भारतकोश
विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)

Harivamsha Purana Hindi

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,169 पृष्ठ

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पृष्ठ 89

६६ | श्रीमहाभारते खिलभागे | [ हरिवंशे

(सनत्कुमारजी कहते हैं—) ब्रह्मन् ! इनकी मानसी कन्या विरजा नामसे प्रसिद्ध है। वह ययातिकी माता और नहुषकी पत्नी है ॥ ६६ ॥

त्रय एते गणाः प्रोक्ताश्चतुर्थं तु निबोध मे।
उत्पन्ना ये स्वधायां ते सोमपा वै कवेः सुताः।
हिरण्यगर्भस्य सुताः शूद्रास्तान् भावयन्त्युत ॥ ६७ ॥

यह मैंने मनुष्यपूज्य पितरोंके तीन गणोंका वर्णन कर दिया। अब चौथे गणका वर्णन सुनो। ये पितृगण कविकी पुत्री स्वधाके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र हैं और सोमपा कहलाते हैं। ये अग्निके आत्मज हैं। शूद्र इनकी उपासना करते हैं ॥ ६७ ॥

मानसा नाम ते लोका यत्र तिष्ठन्ति ते दिवि।
तेषां वै मानसी कन्या नर्मदा सरितां वरा ॥ ६८ ॥

ये स्वर्गमें जिन लोकोंमें निवास करते हैं, वे मानस-लोक कहलाते हैं। इनकी मानसी कन्या नर्मदा कहलाती है, जो नदियोंमें श्रेष्ठ है ॥ ६८ ॥

या भावयति भूतानि दक्षिणापथगामिनी।
पुरुकुत्सस्य या पत्नी त्रसदस्योर्जनन्यपि ॥ ६९ ॥

वह दक्षिणापथकी ओर बहकर प्राणियोंको पवित्र करती है। वह पुरुकुत्सकी पत्नी और त्रसदस्युकी माता है ॥ ६९ ॥

तेषामथाभ्युपगमान्मनुस्तात युगे युगे।
प्रवर्तयति श्राद्धानि नष्टे धर्मे प्रजापतिः ॥ ७० ॥

तात ! प्रजापति मनु प्रत्येक युगके आरम्भमें इन पितरोंको पूज्य समझकर लुप्त हुए श्राद्ध-धर्मका उद्धार करनेके लिये श्राद्धोंको फिर प्रचलित किया करते हैं ॥ ७० ॥

पितॄणामादिसर्गेण सर्वेषां द्विजसत्तम।
तस्मादेनं स्वधर्मेण श्राद्धदेवं वदन्ति वै ॥ ७१ ॥

‘द्विजसत्तम ! (यम) इन सब सात प्रकारके पितरोंके आदिमें उत्पन्न होते हैं और ये अपने धर्मके प्रवर्तक हैं। इस कारण इनको श्राद्धदेव कहते हैं ॥ ७१ ॥

सर्वेषां राजतं पात्रमथ वा रजतान्वितम्।
दृष्टं स्वधां पुरोधाय श्राद्धं प्रीणाति वै पितॄन् ॥ ७२ ॥

इन सब पितरोंको चाँदीका या चाँदी मिला हुआ पात्र तथा ‘स्वधा पितृभ्यः’ कहकर दिया हुआ श्राद्ध तृप्ति एवं प्रसन्नता प्रदान करता है ॥ ७२ ॥

सोमस्याप्यायनं कृत्वा अग्नेर्वैवस्वतस्य च।
उद्गायनमप्यग्नावग्न्यभावेऽप्सु वा पुनः ॥ ७३ ॥
पितॄन् प्रीणाति यो भक्त्या पितरः प्रीणयन्ति तम्।
यच्छन्ति पितरः पुष्टिं प्रजाश्च विपुलास्तथा ॥ ७४ ॥
स्वर्गमारोग्यमेवाथ यदन्यदपि चेप्सितम्।
दैवकार्यादपि मुने पितृकार्यं विशिष्यते ॥ ७५ ॥

जो मनुष्य सोम, अग्नि और वैवस्वत यमका आप्यायन करके फिर अग्निमें उदगायन करता है अथवा अग्निके अभावमें जलमें उदगायन करके पितरोंको भक्तिपूर्वक तृप्त करता है, उसे पितर तृप्त करते हैं। तथा बहुत-सी संतान, पुष्टि, स्वर्ग एवं आरोग्य और समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करते हैं। मुने ! पितृकार्य देवकार्यसे भी श्रेष्ठ है ॥ ७३-७५ ॥

देवतानां हि पितरः पूर्वमाप्यायनं स्मृतम्।
शीघ्रप्रसादा ह्यक्रोधा लोकस्याप्यायनं परम् ॥ ७६ ॥

पितर आप्यायन (तृप्त) करनेपर देवताओंसे भी पहले प्रसन्न हो जाते हैं। ये पितर शीघ्र प्रसन्न होनेवाले तथा क्रोधरहित हैं और लोकोंको प्रसन्न रखनेवाले हैं ॥ ७६ ॥

स्थिरप्रसादाश्च सदा तान् नमस्यस्व भार्गव।
पितृभक्तोऽसि विप्रर्षे मद्‍भक्तश्च विशेषतः ॥ ७७ ॥

(सनत्कुमारजी मार्कण्डेय ऋषिसे कहते हैं) भार्गव ! पितरोंका प्रसाद सदा स्थिर रहनेवाला होता है, इसलिये तुम उन्हें प्रणाम किया करो। विप्रर्षे ! तुम पितरोंके भक्त हो और मेरे तो बहुत बड़े भक्त हो ॥ ७७ ॥

श्रेयस्तेऽद्य विधास्यामि प्रत्यक्षं कुरु तत् स्वयम्।
दिव्यं चक्षुः सविज्ञानं प्रदिशामि च तेऽनघ ॥ ७८ ॥

निष्पाप महर्षे ! इसलिये मैं आज तुम्हारा कल्याण करूँगा, उसे तुम स्वयं प्रत्यक्ष देख लो। मैं तुम्हें विज्ञानसहित दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ ॥ ७८ ॥

गतिमैतामप्रमत्तो मार्कण्डेय निशामय।
न हि योगगतिर्दिव्या पितॄणां च परा गतिः ॥ ७९ ॥
त्वद्विधेनापि सिद्धेन दृश्यते मांसचक्षुषा।
स एवमुक्त्वा देवेशो मामुपस्थितमग्रतः ॥ ८० ॥
चक्षुर्दत्त्वा सविज्ञानं देवानामपि दुर्लभम्।
जगाम गतिमग्रां वै द्वितीयोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ८१ ॥

मार्कण्डेय ! अब तुम (श्राद्धके फलरूपमें मिलनेवाली) इस गतिको सावधान होकर देखो। तुम-जैसा सिद्ध पुरुष भी इस मांसमय चक्षुसे योगियोंकी दिव्य गतिको और पितरोंकी परा गतिको नहीं देख सकता। यों कहकर वे देवेश सामने खड़े हुए मुझको देवताओंके लिये भी दुर्लभ विज्ञानसहित दिव्य नेत्र देकर द्वितीय अग्निके समान प्रकाशित होते हुए अपने इष्ट-स्थानको चले गये ॥ ७९-८१ ॥

तन्निबोध कुरुश्रेष्ठ यन्मयासीन्निशामितम्।
प्रसादात् तस्य देवस्य दुर्ज्ञेयं भुवि मानुषैः ॥ ८२ ॥

कुरुश्रेष्ठ भीष्म ! उन देवताकी कृपासे मैंने जो घटना देखी थी, उसे तुम सुनो। पृथिवीमें उस घटनाका जानना मनुष्योंके लिये महाकठिन है ॥ ८२ ॥

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि पितृकल्पे अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें पितृकल्पविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥