विस्तृत हरिवंश पुराण (हरिवंशपर्व, विष्णुपर्व व भविष्यपर्व सहित)
Harivamsha Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Harivamsha Purana Complete (Mahabharata Supplement) (उद्गम)
पृष्ठ 923, कुल 1169 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यपर्व ] त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः [ ८९९
त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
देवताओं और असुरोंका द्वन्द्वयुद्ध, भीषण उत्पात, ब्रह्माजी तथा सनकादि योगेश्वरोंका युद्ध देखनेके लिये आगमन
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रवृत्तोऽसुरदेवविग्रह-
स्तदद्भुतो भाति सुरासुराकुलः ।
वेलामतिक्रम्य युगान्तकाले
महार्णवान्योन्यमिवाश्रयन्तः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय ! तदनन्तर देवताओं और असुरोंका युद्ध आरम्भ हुआ । देवताओं और दैत्योंसे व्याप्त होनेके कारण उसकी अद्भुत शोभा हो रही थी । जैसे प्रलयकालमें चारों दिशाओंके महासागर अपनी सीमाको लाँघकर एक दूसरेसे मिल जाते हैं (उसी प्रकार देवता और दैत्य उस युद्धमें एक दूसरेसे मिश्रित हो गये) ॥ १ ॥
नानायुधोद्द्योतविदीपिताङ्गा
महाबला व्यायतकार्मुकास्ते ।
रणोत्सुका वारणहस्तहस्ताः
सुदुर्जयस्तोयदनादनादाः ॥ २ ॥
वे महाबली योद्धा बड़े-बड़े धनुष ताने हुए युद्धके लिये उत्सुक हो रहे थे । उनके अङ्ग नाना प्रकारके आयुधोंकी प्रभासे प्रकाशित होते थे । उनकी भुजाएँ हाथियोंकी सूँड़के समान मोटी थीं । उनपर विजय पाना बहुत ही कठिन था और उनका सिंहनाद मेघोंकी गम्भीर गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ २ ॥
विस्फारयन्तः सहसा धनूंषि
चक्राणि चादित्यसमप्रभाणि ।
समुत्क्षिपन्तो ह्यशनींश्च घोरान्
खड्गांश्च ते वज्रमुखांश्च शक्तीः ॥ ३ ॥
वे सहसा धनुषकी टंकार करने लगते थे तथा सूर्यके समान तेजस्वी चक्र, भयंकर अशनि, खड्ग तथा वज्रमुखी शक्तियोंका लगातार प्रहार करते थे ॥ ३ ॥
महागदाः काञ्चनपट्टनद्धा-
स्तथायसान् कार्मुकमुद्गरांश्च ।
शूलांश्च वृक्षांश्च विगृह्य दीप्तान्
नदन्ति शूराः शतशो रणस्थाः ॥ ४ ॥
रणभूमिमें खड़े हुए सैकड़ों शूरवीर सुवर्णपत्रसे मढ़ी हुई विशाल गदाओं, लोहेके बने हुए धनुषों, मुद्गरों, चमकीले त्रिशूलों और वृक्षोंको हाथमें लेकर वहाँ गर्जना करते थे ॥ ४ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तेषामन्योन्यमभिनिघ्नताम् ।
द्वन्द्वयुद्धान्यवर्तन्त देवानां दानवैः सह ॥ ५ ॥
इसी बीचमें एक दूसरेपर चोट करते हुए उन सैनिकोंमेंसे देवताओंका दानवोंके साथ द्वन्द्वयुद्ध होने लगा ॥ ५ ॥
मरुतां पञ्चमो यस्तु स बाणेनाभ्ययुध्यत ।
महाबलः सुरवरः सावित्र इति यं विदुः ॥ ६ ॥
मरुद्गणोंमें जो पाँचवें थे और जिनको लोग महाबली सुरश्रेष्ठ सावित्रके नामसे जानते हैं, वे बाणासुरके साथ युद्ध करने लगे ॥ ६ ॥
दनायुषायाः पुत्रस्तु बलो नाम महासुरः ।
सोऽयुध्यत रणेऽत्युग्रो ध्रुवेण वसुना सह ॥ ७ ॥
दनायुषाका पुत्र अत्यन्त भयंकर महान् असुर बल उस रणभूमिमें ध्रुव नामक वसुके साथ युद्ध करने लगा ॥ ७ ॥
नमुचिश्वासुरश्रेष्ठो धरेण सह युध्यत ।
प्रवरौ विश्वकर्माणौ ख्यातौ देवासुरेश्वरौ ॥ ८ ॥
असुरोंमें श्रेष्ठ नमुचि धर नामक वसुके साथ जूझने लगा । जो दोनों श्रेष्ठ विश्वकर्माके रूपमें विख्यात हैं, वे देवेश्वर त्वष्टा और असुरेश्वर मय परस्पर युद्ध करने लगे ॥ ८ ॥
पुलोमा तु महादैत्यो वायुना सह युध्यत ।
ससैन्यः पर्वताकारो रणेऽयुध्यत दंशितः ॥ ९ ॥
महादैत्य पुलोमाने वायु देवताके साथ युद्ध छेड़ दिया । वह पर्वताकार दैत्य कवच धारण करके अपनी सेनाको साथ लिये रणभूमिमें जूझ रहा था ॥ ९ ॥
हयग्रीवस्तु दितिजः सह पूष्णा त्वयुध्यत ।
शूरेणामितवीर्येण भास्कराकारवर्चसा ॥ १० ॥
हयग्रीव नामक दैत्य सूर्यतुल्य तेजस्वी अमित पराक्रमी शूरवीर पूषाके साथ लड़ने लगा ॥ १० ॥
शम्बरस्तु महादैत्यो महामायो महासुरः ।
भगेनायुध्यत तदा सहितो युद्धदुर्मदः ॥ ११ ॥
महामायावी महान् असुर रणदुर्मद महादैत्य शम्बर भग देवताके साथ युद्ध करने लगा ॥ ११ ॥
शरभः शलभश्चैव दैत्यानां चन्द्रभास्करौ ।
प्रयुद्धौ सह सोमेन शैशिरास्त्रेण धीमता ॥ १२ ॥
शरभ और शलभ ये दोनों वीर दैत्योंमें सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी थे । वे शैशिरास्त्रधारी बुद्धिमान् सोमके साथ जूझने लगे ॥ १२ ॥
विरोचनस्तु बलवान् बलेर्बलवतः पिता ।
विष्वक्सेनेन साध्येन देवेन च स युध्यत ॥ १३ ॥
बलवान् बलिके पिता महाबली विरोचन विष्वक्सेन नामक साध्य देवताके साथ भिड़ गया ॥ १३ ॥