हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary
महाकवि बाणभट्ट द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Header] द्वितीय उच्छ्वासः १२१
न्तीभिर्वारविलासिनीभिर्विलुप्यमानसौभाग्यमिव सर्वतः, स्पर्शांस्विन्न- वेपमानकरकिसलयगलितचरणारविन्दां चरणग्राहिणीं विहस्य कोणेन- लीलालसं शिरसि ताडयन्तम्, अनवरतकरकलितकोणतया चात्मनः प्रियां वीणामिव श्रियमपि शिक्षयन्तम्, निःस्नेह इति धनैः, अनाश्रयणीय इति दोषैः, निग्रहरुचिरितीन्द्रियैः, दुरुपसर्प इति कलिना, नीरस इति व्यसनैः, भीरुरित्ययशसा, दुर्ग्रहचित्तवृत्तिरिति चित्तभुवा, स्त्रीपर इति सरस्वत्या, षण्ढ इति परकलत्रैः, काष्ठामुनिरिति यतिभिः, धूर्त इति वेश्याभिः, नेय इति सुहृद्भिः, कर्मकर इति विप्रैः, सुसहाय इति परस्परानुबन्धस्थितकराद्वयांगुलिविन्यासः। विलुप्यमानसौभाग्यादिना ताः सुभगा इत्यर्थः। कोणो वीणादिवादनमाण्डम्। प्रियामिति। वीणायाः श्रियाश्च विशेषणम्। निःस्नेह इत्यादौ। एतैरेकमप्यनेकधा गृह्यमाणमिति सम्बन्धः। षण्ढः प्रजनन- क्षमः। काष्ठा पराधारा, तत्प्रधानो मुनिः काष्ठामुनिरतिशयवांस्तपस्वी। नेयः परवशः। शन्तनुर्नाम राजा भीष्मस्य पिता, वाहिन्या गङ्गायाः पतिः, अयं तु तस्मादपि महतीनां वाहिनीनां सेनानां पतिः शन्तनुुरिति। 'पञ्चमी विभक्ते' इति पञ्चमी। भीष्मो जितकाशी जितेन्द्रियः। यतस्त्वयि त्वत्पुत्रे वा सत्यस्मद्दोहित्रस्य कुतो राज्यमिति। यदा हि दशाधिपतिना स्वसुता मत्स्योदरोद्गता मत्स्यावती नामास्मै पित्रर्थमर्थ्यते न दत्ता, तदैतेन प्रतिज्ञातम्—'नाहं राज्यं विवाहं वा करिष्यामि' इति। अत एव ब्रह्मचार्येवाभूत्। राजा च ततोऽपि जितकाशितमः जितकाशी वा। जितेन जयेन काशते शोभते यः। तथा हि भीष्मेण रामो जितः। सर्वराजसहितं काशिराजं च जित्वा भ्रात्रर्थमम्बादिकन्यात्रयमनेषीत्। राजा तु जो अपने हाथों को सम्राट् के स्पर्श से पसीज जाने और कांपने के कारण उनके चरणों पर गिरती जा रही थी, हँसकर लीला में शनैः शिर पर वीणादण्ड द्वारा ताडन कर रहे थे। निरन्तर वे अपने वीणादण्ड को अपने हाथ में लिए रहते थे, इस प्रकार अपनी प्रिया वीणा के समान मानों श्री को भी शिक्षा दे रहे थे। धन उन्हें समझते कि इनमें हमारे प्रति स्नेह कुछ भी नहीं; दोष कहते हैं कि हमारे ये आश्रय के योग्य नहीं हैं; इन्द्रियाँ कहतीं कि सम्राट् हमें निगृहीत रखना चाहते हैं; कलि कहता है कि इनके समीप जाना कठिन है; व्यसन कहते कि ये नीरस हैं; अयश चिल्लाता कि सम्राट् डरपोक हैं; काम समझता कि इनकी चित्तवृत्ति दुर्गृह है; सरस्वती कहती कि ये स्त्रैण हैं; परकीया स्त्रियाँ कहतीं कि ये नपुंसक हैं; यती लोग कहते हैं कि ये पहुँचे हुए तपस्वी हैं; वेश्याएँ उन्हें धूर्त कहतीं; सुहृद्वर्ग कहता कि ये नेय हैं अर्थात् इनकी बुद्धि दूसरों पर निर्भर रहती है, ब्राह्मण कहते कि ये हमारे भृत्य हैं; शत्रु कहते कि बहुत से दूसरे इनके सहायक हैं। इस प्रकार एक ही सम्राट् को लोग अनेक प्रकार से ९ ह०