हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ
पृष्ठ 115, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 115
बहुमूल्य और गम्भीर आलाप करते थे। बाण स्वयं स्वभाव से गम्भीर था। उसने राजकुलों से भी और विद्वानों के बीच रह कर सरस्वती को प्राप्त किया। अन्त में फिर वह अपने कुल और खान्दान के योग्य विद्वान् बन गया। बहुत समय के बाद फिर वह अपनी जन्मभूमि और वात्स्यायन वंशी ब्राह्मणों के गांव प्रीतिकूट में पहुँचा। बहुत दिनों के बाद आए हुए बाण को देख कर उसके बालमित्रों के स्नेह और सद्भाव हृदय में उमड़ आए और अपना-अपना सबने परिचय दिया। इस प्रकार अपने बचपन के साथियों के बीच में उत्सव के दिन की तरह अपने आगमन से आनन्दित करता हुआ बाण मानों मोक्ष सुख का अनुभव करने लगा।
प्रथम उच्छ्वास समाप्त।