भारतकोश
हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

हिन्द स्वराज (आत्म-निर्भरता एवं स्वराज्य दर्शन)

Hind Swaraj by Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचन्द गाँधी (महात्मा गाँधी) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 150 में से

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पृष्ठ 126

शिक्षा पाठक : आपने इतना सारा कहा, परन्तु उसमें कहीं भी शिक्षा की ज़रूरत तो बताई ही नहीं। हम शिक्षा की कमी की हमेशा शिकायत करते रहते हैं। लाज़िमी तालीम देने का आन्दोलन हम सारे देश में देखते हैं। महाराजा गायकवाड़ ने अपने राज्य में लाज़िमी शिक्षा शुरू की है। उसकी ओर सबका ध्यान गया है। हम उन्हें धन्यवाद देते हैं। यह सारी कोशिश क्या बेकार ही समझनी चाहिए ? संपादक : अगर हम अपनी सभ्यता को सबसे किसान ईमानदारी से अच्छी मानते हैं, तब तो मुझे अफसोस के साथ खुद खेती करके रोटी कहना पड़ेगा कि वह कोशिश ज्यादातर बेकार कमाता है। उसे अपने ही है। महाराजा साहब और हमारे दूसरे धुरन्धर माँ-बाप, अपनी स्त्री के नेता सबको तालीम देने की जो कोशिश कर साथ, बच्चों से कैसे पेश रहे हैं, उसमें उनका हेतु निर्मल है। इसलिए उन्हें आना, जहां वह बसा धन्यवाद ही देना चाहिए, लेकिन उनके हेतु का हुआ है वहाँ उसकी जो नतीजा आने की संभावना है, उसे हम छिपा चाल-ढाल कैसी होनी नहीं सकते। चाहिए, इन सबका उसे काफी ज्ञान है। शिक्षा : तालीम का अर्थ क्या है ? अगर उसका अर्थ सिर्फ़ अक्षर ज्ञान ही हो तो वह तो एक साधन जैसी ही हुई। उसका अच्छा उपयोग भी हो सकता है और बुरा उपयोग भी हो सकता है। एक शस्त्र से चीर-फाड़ करके बीमार को अच्छा किया जा सकता है और वही शस्त्र किसी की जान लेने के लिए भी काम में लाया जा सकता है। अक्षर ज्ञान का भी ऐसा ही है। बहुत से लोग उसका बुरा उपयोग करते हैं, यह तो हम देखते ही हैं। उसका अच्छा उपयोग प्रमाण में कम ही लोग करते हैं। यह बात अगर ठीक है तो इससे यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञान से दुनिया को फायदे के बदले नुकसान ही हुआ है। 125