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हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

हर्षचरितम् (महाकवि बाणभट्ट - संकेत एवं जगन्नाथ पाठक सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Harshacharitam of Mahakavi Banabhatta with Sanket and Hindi Commentary

महाकवि बाणभट्ट द्वारा

DevanagariHindipublished184 पृष्ठ

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भूमिका महाकवि बाण संस्कृत-साहित्य में महाकवि कालिदास की पद्य-रचना जितनी उत्कृष्ट और सरस है उतनी ही महाकवि बाण की गद्य-रचना महत्त्वशालिनी है। बाण ने अपनी गद्यरचना का जो परिष्कृत और परिमार्जित रूप प्रस्तुत किया है वही आगे चल कर साहित्य के अन्य गद्य कवियों के लिए आदर्श बन गया। संस्कृत में गद्य-साहित्य की यों ही कमी समझी जाती है उस पर बाण जैसे कवि ने आकर मानो अपने पहले और आगे के समस्त अभाव की पूर्ति स्वयं कर ली। हर्षचरित बाण की प्रथम रचना है जो गद्य की उत्कृष्ट शैली के कादम्बरी में होने वाले साक्षात्कार की प्रस्तावना है। इससे यह नहीं कहा जा सकता कि कादम्बरी के संतुलन में हर्षचरित एकदम नहीं आ सकता, हाँ, बाण की चित्रग्राहिणी प्रतिभा का निखार अपेक्षाकृत हर्षचरित से कादम्बरी में अधिक पाया जाता है। हर्ष- चरित में बाण की महती साधना अभिलक्षित होती है। वही साधना कादम्बरी के रूप में फल के समान उद्भूत हुई है। जैसे कोई योगी सिद्धिप्राप्ति के उद्देश्य से साधना में स्थिर हो जाता है, उसे साधक कहते हैं और जब उसकी साधना फलित हो जाती है तब वह सिद्ध की आख्या ग्रहण करता है, उसी प्रकार हर्षचरित में बाण साधक है और कादम्बरी में सिद्ध। बाण के दोनों ग्रन्थ साहित्य और कला की दृष्टि से सर्वांगपूर्ण हैं। विशेषरूप से हर्षचरित पर बाण की युगीन संस्कृति का प्रभाव अधिक है। अतः ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से हर्षचरित संस्कृत-साहित्य का सर्वाधिक मूल्यवान् ग्रन्थ है ऐसा विद्वानों का कथन है। हर्षचरित हमें बाण की आत्मकथा से भी बहुत अंशों में परिचित कराता है। बाण ने हर्षचरित के प्रसंग में आत्म-चरित को सन्नद्ध करके साहित्यिक जगत् का बड़ा ही उपकार किया है। बाण के साहित्य का अध्ययन करते हुए हमारी आँखों के सामने बाण का स्वाभिमानी और मस्ताना व्यक्तित्व नाचने लगता है। हम उसी के आधार पर बाण की प्रत्येक सूक्ष्मेक्षिका को आसानी से आँक लेने में समर्थ होते हैं। संस्कृत-साहित्य के अध्ययनशील लोगों के मन में आचार्यों और कवियों की निजी जीवन-सम्बन्धी घटनाओं के न मिलने के कारण बड़ी उत्सुकता रह ही जाती है और जब यह बात मन में आती है कि कभी हमें तत्तद् कवियों और आचार्यों के