हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 150, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय उच्छ्वासः १०५ अनवरतमवतंसशङ्खैरामन्द्रकर्णतालदुन्दुभिध्वनिभिः पञ्चमीप्रवेशमङ्गला- रम्भमिव सूचयन्तम्, अविरतचलनचित्रत्रिपदीललितलास्यलयैर्दोलाय- मानदीर्घदेहाभोगवत्तया मेदिनीबिदलनभयेन भारमिव लघयन्तम्, दिग्भित्तितटेषु कायमिव कण्डूयमानम्, आहवायोदस्तहस्ततया दिग्बार- णानिवाह्वयमानम्, ब्रह्माण्डस्तम्भमिव स्थूलनिशितदन्तेन करपत्रेण पाटयन्तम्, अमान्तं भुवनाभ्यन्तरे बहिरिव निर्गन्तुमीहमानम्; सर्वतः- सरसकिसलयलतालासिभिर्लेशिकैश्चिरपरिचयोपचितैर्वनैरिव विक्षिप्तं, सशैवलबिसविसरशबलसलिलैः सरोभिरिव चाधोरणैराधीयमाननिदाघ- समयसमुचितोपचारानन्दम्, अपि च प्रतिगजदानपवनादानदूरोत्क्षिप्तेना- नेकसमरविजयगणनालेखाभिरिव वलिवलयराजिभिस्तनीयसीभिस्तरङ्गि- तोदरेणातिस्थवीयसा हस्तार्गलदण्डेनार्गलयन्तमिव सकलं सकुलशैलस- मुद्रद्वापकाननं ककुभां चक्रवालम्, एकं करान्तरापितेनोत्पलाशेन लेखाविन्दुभिरचितः' इत्युक्तम् । शङ्खैः शङ्खशब्दैरित्यर्थः । कर्णेत्यादि । कर्णौ च दुन्दुभिध्वनितौ । 'कर्णौ च करिणः कार्यकारिणौ सप्रशंसिनौ' इति । पञ्चमी दशा त्रिपदी । एकपदोत्क्षेपे पादत्रयावस्थितिः । लयो लीला । आहवः संग्रामः । ब्रह्मस्तम्भो ब्रह्माण्डम् । करपत्रं क्रकचं स्थूलनिशितदन्तं भवति । तच्च भेदयति स्तम्भम् । अमान्तमवर्तमानम् । लेशिकैर्घासिकैः । आधोरणैर्गजारोहैः । वलयाकारा वलिर्वलिवलयम् । अर्गलयन्तं सनाटंकं कुर्वाणम् । कुमुदवनानीत्युत्प्रेक्षा । दन्तयो- र्वर्णप्राशस्त्यमाह-'पयः कुमुदकुन्दाभौ केतकीकुमुदद्युती । मृगाङ्ककिरणालोकौ हुए कानों के शंख दुन्दुभि के समान आवाज कर रहे थे, मानो वह पाँचवीं स्वास्थदशा के प्रवेश का मंगलारम्भ सूचित कर रहा था। अपने तीन पैरों पर खड़ा होकर सुन्दर नृत्य की मुद्रा में स्थूल शरीर को कम्पित कर रहा था, मानों पृथिवी के धँस जाने के भय से बोझ को हल्का कर रहा हो । मानों वह झूमता हुआ दिशाओं की भीतों में अपनी देह खुजला रहा था। मानों अपनी सूँड़ उठा-उठाकर दिग्गजों को युद्ध के लिए गुहार रहा था। अपने मोटे-मोटे और तेज दाँतों के आरे से मानों ब्रह्माण्ड को फाड़ रहा था । वह संसार में न अटने के कारण बाहर निकलना चाहता था। बहुत दिनों से परिचय में आए हुए घसियारे उसके सामने पत्ते लाकर फेंकते जा रहे थे । महावत भी ग्रीष्मकाल के अनुकूल उपचार से उसे आनन्दित कर रहे थे। वह किसी अपने प्रतिद्वंद्वी गज के मद की गंध सूँघ कर सहन न करके अपनी सूँड़ फेंक रहा था। उसकी सूँड़ पर सिकोड़ने से छोटी छोटी खाएं पड़ने लगीं, मानों अनेक लड़ाइयों में विजय पाने की गणना के चिह्न हों