हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८ हर्षचरितम्
बाण के उपनयन आदि संस्कार ब्राह्मण जाति की प्रथा के उचित और श्रुति.स्मृति के विधानों के अनुसार हुए और उसका समावर्त्तन-संस्कार भी हो चुका। बाण की आयु चौदह वर्ष की भी पूरी नहीं होने पाई थी कि उसके पिता भी बिना वृद्धावस्था को प्राप्त हुए गत हो गए। पिता के मरने से उसे महान् शोक के कारण कष्ट हुआ और दिन-रात हृदय में खोलते हुए उसने अपने घर पर कुछ दिन बिताए। धीरे धीरे जब उसका शोक कम हुआ तब उसे वह स्वतंत्रता मिल गई जिससे अविनय या अनुशासनहीनता बढ़ती गई। लड़कपन में स्वभाव से ही बहुत से कुतूहल उत्पन्न हो जाते हैं। यौवन का आरम्भ धैर्य को नहीं रहने देता। फलतः बाण शैशव-काल के उचित अनेक चपलताओं में पड़ कर आवारा (इत्वर) हो गया। अब तो उसके बहुत से सुहृद् और सहायक मिल गए जो उसकी अवस्था के थे और उसी के समान आवारा थे। उसका मित्र-मण्डल चवालीस व्यक्तियों का बना जिनके नाम इस प्रकार हैं— चन्द्रसेन और मातृषेण, जो शूद्रा माता से उत्पन्न द्विजपुत्र थे, इनसे बाण का भाईचारे का सम्बन्ध था; भाषा कवि ईशान, जो बाण का परम मित्र था; रुद्र और नारायण, जो बाण के स्नेही थे; वर्ण कवि वेणी भारत; प्राकृत भाषा में रचना करने वाला कुलपुत्र वायुविकार; अनङ्ग बाण और सूची बाण, जो बन्दीजन थे; कात्यायनिका (बौद्धभिक्षुणी) चक्रवाकिका; जाङ्गुलिक (विषवैद्य या गारुड़ी) मयूरक; पान की खिल्ली लगा कर देने वाला चंडक, भिषकपुत्र मन्दारक, पुस्तकवाचक सुदृष्टि, स्वर्णकार चामीकर, सुनारों का अध्यक्ष या हीरा काटने वाला सिन्धुषेण, लेखक गोविन्दक, चित्रकार वीरवर्मा, मिट्टी के खिलौने बनाने वाला (पुस्तकृत्) कुमारदत्त, मृदंग बजाने वाला जीमूत, गायक सोमिल और ग्रहादित्य, सैरन्ध्री (प्रसाधिका) कुरंगिका, वांशिक (वंशी बजाने वाले) मधुकर और पारावत, गान्धर्वोपाध्याय दर्दुरक, संवाहिका केरलिका, नृत्य करने वाला ताण्डविक, आक्षिक (पासा खेलने वाला) शिखंडक, नर्तकी हरिणिका, पाराशरी (संन्यासी) सुमति, क्षपणक (जैन साधु) वीरदेव, कथक (कथावाचक) जयसेन, शैव वक्रघोण, मन्त्रसाधक कराल, पाताल में घुस कर यक्ष या राक्षस को सिद्ध करने वाला लोहिताक्ष, रसायन बनाने की विद्या जानने वाला विहंगम, दर्दुर नामक घटवाद्य बजाने वाला दामोदर, ऐन्द्रजालिक चकोराक्ष, मस्करी (परिव्राजक) ताम्रचूड़। ये मित्र तथा कुछ और भी लोग बाण के साथ चलते थे। उसने अपनी बालसुलभ प्रकृति के कारण अपने आपको इन मित्रों के ऊपर छोड़ रखा था। उसके मन में देशान्तरों को देखने की बड़ी उत्कण्ठा थी। यद्यपि पिता-पितामह द्वारा उपार्जित ब्राह्मणजन के उचित धन-सम्पत्ति उसके घर थी और विद्या का अविच्छिन्न प्रसंग भी प्राप्त था तथापि वह घर से निकल पड़ा। जैसे किसी पर ग्रहों की बाधा सवार हो वैसे ही स्वच्छन्द मन और नवयौवन के कारण वह बिल्कुल स्वतंत्र हो गया। गांव के बड़े-बड़े लोगों ने भी इसकी खिल्ली उड़ाई।