हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ हर्षचरितम् गाढग्रन्थिसहस्रम् । ग्रथिताविस्रंसिनी । असिधेनुश्छुरिका । वातहरिणो यो वाता- भिमुखं धावति । अवट उन्मार्गः । कोणो लगुडः । इस तरह कई दिन कट गए, समय बहुत चला गया । एक रोज एक पहर दिन चढ़ गया, तब सावित्री को उत्तर दिशा की ओर घोड़ों की हिनहिनाइट भरी आवाज सुन पड़ी, वह अपने शब्दों से वन की घांधियों को भर रही थी और अत्यन्त गम्भीर एवं तीखी थी । सरस्वती के मन में कुतूहल हुआ तो लतामण्डप से निकल आई और उसने सामने थोड़ी ही दूर पर खिले हुए केवड़े के पत्तेदार गर्भ के समान सफेद उड़ती हुई धूलराशि को देखा । क्रम से जब वह और भी समीप आ गई तो मछली के पेट के समान धूसर वर्ण वाले उस धूलि-पटल में एक सहस्र प्रायः युवकों की पैदल सेना के साथ घोड़े इस तरह चलते हुए दिखाई पड़े मानों जल में झुण्ड के झुण्ड मगर तैर रहे हों । पैदल सेना के वे हजार जवान आगे की ओर दौड़ते आ रहे थे। उनके सिर पर लम्बे और घुँघराले बालों का बँधा हुआ जूड़ा था । उनके कपोलों पर हाथीदाँत के बने पत्ते हँसी की चमक उत्पन्न कर रहे थे। वे काले अगुरु की बुंदकियों के छींटे वाले लाल रंग के कंचुक कसे हुए थे । उन्होंने अपने सिर पर चादर की पगड़ी बाँध ली थी । उनके बाएँ हाथ की कलाइयों में सोने के कड़े थे। उनकी कमर में कपड़े की दोहरी पेटी की मजबूत गाँठ थी और उसमें छुरी खोंसी हुई थी । निरन्तर व्यायाम करने से उनका बदन पतला, पर गठा हुआ था । हवा से बात करने वाले हिरनों की तरह वे मानों आकाश में उड़ते चल रहे थे । वे ऊबड़- खाबड़ जमीन, खाइयों और झाड़ियों को डाँकते जाते थे । कुछ सैनिक मुँगरी या डंडे लिए थे और कुछ के हाथ में तलवारें थीं । सहायता के लिए उन्होंने बनैले फूल, फल, मूल और पत्ते ले लिए थे । 'चलो चलो', 'जाओ जाओ', 'बढ़ो बढ़ो', 'आगे रास्ता दो' इस तरह हमेशा वे शोर-गुल मचा रहे थे । मध्ये च तस्य सार्धचन्द्रेण मुक्ताफलजालमालिना विविधरत्नखण्ड- खचितेन शङ्खक्षीरफेनपाण्डुरेण क्षीरोदेनेव स्वयं लक्ष्मीं दातुमागतेन
- गगनगतेनातपत्रेण कृतच्छायम्, अच्छाच्छेनाभरणद्युतीनां निवहेन दिशामिव दर्शनानुरागलग्नेन चक्रवालेनानुगम्यमानम्, आनितम्बविल- म्बिन्या मालतीशेखरस्रजा सकलभुवनविजयार्जितया रूपपताकयेव विराज मानम्, उत्सर्पिभिः शिखण्डखण्डिकापद्मरागमणोरुणैरंशुजालैरदृ- श्यमानवनदेवताविधूतैर्बालपल्लवैरिव प्रमृज्यमानमार्गरेणुपरुषवपुषम्, बकु- लकुङ्मलमण्डलीमुण्डमाला मण्डनमनोहरेण कुटिलकुन्तलस्तबकमालिना मौलिना मीलिततातपं पिबन्तमिव दिवसम्, पशुपतिजटामुकुटमृगाङ्कद्वि- तीयसकलघटितस्येव सहजलक्ष्मीसमालिखितस्य ललाटपट्टस्य मनःशि-