्चय ही दूसरे ब्रह्मलोकके समान शोभा पाता था ॥ १६ ॥

मखो ब्रह्ममुखोत्तीर्णो ब्रह्मशब्दैरनामयैः ।
प्रयोगैः सम्प्रयुक्तः स जहपन्निव विवर्धते ॥ १७ ॥
ब्रह्माजीके मुखसे प्रकट (अथवा ब्रह्माजीकी प्रधानतामें सम्पादित) हुआ वह यज्ञ अनामय (अप्रामाणिकताकी