हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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मन में आश्चर्य हुआ। द्वारपालों ने मेखलक को दूर ही से पहचान लिया। 'क्षण भर आप यहीं ठहरें' बाण से यह कह कर मेखलक बेरोक भीतर चला गया। थोड़ी देर बाद वह महाप्रतीहारों के प्रधान दौवारिक पारियात्र के साथ वापस आया। मेखलक द्वारा परिचित होकर पारियात्र ने बाण को प्रणाम किया और विनयपूर्वक कहा—'देव के दर्शन के लिए भीतर पधारिये, आप पर देव की प्रसन्नता है।' बाण ने 'मैं धन्य हूँ, जो देव मुझे इस प्रकार अपने अनुग्रह का पात्र समझते हैं' यह कहते हुए उसके साथ भीतर प्रवेश किया। तब बाण ने वनायु, आरट्ट, काम्बोज, भरद्वाज, सिन्ध और पारस देश के राजवल्लभ अश्वों से भरी हुई मन्दुरा देखी। कुछ दूर हट कर बाईं ओर इभधिष्ण्यागार या हाथियों का लम्बा-चौड़ा बाड़ा मिला। वहाँ बाण ने सम्राट् के मुख्य हाथी दर्पशात को देखा। उसे देखकर बाण बहुत आश्चर्यित हुआ और सोचने लगा—निश्चय ही इस महागज के निर्माण में बड़े-बड़े पर्वत परमाणु बनाये गये होंगे, नहीं तो यह गौरव कहाँ से इसमें आता ? इस प्रकार फिर तीन कक्षाओं को पार कर बाण ने मुक्तास्थानमण्डप के सामने वाले आँगन में सम्राट् हर्ष के दर्शन किये।
तब सम्राट् के सामने आकर बाण ने दाहिना हाथ उठा कर 'स्वस्ति' शब्द का उच्चारण किया। हर्ष ने उसे देख कर दौवारिक से पूछा—'यह वही बाण है?' दौवारिक ने कहा— 'देव का कथन सत्य है, वह यही बाण है।' इस पर हर्ष ने कहा—'मैं इसे तब तक नहीं देखना चाहता जब तक यह मेरा प्रसाद प्राप्त न कर ले।' यह कह कर उन्होंने अपने पीछे बैठे हुए मालवराज के पुत्र (माधवगुप्त ?) से कहा—'यह भारी भुजङ्ग (आवारा) है।'
बाण राजा के अभिप्राय को नहीं समझ सका। सारी राज-मण्डली में सन्नाटा छा गया। बाण कुछ देर तक चुप रह कर बोला—'आप इस प्रकार की बात कैसे कहते हैं? जैसे आपको मेरे विषय में सच्ची बात का पता न हो, या मेरा विश्वास न हो, या आपकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, अथवा आप स्वयं लोक के वृत्तान्त से अनभिज्ञ हों। लोगों के स्वभाव और फैली हुई बात मनमानी और तरह-तरह की होती हैं। किन्तु श्रेष्ठ लोगों को ठीक-ठीक देखना चाहिए। मुझे साधारण समझ कर अनाप-शनाप कल्पना न कीजिए। मैं सोमपान करने वाले वात्स्यायन ब्राह्मणों के वंश में जन्मा हूँ। समय से मेरे यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं। मैंने अङ्गों के साथ वेद का सम्यक् प्रकार से स्वाध्याय किया है। अपनी शक्ति के अनुसार शास्त्रों का भी श्रवण मैंने किया है। विवाह के क्षण से लेकर मैं नियमित गृहस्थ हूँ। तो मुझमें क्या भुजङ्गपना है? मेरी नई अवस्था की कुछ चपलताएँ अवश्य हैं पर वे ऐसी नहीं जिससे इस लोक या परलोक का कोई विरोध हो; मैं इस बात को इनकार नहीं करता। मेरे हृदय में इसी बात का बहुत पश्चात्ताप है। हे देव, आप भगवान् बुद्ध के समान शान्तचित्त, मनु के समान वर्णाश्रममर्यादा के रक्षक और यम के समान दण्डधर हैं। सातों समुद्रों की करधनी और समस्त द्वीपों की माला से विराजित