भारतकोश
हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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पृष्ठ 173

द्वितीय उच्छ्वासः १३१ उपायमिव पुरन्दरदर्शनस्य, आवर्तनमिव धर्मस्य, कन्यान्तःपुरमिव कला- नाम्, परमप्रमाणमिव सौभाग्यस्य, राजसर्गसमाप्त्यवभृथस्नानदिवस- मिव सर्वप्रजापतीनाम्, गम्भीरं च, प्रसन्नं च, त्रासजननं च, रमणीयं च, कौतुकजननं च, पुण्यं च, चक्रवर्त्तिनं हर्षमद्राक्षीत् । दृष्ट्वा चानुगृहीत इव निगृहीत इव साभिलाष इव तृप्त इव रोमाञ्च- मुचा मुखेन मुञ्चन्नानन्दबाष्पवारिबिन्दून्दूरादेव विस्मयस्मेरः सम- चिन्तयत्—'सोऽयं सुजन्मा, सुगृहीतनामा, तेजसां राशिः, चतुरुदधि- केदारकुटुम्बी, भोक्ता ब्रह्मस्तम्भफलस्य, सकलादिराजचरितजयज्येष्ठ- जिह्वाप्रकृतित्वं प्रसज्येत । एवं त्रासेत्यादौ बोद्धव्यम् । तथा च कालिदासः ‘भीम- कान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम् । अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवाणंवः ॥’ इति दिलीपं प्रति वर्णितवान् । कौतुकजननपुण्यत्वादपि संभाव्यते । अत आह— पुण्यमिति । गम्भीरं च प्रसन्नं चेत्यादौ सर्वत्र विरोध उद्भाव्यः । गम्भीरं सतमिस्त्रं प्रसन्नं निर्मलं न भवतीति । अनुगृहीत इवेत्यादि । एवंविधमहोपतिप्रसादवशात् । निगृहीत इवेति । संकोच- वशात् । साभिलाष इवेति । तस्य दर्शनीयत्वात् । तृप्त इवेति । तथैव तस्य कृतार्थ- त्वात् । विरोधी ह्यत्र सुबोधः । केदारं क्षेत्रम् । ब्रह्मस्तम्भं जगत् । फलं रत्नादिः । यच्च स्तम्भस्य फलं धान्यादिः तद्भोक्ता कर्षको भवति, राजन्वती प्रशस्तराज्ययुता । खान वाले पर्वत, सरस्वती की समस्त विद्या वाला संगीतकभवन, लक्ष्मी के हृदय का दूसरा अमृतमन्थनदिवस, विदग्धता के बल का दर्शन, मर्यादाओं के एक ही स्थान, कान्ति के सर्वस्व- कथन, रूपपरमाणुओं की सृष्टि के मोक्ष, राज्य के समस्त दुश्चरितों के प्रायश्चित्त, काम के सारे बलों के सहित आक्रमण, इन्द्र के दर्शनार्थ उपाय, धर्म के आवर्तन, कलाओं के कुमारी अन्तःपुर और सौभाग्य के परम प्रमाण थे। समस्त प्रजापतियों ने मानो उन्हीं का निर्माण करके राजाओं की सृष्टि का यज्ञ समाप्त कर अन्त में अवभृथस्नान कर लिया। इस प्रकार हर्ष गम्भीर, हँसमुख, भय उत्पन्न करने वाले और रमणीय, आह्लाद उत्पन्न करने वाले और पवित्र थे। सम्राट् हर्ष को देखकर अनुगृहीत, निगृहीत साभिलाष और तृप्त की भाँति अपने उद्गत रोमाञ्च वाले मुख से आनन्द के अश्रुकणों को छोड़ता हुआ बाण दूर ही से आश्चर्योत्फुल्ल हो सोचने लगा—ये ही शोभन जन्मवाले, सुगृहीतनामा, तेजोराशि, चार समुद्रों से घिरे पृथ्वी के क्षेत्र के स्वामी, जगत् के रत्नादि फलों का उपभोग करने वाले एवं समस्त प्राचीन ।