भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 150 में से

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गोला-बारूद पाठक : डर से दिया हुआ जब तक डर रहे तभी तक टिक सकता है, यह तो आपने विचित्र बात कही। जो दिया सो दिया। उसमें फिर क्या हेरफेर हो सकता है ? संपादक : ऐसा नहीं है। १८५७ की घोषणा बलवे अंग्रेजों ने जो कुछ पाया के अंत में लोगों में शान्ति कायम रखने के लिए की वह मार-काट करके गई थी, जब शान्ति हो गई और लोग भोले दिल के पाया, इसलिए हम भी बन गये तब उसका अर्थ बदल गया। अगर मैं सज़ा वैसा ही करके मनचाही के डर से चोरी न करूँ, तो सज़ा का डर मिट जाने चीज पाएँ। अंग्रेजों ने पर चोरी करने की मेरी फिर से इच्छा होगी और मैं मार-काट की और हम चोरी करूँगा। भी कर सकते हैं, यह यह तो बहुत ही साधारण अनुभव है, इससे बात तो ठीक है, लेकिन इनकार नहीं किया जा सकता। हमने मान लिया है मार-काट से जैसी चीज कि डाँट-डपटकर लोगों से काम लिया जा सकता उन्हें मिली वैसी ही हम है और इसलिए हम ऐसा करते आए हैं। भी ले सकते हैं। आप पाठक : आपकी यह बात आपके ख़िलाफ़ जाती कुबूल करेंगे कि वैसी है, ऐसा आपको नहीं लगता ? आपको स्वीकार चीज हमें नहीं चाहिए। करना होगा कि अंग्रेजों ने खुद जो कुछ हासिल किया है, वह मार-काट करके ही हासिल किया है। आप कह चुके हैं कि मार-काट से उन्होंने जो कुछ हासिल किया है वह बेकार है, यह मुझे याद है इससे मेरी दलील को धक्का नहीं पहुँचता। उन्होंने बेकार चीज पाने का सोचा और उसे पाया। मतलब यह कि उन्होंने अपनी मुराद पूरी की। साधन क्या था, इसकी चिन्ता हम क्यों करें ? अगर हमारी मुराद अच्छी हो तो क्या उसे हम चाहे जिस साधन से, मार-काट करके भी पूरा नहीं करेंगे ? चोर मेरे घर में घुसे तब क्या मैं साधन का विचार करूँगा ? मेरा धर्म तो उसे किसी भी तरह बाहर निकालने का ही होगा। 103