हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 21, कुल 506 में से
संदर्भ में पढ़ें( १४ ) प्रकार सरस्वती एक सहिष्णु, लज्जाशील नारी के रूप में चित्रित है और सावित्री का चित्रण एक संवेदनशील नारी के रूप में हुआ है। बाण—हर्षचरित के रचयिता बाण भी एक मुख्य पात्र हैं। मानना तो यह चाहिए कि हर्षचरित दो विभागों में विभक्त आख्यायिका है। प्रथम भाग के मुख्य पात्र स्वयं महाकवि बाण हैं और द्वितीय भाग के सम्राट् हर्षवर्धन । बाण ने अपने चरित्र का जितनी धार्मिकता और स्पष्टता से चित्रण किया है उतना शायद ही हर्ष के चित्रण में हो। यद्यपि यह बात नहीं फिर भी कवि ने अपना दोष और गुण सब एक तटस्थ पर्यवेक्षक के नाते कह डाला है। बाण की तटस्थता इसी से व्यक्त होती है कि उन्होंने अपनी आत्मकथा में 'उत्तम पुरुष' के स्थान पर अन्य पुरुष का ही प्रयोग किया है। 'मैं उत्पन्न हुआ' के स्थान पर 'बाण उत्पन्न हुआ, बढ़ा और यौवन के आरम्भ में आवारा (इत्वर) बन गया' आदि साधारण पात्र के रूप में ही बाण ने अपने को रखा है। सम्भव था अगर उत्तम पुरुष 'मैं' का प्रयोग करते तो अपने दोष-पक्ष के उल्लेख में इतनी स्पष्टता न होती। छोटी अवस्था में ही बाण की माता मर गई। पिता ने ही किसी प्रकार पाल-पोस कर बढ़ाया। दुर्भाग्य से जब बाण चौदह वर्ष का हुआ तभी उसके पिता भी दिवंगत हो गए। अब मातृ-पितृहीन बाण को सुधारने वाला कोई नहीं मिला। मिले वही नाचने-गाने के शौकीन संगी-साथी। उनके साथ रहने से बाण की स्वतन्त्रता बढ़ती गई और फलतः यौवन के आरम्भ में ही वह आवारा (इत्वर) हो गया। इन्हीं साथियों के साथ यहाँ-वहाँ मारा-मारा फिरने लगा। कभी किसी नगर में जाकर नाटक खेलता, कभी किसी नगर में। इस इत्वरवृत्ति ने यद्यपि बाण को पितृ-पितामह द्वारा अर्जित विभव एवं अविच्छिन्न विद्या-प्रसंग से वंचित कर दिया तथापि बाण ने अपने उसी भ्रमणशील जीवन में, जब उसकी लोग खिल्ली उड़ा रहे थे, अनुभव के चार स्रोत पकड़ लिए थे। उसके अनुभव के प्रथम स्रोत राजकुल थे, उनमें घूम-घूम कर वह उनके प्रत्येक कर्मचारी से मिलता और वहाँ के उदार व्यवहारों से परिचित होता। दूसरा स्रोत उस समय के गुरुकुल थे, वहाँ जा-जा कर अध्ययन-अध्यापन की विधियों को उसने खूब समझ लिया। तीसरा स्रोत गुणी जनों की गोष्ठियाँ मिलीं, जिनमें उसने अनमोल बातें सुनीं। चौथा स्रोत सूझ-बूझ वाले विदग्ध जनों की मंडलियाँ थीं, उसने उनमें भीतर घुस कर थाह ली। इस प्रकार वह अपने जीवन के अल्हड़पन और घुमक्कड़ी प्रवृत्ति से अपनी आँखों देखा हुआ लोकजीवन का चौचक अनुभव पाकर अपने घर वापस आया। तब उसके अन्दर जो पुस्तैनी प्रतिभा थी वह चमक उठी। बाण स्वभावतः अपने भाई-बन्धुओं में हिल-मिल जाता था। उसे अपने गाँव में अपने लोगों के बीच मोक्ष का आनन्द मिलता था। वह सम्राट् के पास से भी उस आनन्द के