भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Harshacharitam of Banabhatta with Sanskrit & Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट / पं. जगन्नाथ शास्त्री द्वारा

DevanagariSanskritpublished506 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 506 में से

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नुस्तृप्तिरपीष्यते ॥' निशामुख एवेति । न पुनरुचिते शयनकाले विमुक्ताङ्गीशयनेन निःसहाङ्गत्वमस्या दर्शयते । तस्याविति । न पुनर्निद्रामलभत । यथाक्रियमाणमित्यनेन च सरस्वतीतोऽस्या व्यतिरेकं दर्शयन्सरस्वत्या एवानङ्गावस्थामह ।

अब सरस्वती का हृदय कुछ देर तक ठहर उस दधीच के रूप-लावण्य का स्मरण करके बार बार आश्चर्य से भरने लगा । बार बार उसकी आँखें दधीच के दर्शनों के लिए उत्सुक होने लगीं । मानों उसकी बेसुध नजर को कोई उसी दिशा की ओर फेर लेता था । बिना भेजे ही मन दधीच के साथ ही चला गया । सुकुमार वनलता में नये पल्लव के समान उसके चित्त में अनुराग अंकुरित होने लगा । उसी समय से अलसाई-सी, शून्य सी, निंदियाई सी उसने दिन को व्यतीत किया । जब पश्चिम में ढलते हुए मण्डल वाले, मञ्जलिका नामक फूलों के गुच्छों के समान कान्ति वाले, कमलिनियों को चाहने वाले तथा वृद्ध सारस के सिर के समान ललाई वाले सूर्य का वेदमय तेज अस्त हो रहा था, विशाल तमाल वृक्ष के समान काला, आकाशव्यापी प्रगाढ़ अंधकार आकाश को मलिन कर रहा था तथा चलती-फिरती सिद्धाङ्गनाओं के नूपुरों की ध्वनि का अनुसरण करने वाले आकाशगंगा के हंस के समान चन्द्रमा आकाश में धीरे धीरे उदित हो रहा था उस समय सायं-सन्ध्यावन्दन करके सरस्वती रात के आरम्भ होते ही अपने अङ्गों की सुध-बुध भूल पल्लव के शयन पर पड़ रही । सावित्री भी सायंकालीन क्रियाओं से निवृत्त होकर सोने के समय पल्लवशयन पर पहुँची और नींद आते ही सो गई ।

इतरा तु मुहुर्मुहुरङ्गवलनैर्विलुलितकिसलयशयनतला निमीलितनय- नापि नालभत निद्राम् । अचिन्तयच्च—'मर्त्यलोकः खलु सर्वलोकाना- मुपरि, यस्मिन्नेवंविधानि भवन्ति त्रिभुवनभूषणानि सकलगुणग्रामगुरूणि रत्नानि । तथा हि—तस्य मुखलावण्यप्रवाहस्य निस्यन्दबिन्दुरिन्दुः । * तस्य च चक्षुषो विक्षेपाः कुमुदकुवलयकमलाक[राः । तस्य चाधरमणे- र्दीधितयो विकसितबन्धूकवनराजयः । तस्य चाङ्गस्य परभागोपकरण- मनङ्गः । पुण्यभाञ्जि तानि चक्षूंषि चेतांसि यौवनानि वा क्षणानि, येषा- मसावविषयो दर्शनस्य । क्षणं नु दर्शयता च तमन्यजन्मजनितेनेव मे फलितमधर्मेण । का प्रतिपत्तिरिदानीम् ?' इति चिन्तयन्त्येव कथंकथ- मप्युपजातनिद्रा चिरात्क्षणमशेत । सुप्तापि च तमेव दीर्घलोचनं ददर्श । स्वप्नसादितद्वितीयदर्शना चाकर्णाकृष्टकार्मुकेण मनसि निर्दयमताड्यत मकरकेतुना । प्रतिबुद्धाया मदनशराहतायाश्च तस्या वार्त्तामिवोपलब्धुम- रतिराजगाम । तथा हि—ततः प्रभृति कुसुमधूलिधवलाभिर्वनलताभिर-

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